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Religions and Religious Freedom_Paper

From: Amit Bhadhuri

You decide which one was more evil and bigger murderer between Hitler and Churchill.

Amit bhadhuri

http://www.tehelka.com/remembering-indias-forgotten-holocaust/#.U8JWnRzg2dI.gmail

From: Asha Gupta

जन गण मन की कहानी

सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था। सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया। पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये। इंग्लैंड का
राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया। रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा।

उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director) रहे। उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया
कंपनी में लगा हुआ था। और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए। रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है “जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता”। इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही
अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था।

इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है “भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है। हे अधिनायक (Superhero) तुम्ही भारत
के भाग्य विधाता हो। तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महारास्त्र, द्रविड़मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है। तुम्हारी ही हम गाथा गाते है। हे भारत के भाग्य
विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो। “

जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया। जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया। क्योंकि जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है। जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की। वह बहुत खुश हुआ। उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये। रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए। जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था।

उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया। तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया। क्यों कि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था। टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेलपुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है। जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया।

रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलिया वाला कांड हुआ और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा,तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और बहुत जोर से डाटा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली। इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया। सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे।

रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे। अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) । इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत ‘जन गण मन’ अंग्रेजो के द्वारा मुझ
पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है। इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है। इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है। लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे। 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये।

1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी। लेकिन वह दो खेमो में बट गई। जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु थे। मतभेद था सरकार बनाने को लेकर। मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने। जबकि गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है। इस मतभेद के कारण लोकमान्य तिलक कांग्रेस से निकल गए और उन्होंने गरम दल बनाया। कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए। एक नरम दल और एक गरम दल।

गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक जैसे क्रन्तिकारी। वे हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे। और नरम दल के नेता थे मोती लाल नेहरु (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे)। लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे। उनके साथ रहना, उनको सुनना, उनकी बैठकों में शामिल होना। हर समय अंग्रेजो से समझौते में रहते थे। वन्देमातरम से अंग्रेजो को बहुत चिढ होती थी। नरम दल वाले गरम दल को चिढाने के लिए 1911 में लिखा गया गीत “जन गण मन” गाया करते थे और गरम दल वाले “वन्दे मातरम”।

नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है। और आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है। उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे। उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया।

जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली। संविधान सभा की बहस चली। संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई। बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना। और उस एक सांसद का नाम था पंडित जवाहर लाल नेहरु। उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी)। अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तो वे पहुचे गाँधी जी के पास। गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये। तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा”। लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए। नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है।

उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है,और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया। नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे, मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे,जन गण मन को इस लिए तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था।

बीबीसी ने एक सर्वे किया था। उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते थे, उनसे पुछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों ने कहा वन्देमातरम। बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम है। कई देश है जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक जज्बा पैदा होता है।

तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का। अब ये आप को तय करना है कि आपको क्या गाना है ?

इतने लम्बे पत्र को आपने धैर्यपूर्वक पढ़ा इसके लिए आपका धन्यवाद्। और अच्छा लगा हो तो इसे फॉरवर्ड कीजिये, आप अगर और भारतीय भाषाएँ जानते हों तो इसे उस भाषा में अनुवादित कीजिये अंग्रेजी छोड़ कर।

जय हिंद |

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणिपश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ।

ॐ शान्तिः शान्

From: Amit Bhadhuri :

Al Qaeda was a US creation : Hillary Clinton admits!
(A 1.5 minute Clip, only !)

http://www.vijayvaani.com/ArticleDisplay.aspx?aid=3249

The West-Al Qaeda-Wahhabis manipulating Muslims and Islam Shenali Waduge

30 June 2014

In July 2013, European Parliament identified the Wahhabi movement as the source of global terrorism and a threat to traditional and diverse Muslim cultures of the whole world. The Wahhabi cult was a creation of the British. It should make Muslims happy that the EU Parliament has identified not all Muslims as terrorists, but Wahhabis. Al Qaeda was a US creation, as Hillary Clinton admits (http://www.youtube.com/watch?v=Dqn0bm4E9yw). The version that the US is now fighting Al Qaeda is a story too hard to believe. In short, it appears that ‘Muslim’ fundamentalist organisations can all be sourced back to the West. This requires Muslims to seriously take cognizance of ground realities sufficient to realize how they are being manipulated through Islam.

Vijay Raheja

The Hindu Values for Hindustan
By Suresh Vyas

Many countries, corporations, companies, organizations, families or persons have declared what is considered most valuable for them which will guide their decisions and actions. This article lists Hindu values for Hindustan which are also called the Vedic values whose roots are in the Vedas or in its 700-verse summary the Bhagavad Gita. The Buddhists, Jains and Sikhs will also find some of their values in this article. Because the Vedic dharma is universal religion for mankind, most non-Hindu people will also find these values positive, harmless or un-offensive.

1. Considering the land of Hindustan as Bharat Mata (Goddess Mother Hind).
2. Freedom of thought, speech, and action within the bounds of civility and dharma.
3. High regard for those who strive to live sin-free.
4. Hunting for fun or commerce is considered sinful.
5. Kindness to animals
6. Monogamy
7. No animal killing as part of any dharma karma
8. No dowry
9. No forced or enticed conversion
10. No oppression of any social class by any social class. Oppression is considered sinful.
11. No social class is considered higher or lower.
12. No virtue in gambling, alcohol, tobacco, drugs or out-of-marriage sex
13. No virtue in tolerating intolerant religions or ideologies
14. Preference for principle based policies, not greed based policies
15. Respect and protection for cows and women
16. Respect for all the tolerant religions or ideologies
17. Respect for Hindustan’s mountains, rivers and places that are as described holy in the Vedic scriptures.
18. Respect for Vedic gurus, sadhus and shastras; and for teachers, police, and soldiers
19. Reverence for Vedic Gods, temples, maths, gurukulas, Yoga Peeths and ashrams
20. Sincere desire to know the truths, especially the spiritual truths and live accordingly
21. Striving to control lust, anger, and greed
22. Uniform civil code (law) for all the citizens
23. Usage of universal prayers

I request Vedic readers to provide constructive comments to improve this article.

Jai Sri Krishna!
Skanda987@gmail.com

From: J. G. Aurora

Dear friends,

1. The most serious problem facing India is the presence of crores of Bangladeshi infiltrators. Vide its judgment dated July 12, 2005, Supreme Court termed Bangladeshi infiltration as “external aggression” and directed that “Bangladeshi nationals who have trespassed into Assam or are living in other parts of the country have no legal right of any kind to remain in India and they are liable to be deported.”

2. It is shocking that BJP and its leaders have forgotten their pre-election speeches of deporting crores of Bangladeshi infiltrators.

3. Instead of implementing the Supreme Court’s judgments dated July 12, 2005 and December 5, 2006 to deport crores of Bangladeshi infiltrators, on her recent visit to Bangladesh, External Affairs Minister, Sushma Swaraj reportedly announced that India would extend multiple-entry visas for Bangladeshi citizens under 13 and over 65 years of age from the present one year to five years. Besides, India has proposed to increase the frequency of Maitree Express (Dhaka – Kolkata train), and has also proposed a bus service connecting Guwahati, Shillong and Dhaka.

4. All the above-mentioned measures proposed by BJP government would open more floodgates for more Bangladeshis to infiltrate and colonize India.

5. Tragically, India is being grabbed bit by bit by Pak-Bangla terrorists and infiltrators every day. Nationalists must strongly oppose BJP’s infiltrator-friendly policy, and force it to reverse the same.

With regards,

J.G. Arora

From: D Gulhati
About the World Bank and International Monetary Fund

To understand what has happened to the global financial system, we must begin with an understanding of the nature of money. Money is one of humanity’s most important inventions, created to meet an important need. The earliest market transactions were based on the direct exchange of things of equal value, which meant that a transaction could occur only when two individuals met who each possessed an item they were willing to trade for an item possessed by the other. The useful expansion of commerce was greatly constrained. This constraint was partially relieved when people began to use certain objects that had their own intrinsic value as a medium of exchange – decorative shells, blocks of salt, bits of precious metals, or precious stones. Eventually, metal coins provided standard units of exchange based on the amount of precious metal, generally silver or gold, they contained. Later the idea emerged that it was more convenient to keep the precious metal in a vault and issue paper money that could be exchanged for the metal on demand. In a sense, the paper bill was originally the equivalent of a receipt showing that the bearer owned an amount of precious metal, but the paper receipt was more convenient and transportable.
* Each of these innovations was, however, a step toward delinking money from things of real value. An additional step was taken at the historic 1944 Bretton Woods conference that created the World Bank and the International Monetary Fund [I.M.F.]. The countries represented at this meeting agreed to create a new global financial system in which each participating government guaranteed to exchange its own currency on demand for U.S. dollars at a fixed rate. The U.S. government, in turn, guaranteed to exchange dollars on demand for gold at a rate of $35 per ounce. This effectively placed all the world’s currencies on the gold standard, backed by the U.S. gold stored at Fort Knox. Many governments thus came to accept U.S. dollars as gold deposit certificates and chose to hold their international foreign exchange reserves in dollars rather than gold.
* This system worked reasonably well for more than twenty years, until it became widely evident that the United States was creating far more dollars to finance its massive military and commercial expansion around the world than it could back with its gold. If all the countries that were holding dollars decided to redeem them for gold, the available supply would be quickly exhausted, and those who had placed their faith in the integrity of the dollar would be left holding nothing but worthless pieces of paper.
To preclude this eventuality, on August 15,1971, President Richard Nixon declared that the United States would no longer redeem dollars on demand for gold. The dollar was no longer anything other than a piece of high grade paper with a number and some intricate artwork issued by the U.S. government [actually private Federal Reserve Notes - Ed]. The world’s currencies were no longer linked to anything of value except the shared expectation that others would accept them in exchange for real goods and services. Once computers came into widespread use, the next step was relatively obvious – eliminate the paper and simply store the numbers in computers.
Although coins and paper money continue to circulate, more and more of the world’s monetary transactions involve direct electronic transfers between computers. Money has become almost a pure abstraction delinked from anything of real value.
Four developments are basic to this transformation of the financial system:
(a) The United States financed its global expansion with dollars, many of which now show up on the balance sheets of foreign banks and foreign branches of U.S. banks. These dollars are not subject to the regulations and reserve requirements of the U.S. Federal Reserve system.
(b) Computerization and globalization melded the world’s financial markets into a single global system in which an individual at a computer terminal can maintain constant contact with price movements in all major markets and execute trades almost instantaneously in any or all of them. A computer can be programmed to do the same without human intervention, automatically executing transactions involving billions of dollars in fractions of a second.
(c) Investment decisions that were once made by many individuals are now concentrated in the hands of a relatively small number of professional investment managers.The pool of investment funds controlled by mutual funds doubled in three years to total $2,000,000,000,000 at the end of June 1994, as individual investors placed their savings in professionally managed investment pools rather than buying and holding individual stocks. Meanwhile, there has been a massive consolidation of the banking industry – more than 500 U.S. banks merged or closed between September 1992 and September 1993 alone concentrating control of huge pools of funds within the major international “money center” banks. Pension funds, now estimated to total $4,000,000,000,000 in assets, are managed mostly by trust departments of these giant banks, adding enormously to their financial power. The pension funds alone account for the holdings of about a third of all corporate equities and about 40 per cent of corporate bonds.
(d) Investment horizons have shortened dramatically. The managers of these investment pools compete for investors’ funds based on the returns they are able to generate. Mutual fund results are published daily in the world’s leading newspapers, and countless services compare fund performance monthly and yearly. Individual investors have the ability to switch money among mutual funds with the push of a button on a phone or their personal computer mouse, based on these results. For the mutual fund manager, the short term is a day or less and the long term is perhaps a month. Pension fund managers have a slightly longer evaluation cycle.
* Individual savings have become consolidated in vast investment pools managed by professionals under enormous competitive pressures to yield nearly instant financial gains. The time frames involved are far too short for a productive investment to mature, the amount of money to be “invested” far exceeds the number of productive investment opportunities available, and the returns the market has come to expect exceed what most productive investments are able to yield even over a period of years. Consequently, the financial markets have largely abandoned productive investment in favour of extractive investment and are operating on autopilot without regard to human consequences.
* The financial system increasingly functions as a world apart at a scale that dwarfs the productive sector of the global economy, which itself functions increasingly at the mercy of the massive waves of money that the money game players move around the world with split second abandon. Joel Kurtzman, formerly business editor of the New York Times and subsequently editor of the Harvard Business Review, estimated that for every $1 circulating in the productive world economy, $20 to $50 circulates in the economy of pure finance, although no one knows the ratios for sure. In the international currency markets alone, some $800,000,000,000 to $1,000,000,000,000 changes hands each day, far in excess of the $20-25,000,000,000 required to cover daily trade in goods and services.
According to Kurtzman: Most of the $800 billion in currency that is traded . . . goes for very short term speculative investments from a few hours to a few days to a maximum of a few weeks. . . . That money is mostly involved in nothing more than making money . . . It is money enough to purchase outright the nine biggest corporations in Japan overvalued though they are including Nippon Telegraph & Telephone, Japan’s seven largest banks, and Toyota Motors. . . . It goes for options trading, stock speculation, and trade in interest rates. It also goes for short term financial arbitrage transactions where an investor buys a product such as bonds or currencies on one exchange in the hopes of selling it at a profit on another exchange, sometimes simultaneously by using electronics.
* This money is not associated with any real value. Yet the money managers who carry out the millions of high speed, short term transactions stake their reputations and careers on making that money grow at a rate greater than the prevailing rate of interest. This growth depends on the system’s ability to endlessly increase the market value of the financial assets being traded, irrespective of what happens to the output of real goods and services. As this growth occurs, the financial or buying power of those who control the inflated assets expands, compared with the buying power of other members of society who are actually creating value but whose real and relative compensation is declining.

http://www.alor.org/Britain/Global%20Economy%20and%20Those%20Who%20Control%20It.htm

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