Feeds:
Posts
Comments
From: Amit Bhadhuri < >
THE DAY NDA GOVT CANCELLED MEETING WITH PAKI, THE SAME DAY PAKI ENVOY IN DELHI ARRANGED A DINNER PARTY IN A 5 STAR HOTEL FOR KASHMIRI SEPARATIST LEADERS.  AND SEE WHO ARE WITH THEM; RAUL COCAINE VINCI, ANAND SHARMA WITH PAKI AMBASSADOR AND KASHMIRI TERRORISTS.
ONLY A COOLIE COLONY CAN TOLERATE THIS.

From: Amit Bhadhuri < >

 

True face of Islam

YAZIDI WOMEN CAPTURED BY MOST BARBARIC, BRUTAL AND BUCHER ISIS THEN SELLING THEM AS COMMODITIES ON PICK-UP TRUCKS IN MOSUL. AND STILL THERE ARE NO SHORTAGES OF COWARD HINDUS, PSEUDO-SECULARISTS, JHOLAWALLAS AND GANDHIWALLS WHO WILL SUPPORT MUSLAMANS FOR EVERYTHING.

DIN’T IT HAPPENED TO HINDU AND SIKH WOMEN IN 1947? HAVE THE HINDUS AND SIKHS LEARNT ANYTHING?

From: Vivek Arya < >

Is this Bharat or Pakistan? (Hindi)

 

ये भारत हैं अथवा पाकिस्तान हिंदुस्तान टाइम्स अख़बार में 15 अगस्त को एक समाचार छपा हैं की केरल के एक स्कूल में वन्दे मातरम पर आधारित छोटे बच्चों द्वारा प्रस्तुत किये जाने वाले नृत्य गान का स्थानीय राजनैतिक संगठन द्वारा यह कहकर विरोध किया गया की वन्दे मातरम का गान बच्चों की धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध हैं। विद्यालय प्रशासन ने राजनैतिक दवाब के चलते वन्देमातरम गान को स्थगित कर दिया।

पूर्व काल में भी बसपा संसद शाफिकुर्रहमान बर्क द्वारा संसद में सत्र के समापन के दौरान वन्दे मातरम के गान के समय राष्ट्रीय गीत का बहिष्कार यह कहकर कर दिया गया की वन्दे मातरम का गान करना इस्लाम की मान्यताओं के खिलाफ हैं और मैं करोड़ो मुसलमानों की भावनाओं से खिलवाड़ नहीं कर सकता। गौरतलब हैं की उक्त सांसद का वह चौथा कार्यकाल था एवं वह इससे पहले भी ऐसे सत्रों में भाग लेते आये हैं।

दुनिया में शायद भारत ही ऐसा पहल मुल्क होगा जिसमे राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रीय गान न केवल दोनों अलग अलग हैं अपितु ऐसा पहला मुल्क भी होगा जिसमें लोकतान्त्रिक तरीके से चुने गए सांसद ने भारतीय संविधान के अंतर्गत अपने पद और उसकी गरिमा की शपथ ग्रहण करने के बाद उसकी अवहेलना करने का दुस्साहस भी करता हैं। देखा जाये तो यह कदम भारतीय संविधान की अनुपालना न करने के कारण दंडनीय होना चाहिए।

परन्तु हमारे देश सबसे बड़ा दुर्भाग्य अल्पसंख्यकों को प्रोत्साहन देने के नाम पर तुष्टिकरण को प्रोत्साहन दिया जाता हैं। भारत जैसे विशाल देश को हजारों वर्षों की गुलामी के बाद आजादी के दर्शन हुए थे। वन्दे मातरम वह गीत हैं जिससे सदियों से सुप्त भारत देश जग उठा और अर्ध शताब्दी तक भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रेरक बना रहा। इस गीत के कारण बंग-भंग के विरोध की लहर बंगाल की खाड़ी से उठ कर इंग्लिश चैनल को पार करती हुई ब्रिटिश संसद तक गूंजा आई थी। जो गीत गंगा की तरह पवित्र , स्फटिक की तरह निर्मल और देवी की तरह प्रणम्य हैं उस गीत की तुष्टिकरण की भेंट चढ़ाना राष्ट्रीयता का परिहास ही तो हैं जबकि इतिहास इस बात का गवाह हैं की भारत का विभाजन इसी तुष्टिकरण के कारण हुआ था। इस लेख के माध्यम से हम वन्दे मातरम के इतिहास को समझने का प्रयास करेगे।

वन्दे मातरम के रचियता बंकिम चन्द्र बहुत कम लोग यह जानते हैं की वन्दे मातरम के रचियता बंकिम बाबु का परिवार अंग्रेज भगत था। यहाँ तक की उनके पैतृक गृह के आगे एक सिंह की मूर्ति बनी हुई थी जिसकी पूँछ को दो बन्दर खिंच रहे थे पर कुछ भी नहीं कर पा रहे थे। यह सिंह ब्रिटिश साम्राज्य का प्रतीक था जबकि बन्दर भारतवासी थे। ऐसा मानसिकता वाले घर में बंकिम जैसे राष्ट्रभक्त का पैदा होना निश्चित रूप से उस समय की क्रांति कारी विचारधारा का प्रभाव कहा जायेगा। आनंद मठ में बंकिम बाबु ने वन्देमातरम गीत को प्रकाशित किया। आनंद मठ बंगाल में नई क्रांति के सूत्रपात के रूप में उभरा था। वन्दे मातरम और कांग्रेस कांग्रेस की स्थापना के द्वितीय वर्ष १८८६ में ही कोलकाता अधिवेशन के मंच से कविवर हेमचन्द्र द्वारा वन्दे मातरम के कुछ अंश मंच से गाये गए थे। १८९६ में कांग्रेस के १२ वें अधिवेशन में रविन्द्र नाथ टैगोर द्वारा गाया गया था। लोक मान्य तिलक को वन्दे मातरम में इतनी श्रद्धा थी की शिवाजी की समाधी के तोरण पर उन्होंने इसे उत्कीर्ण करवाया था। १९०१ के बाद से कांग्रेस के प्रत्येक अधिवेशन में वन्दे मातरम गया जाने लगा। ६ अगस्त १९०५ को बंग भंग के विरोध में टाउन हॉल की सभा में वन्दे मातरम को विरोध के रूप में करीब तीस हज़ार भारतीयों द्वारा गाया गया था। स्थान स्थान पर विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया और स्वदेशी कपड़ा और अन्य वस्तुओं का उपयोग भारतीय जनमानस द्वारा किया जाने लगा। यहाँ तक की बंग भंग के बाद वन्दे मातरम संप्रदाय की स्थापना भी हो गई थी। वन्दे मातरम की स्वरलिपि रविन्द्र नाथ टैगोर जीने भी दी थी। राष्ट्र कवि/लेखक और वन्दे मातरम राष्ट्रीय कवियों और लेखकों द्वारा अनेक रचनाएँ वन्दे मातरम को प्रसिद्द करने के लिए रची गई जो उसके महत्व की सिद्ध करती हैं।

स्वदेशी आन्दोलन चाई आत्मदान वन्दे मातरम गाओ रे भाई श्री सतीश चन्द्र मागो जाय जेन जीवन चले शुधु जगत माझे तोमार काजे वन्दे मातरम बले- श्री कालि प्रसन्न काव्य विशारद भइया देश का यह क्या हाल खाक मिटटी जौहर होती सब जौहर हैं जंजाल बोलो वन्दे मातरम-श्री कालि प्रसन्न काव्य विशारद

अक्टूबर १९०५ में वसुधामें जितेंदर मोहम बनर्जी ने वन्दे मातरम पर लेख लिखा था। १९०६ के चैत्र मास के बम्बई के बिहारी अखबारमें वीर सावरकर ने वन्दे मातरम पर लेख लिखा था।

२२ अप्रैल को मराठा में तिलक महोदयने वन्दे मातरम पर शोउटिंग ऑफ़ वन्दे मातरमके नाम से लेख लिखा था। कुछ ईसाई लेखक वन्दे मातरम की प्रसिद्धि से जल भून कर उसके विरुद्ध अपनी लेखनी चलते हैं जैसे पिअरसन महोदय ने तो यहाँ तक लिख दिया की मातृभूमि की कल्पना ही हिन्दू विचारधारा के प्रतिकूल हैं और बंकिम महोदय ने इसे यूरोपियन संस्कृति से प्राप्त किया हैं।

अपनी जन्म भूमि को माता या जननी कहने की गरिमा तो भारत वर्ष में उस काल से स्थापित हैं जब धरती पर ईसाइयत या इस्लाम का जन्म भी नहीं हुआ था। वेदों में इस तथ्य को इस प्रकार ग्रहण किया गया हैं - वह माता भूमि मुझ पुत्र के लिए पय यानि दूध आदि पुष्टि प्रद पदार्थ प्रदान करे। अथर्ववेद १२/१/२० भूमि मेरी माता हैं और मैं उसका पुत्र हूँ। अथर्ववेद १२-१-१५

वाल्मीकि रामायण में जननी जन्मभूमि को स्वर्ग के समान तुल्य कहा गया हैं। ईसाई मिशनरियों ने तो यहाँ तक कह डाला की वन्दे मातरम राजनैतिक डकैतों का गीत हैं।

वन्दे मातरम और बंगाल में कहर बंगाल की अंग्रेजी सरकार ने कुख्यात सर्कुलर जारी किया की अगर कोई छात्र स्वदेशी सभा में भाग लेगा अथवा वन्दे मातरम का नारा लगाएगा तो उसे स्कूल से निकाल दिया जायेगा। बंगाल के रंगपुर के एक स्कूल के सभी २०० छात्रों पर वन्दे मातरम का नारा लगाने के लिए ५-५ रुपये का दंड किया गया था। पूरे बंगाल में वन्दे मातरम के नाम की क्रांति स्थापित हो गयी। इस संस्था से जुड़े लोग हर रविवार को वन्दे मातरम गाते हुए चन्दा एकत्र करते थे। उनके साथ रविन्द्र नाथ टैगोर भी होते थे। यह जुलुस इतना बड़ा हो गया की इसकी संख्या हजारों तक पहुँच गयी।

१६ अक्टूबर १९०६ को बंग भंग विरोध दिवस बनाने का फैसला किया गया। उस दिन कोई भी बंगाली अन्न-जल ग्रहण नहीं करेगा ऐसा निश्चय किया गया। बंग भंग के विरोध में सभा हुई और यह निश्चय किया गया की जब तक चूँकि सरकार बंगाल की एकता को तोड़ने का प्रयास कर रही हैं इसके विरोध में हर बंगाली विदेशी सामान का बहिष्कार करेगा। हर किसी की जबान पर वन्दे मातरम का नारा था चाहे वह हिन्दू हो, चाहे मुस्लिम हो, चाहे ईसाई हो। वन्दे मातरम से आम जनता को कितना प्रेम हो गया था इसका उदहारण हम इस वाकया से समझ सकते हैं। किसी गाँव में, जो ढाका जिले के अंतर्गत था, एक आदमी गया और कहने लगा की में नवाब सलीमुल्लाह का आदमी हूँ। इसके बाद वन्दे मातरम गाने वाले और नारे लगाने वालो की निंदा करने लगा। इतना सुन्ना था की पास की एक झोपड़ी से एक बुढ़िया झाड़ू लेकर बहार आई और बोली वन्दे मातरम गाने वाले लड़को ने मुझे बचाया हैं। वे सब राजा बेटा हैं। उस वक्त तेरा नवाब कहाँ था? फूलर के असफल प्रयास

फूलर उस समय बंगाल का गवर्नर बना। वह अत्यन्त छोटी सोच वाला व्यक्ति था। उसने का की मेरी दो बीवी हैं एक हिन्दू और दूसरी मुस्लिम और मुझे दूसरी ज्यादा प्रिय हैं। फुलर का उद्देश्य हिन्दू-मुस्लिम एकता को तोड़ना था। फुलर के इस घटिया बयान के विपक्ष में क्रान्तिकारी और कवि अश्वनी कुमार दत ने अपनी कविता में लिखाआओ हे भारतवासी ! आओ, हम सब मिलकर भारत माता के चरणों में प्रणाम करें। आओ! मुसलमान भाइयों, आज जाती पाती का झगड़ा नहीं हैं। इस कार्य में हम सब भाई भाई हैं।इस धुल में तुम्हारे अकबर हैं और हमारे राम हैं।फूलर ने बंगाल के मुस्लिम जमींदारों को भड़का कर दंगा करवाने का प्रयास किया पर उसके प्रयास सफल न हुए। अंग्रेज सरकार के मन में वन्दे मातरम को लेकर कितना असंतोष था की उन्होंने सभी विद्यालाओं को सरकारी आदेश जारी किया की सभी छात्र अपनी अपनी नोटबुक में ५०० बार यह लिखे की वन्दे मातरम चिल्लाने में अपना समय नष्ट करना मुर्खता और अभद्रता हैं। वारिसाल में कांग्रेस का अधिवेशन और वन्दे मातरम १४ अप्रैल १९०६ के दिन वारिसाल में कांग्रेस के जुलुस में वन्दे मातरम का नारा लगाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। शांतिपूर्वक निकल रहे जुलुस पर पुलिस ने निर्दयता से लाठीचार्ज किया। निर्दयता की हालत यह थी की एक मकान की खूंटी पर वन्दे मातरम लिखा था तो उस मकान को गिर दिया गया। १० -११ वर्ष का एक बालक रसोई में वन्देमातरम गा रहा था तो उसे घर से निकलकर कोर्ट के सामने चाबुक से पिता गया। दो हलवाइयों की दुकान पर यह नारा लिखा था तो उनके सर फोड़ दिए गए। सुरेंदर नाथ बनर्जी की गिरफ्तार कर २०० रुपये जुर्माने और अलग से कोर्ट की अवमानना पर २०० रुपये का दंड लेकर छोड़ दिया गया। इतनी निर्दयता के बावजूद भीड़ वन्दे मातरम का गान करते हुए अपने सभापति महोदयरसूल साहिब को लेकर सभास्थल पर पहुँच गई। मंच पर हिन्दू नेताओं के साथ मुस्लमान नेताओं में सर्वश्री इस्माइल चौधरी, मौलवी अब्दुल हुसैन, मौलवी हिदायत बक्श, मौलवी हमिजुद्दीन अहमद, मौलवी दीन मुहम्मद, मौलवी मोथार हुसैन, मौलवी मोला चौधरी उपस्थित थे। वन्दे मातरम के गान से सभा का आरम्भ हुआ था। सभापति महोदय ने देश की आज़ादी के लिए सभी हिन्दू-मुसलमान को आपस में मिलकर लड़ने का आवाहन किया। इतने में सुरेंदर नाथ बनर्जी अपने साथियों के साथ सभा स्थल पर जा पहुँचे जिससे वन्दे मातरम के गगन भेदी नारों के साथ सम्पूर्ण सभा स्थल गूँज उठा। सभा में ब्रिटिश सरकार के द्वारा वन्दे मातरम को लेकर किये जा रहे अत्याचार को घोर निंदा की गयी। जिस स्थान पर सुरेंदरनाथ बनर्जी को वन्दे मातरम गाने के लिए गिरफ्तार किया गया था उस स्थान पर वन्दे मातरम स्तंभ बनाने के प्रस्ताव को सभा में पारित किया गया। अगले दिन के सभी समाचार पत्र वरिसाल के वन्दे मातरम संघर्ष की प्रशंसा और अंग्रेज सरकार की निंदा से भरे पड़े थे। वारिसाल की घटना के कारण लार्ड कर्जन को भारत के वाइसराय के पद से त्याग देना पड़ा। वन्दे मातरम और योगी अरविन्द वन्दे मातरम के नाम से पत्र आरंभ हुआ जिसे पहले विपिन चन्द्र पाल ने सम्पादित किया बाद में श्री अरविन्द ने। श्री अरविन्द ने इस पत्र से यह भली भांति सिद्ध कर दिया की तलवार से ज्यादा तीखी लेखनी होती हैं और उसकी ज्वाला से क्रूर शाशन भी भस्मीभूत हो सकता हैं। अरविन्द के पत्र के बारे में स्टेट्समैन अखबार लिखता हैं की अखबार की हर लाइन के बीच भरपूर राजद्रोह दीखता हैं पर वह इतनी दक्षता से लिखा होता हैं की उस पर क़ानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती। श्री अरविन्द ने वन्दे मातरम गीत के बारे में कहा हैं की बंकिम ने ही स्वदेश को माता की संज्ञा दी हैं। वन्दे मातरम संजीवनी मंत्र हैं। हमारी स्वाधीनता का हथियार वन्दे मातरम हैं। उन्होंने कहा की वन्दे मातरम साधारण गीत नहीं हैं। बल्कि एक ऐसा मंत्र हैं जो हमें मातृभूमि की वंदना करने की सीख देता हैं। उनकें इस व्यक्तव्य के कारण ही बंग-भंग के क्रांतिकारियों के लिए वन्दे मातरम का यह नारा वह गीत मंत्र बन गया। अपनी पत्नी को ३० अगस्त १९०८ को एक पत्र में श्री अरविन्द लिखते हैं मेरा तीसरा पागलपन यह हैं की जहाँ दुसरे लोग स्वदेश को जड़ पदार्थ,खेत,मैदान,पहाड़, जंगल और नदी समझते हैं , वहां मैं अपनी मातृभूमि को अपनी माँ समझता हूँ। उसे अपनी भक्ति अर्पित करता हूँ और उसकी पूजा करता हूँ।माँ की छाती पर बैठ कर अगर कोई उसका खून चूसने लगे तो बीटा क्या करता हैं ? क्या वह चुपचाप बैठा हुआ भोजन करता हैं या स्त्री पुरुष के साथ रंगरलिया बनता हैं या माँ को बचाने के लिए दौड़ जाता हैं।श्री अरविन्द को गिरफ्तार कर लिया गया। उससे देश में वन्दे मातरम की लहर चल पड़ी। 5१९०६ को धुलिया, महाराष्ट्र में वन्दे मातरम के नारे से सभा ही रूक गयी। नासिक में वन्दे मातरम पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। जिस जिस ने प्रतिबन्ध को तोडा तो उसे पीटा गया गया। कई गिरफ्तारियाँ हुई। इस कांड का तो नाम ही वन्दे मातरम कांड बन गया। फरवरी १९०७ को तमिल नाडू में मजदूरों ने हड़ताल कर दी और ब्रिटिश नागरिकों को घेर कर उन्हें भी वन्दे मातरम के नारे लगाने को बाध्य किया। मई १९०७ को रावलपिंडी में भी स्वदेशी के नेताओं की गिरफ़्तारी के विरोध में युवकों ने वन्दे मातरम के नारे को लगाते हुए लाठियाँ खाई। २६ अगस्त ,१९०७ को वन्दे मातरम के एक लेख के कारण बिपिन चन्द्र पाल को अदालत में सजा हुई तो उनका स्वागत हजारों की भीड़ ने वन्दे मातरम से किया। यह देखकर पुलिस अँधाधुंध लाठीचार्ज करने लगी। यह देखकर एक १५ वर्षीय बालक सुशील चन्द्र सेन ने एक पुलिस वाले मुँह पर मुक्का मार दिया। उस वीर बालक को १५ बेतों की सजा सुनाई गई थी। सुशील की इस सजा की प्रशंसा करते हुए संध्या में एक लेख छपा सुशील की कुदान भरी, फिरंगी की नानी मरीसुशील युगांतर पार्टी के सदस्य थे। उनकी चर्चा सुरेंदर नाथ बनर्जी तक पहुँची तो उन्होंने उसे सोने का तमगा देकर सम्मानित किया। अब युगांतर पार्टी के सदस्यों ने सुशील को सजा देने वाले अत्याचारी किंग्स्फोर्ड को यमालय भेजने की ठानी। यह कार्य प्रफुल्ल चन्द्र चाकी और खुदी राम बोस को सोंपा गया। षड़यंत्र असफल हो जाने पर चाकी ने आत्महत्या कर ली और खुदीराम ने फाँसी का फन्दा चूम कर सबसे कम उम्र में शहीद होने का सम्मान प्राप्त किया। इसी केस में श्री अरविन्द को भी सजा हुई थी। वन्दे मातरम और राष्ट्रीय झंडा कांग्रेस का लम्बे समय तक कोई निजी झंडा नहीं था। कांग्रेस के अधिवेशन में यूनियन जैक को फहराकर भारत के अंग्रेज भगत प्रसन्न हो जाते थे। १९०६ में कोलकता में कांग्रेस के अधिवेशन में भगिनी निवेदिता ने सबसे पहले वज्र अंकित झंडे का निर्माण किया जिस पर वन्दे मातरम लिखा हुआ था। उसके बाद १८ अक्टूबर, १९०७ को जर्मनी के स्टुअर्ट नगर में मैडम बीकाजी कामा ने वन्दे मातरम गीत के बाद राष्ट्रीय झंडा फहराया जिस पर वन्दे मातरम अंकित था। अपने भाषण में मैडम कामा ने पहले अंग्रेजों द्वारा भारत में किये जा रहे अत्याचारों का विवरण दिया जिससे की सुनने वालो के रोंगटे खड़े हो गए। उसके बाद भारत का झंडा निकालती हुई वह बोली यह हैं भारतीय राष्ट्र का स्वतंत्र झंडा। यह देखिये फहरा रहा हैं। भारतीय देश भक्तों के रक्त से यह पवित्र हो चूका हैं। सदस्यगन, मैं आपसे अनुरोध करती हूँ की आप खड़े होकर भारत की इस स्वतंत्र पताका का अभिवादन करे।सर्व प्रथम झंडे पर वन्दे मातरम को अंकित करने से पाठक उस काल में वन्दे मातरम के भारतीय जन समुदाय पर प्रभाव को समझ सकते हैं। वन्दे मातरम का भारत व्यापी प्रभाव मोतीलाल नेहरु ने जवाहरलाल नेहरु को १९०५ में एक पत्र में लिखा था की हम ब्रिटिश भारत के इतिहास की सबसे संकट पूर्ण अवधि से गुजर रहे हैं। इलाहाबाद में भी वन्दे मातरम आम अभिनन्दन बन गया हैं। यदि अभियान चलता रहा तो यहाँ लौटने पर भारत को , जब तुम गये, उससे बिलकुल बदला पाओगे। २५ नवम्बर १९०५ को ट्रिब्यून अखबार लिखता हैं बंगाल में लोगो ने वन्दे मातरम का जयघोष शुरू किया हैं। इन शब्दों का अर्थ हैं माता की वन्दना। इसमें कुछ भी भयंकर नहीं हैं। फिर दमनशाही द्वारा वन्दे मातरम की मनाही क्यूँ हैं? अब तो पंजाब में सुशिक्षित लोग एक दुसरे से भेंट होने पर वन्दे मातरम कहकर अभिनन्दन करते हैं। इस प्रकार सारे हिंदुस्तान में असंख्य मुखों से निरन्तर निकलते वन्दे मातरम को बंद करने में सरकार को कितने सिपाहियों और अधिकारीयों की आवश्यकता होगी? पूर्वी बंगाल की जनता के साथ सारे हिंदुस्तान की सहानभूति हैं। जब हैदराबाद के निज़ाम के धर्मान्ध अत्याचारों के विरुद्ध आर्य समाज ने १९३९ में हैदराबाद सत्याग्रह किया था तब जेल में रामचन्द्र के नाम से एक आर्यवीर को बंद कर दिया गया था। अपनी क्रूरता की धाक जमाने के लिए जेल में आर्य सत्याग्रहियों पर अत्याचार किया जाता था। जेल में दरोगा जब भी वीर रामचंद्र को बेंत मारते तो उनके मुख से वन्दे मातरम का नारा निकलता था। दरोगा जब तक मरते रहते जब तक की रामचंद्र बेहोश न हो गए पर उनके मुख से बेहोशी में भी नारा निकलता रहा। ऐसा अनुराग था देश और धर्म प्रेमियों को वन्दे मातरम के साथ। वन्दे मातरम विदेश में जुलाई १९०९ को मदन लाल धींगरा को लन्दन में जब फाँसी दी गई तो उनके अंतिम शब्द थे वन्दे मातरम। १९०९ को जिनेवा से एक पत्रिका वन्दे मातरम का का प्रकाशन आरंभ हुआ। अपने प्रथम अंक में पत्रिका ने कहा विदेशी अत्याचार के विरुद्ध हमारे बहादुर और बुद्धिमान नेताओं ने बंगाल में जो यशस्वी अभियान शुरू किया हैं, वन्दे मातरम के माध्यम से हम उसे पूर्ण शक्ति और दृढ़ता के साथ में चलायेगे कनाडा से आ रहे जहाज कमागातामारू के झंडे पर वन्दे मातरम, सत श्री अकाल और अल्लाह हो अकबर के नारे लिखे थे। साउथ अफ्रीका से जब महात्मा गाँधी भारत लौटे तो उन्होंने भारत आकार वन्दे मातरम गीत की प्रशंसा करी थी। (हरिजन १ जुलाई १ ९९३८)

१९२२ में जब गोखले अफ्रीका गए तो हजारों भारत वासियों ने उनका स्वागत वन्दे मातरम से किया था। १९३७ में तुर्की के अदान नगर में भारतीय मस्जिद पर वन्दे मातरम लिखा था। मस्जिद पर भारतीय तिरंगा लगा था और हर नमाज के साथ वन्दे मातरम का घोष किया जाता था।

भारतीय क्रांतिकारी और वन्दे मातरम सन १९२० में लाला लाजपत राय ने दिल्ली से दैनिक वन्दे मातरम का प्रकाशन शुरू किया था। सन १९३० में चन्द्र शेखर आजाद अपने पिता को पत्र लिखने समय वन्दे मातरम सबसे ऊपर लिखते हैं। सन १९२० का असहयोग आन्दोलन, नमक सत्याग्रह में भी वन्दे मातरम का बोलबाला था। रामचंद्र बिस्मिल ने काकोरी कांड में फाँसी पर लटकने से पहले वन्दे मातरम कहा था। चटगांव सशस्त्र संघर्ष में वीर सूर्यसेन को फाँसी देने से पहले जब भी मार पड़ती तो वे वन्दे मातरम का जय घोष करते थे। उन्हें इतना मार गया था की वे बेहोश हो गए और अचेत अवस्था में ही उन्हें फाँसी पर चढ़ा दिया गया था। इसके अतिरिक्त अनेक सन्दर्भ हमे भारत की आज़ादी की लड़ाई में वन्दे मातरम को प्रेरणा के स्रोत्र के रूप में पाते हैं।

वन्दे मातरम का विरोध वन्दे मातरम का विरोध जो लोग कर रहे हैं उनका अरबी, फारसी भाषा के शब्द मादरे वतन (हे माता तुझे सलाम करता हूँ), उम्मु कौरा (ग्राम्य जननी), उम्मुल मोमेनीन (विश्वासियो की जननी) और उम्मुल कैताब (ग्रन्थ जननी) आदि शब्द के बारे में उनका क्या कहना हैं। कुछ मुसलमानों ने जो नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के नारे जय हिन्द का भी विरोध किया था पर वन्दे मातरम की तरह यह नारा धार्मिक नहीं अपितु देश भक्ति को बुलंद करने के लिए था। ब्रिटिश काल में उन क्रांतिकारियों से पूछा जाये की वन्दे मातरम का उनके लिए क्या महत्व हैं तब वे यही कहेंगे की वन्दे मातरम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा हैं , उसके प्राण हैं और उसके लिए सर्वस्व अर्पण हैं। ऐसे गान का विरोध करना मत-मतान्तर की संकीर्ण विचारधारा को पोषण देना हैं। आज आप बच्चों को देश के गौरवशाली इतिहास से सम्बंधित एवं स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले वन्दे मातरम गीत से अपरिचित करके क्या सन्देश देना चाहते हैं। डॉ विवेक आर्य नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो । चाहे जो हो धर्म तुम्हारा चाहे जो वादी हो ।

नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।‍‍‌

जिसके अन्न और पानी का इस काया पर ऋण है,

जिस समीर का अतिथि बना यह आवारा जीवन है जिसकी माटी में खेले, तन दर्पण-सा झलका है,

उसी देश के लिए तुम्हारा रक्त नहीं छलका है तवारीख के न्यायालय में तो तुम प्रतिवादी हो ।

नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो । जिसके पर्वत खेत घाटियों में अक्षय क्षमता है,

जिसकी नदियों की भी हम पर माँ जैसी ममता है जिसकी गोद भरी रहती है, माटी सदा सुहागिन,

ऐसी स्वर्ग सरीखी धरती पीड़ित या हतभागिन ? तो चाहे तुम रेशम धारो या पहने खादी हो ।

नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो । जिसके लहराते खेतों की मनहर हरियाली से,

रंग-बिरंगे फूल सुसज्जित डाली-डाली से इस भौतिक दुनिया का भार ह्रदय से उतरा है,

उसी धरा को अगर किसी मनहूस नज़र से खतरा है तो दौलत ने चाहे तुमको हर सुविधा लादी हो ।

नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो । अगर देश मर गया तो बोलो जीवित कौन रहेगा?

और रहा भी अगर तो उसको जीवित कौन कहेगा? माँग रही है क़र्ज़ जवानी सौ-सौ सर कट जाएँ,

पर दुश्मन के हाथ न माँ के आँचल तक आ पाएँ जीवन का है अर्थ तभी तक जब तक आज़ादी हो।

नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो । चाहे हो दक्षिण के प्रहरी या हिमगिरी वासी हो,

चाहे राजा रंगमहल के हो या सन्यासी हो चाहे शीश तुम्हारा झुकता हो मस्जिद के आगे,

चाहे मंदिर गुरूद्वारे में भक्ति तुम्हारी जागे भले विचारों में कितना ही अंतर बुनियादी हो।

नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो । डॉ विवेक आर्य

From: Dr. Jagan N. Kaul  < >

 

  •             Reasons Why Creating Homeland is Necessary

 

This provocative initiative by Kashmiri Islamists, obviously enjoying the official blessings of the Political class of Kashmir, causes us to pause and ask if the barbarian Moguls–who robbed, murdered, forcibly converted and enslaved the Hindus of Kashmir region by the millions–have really been wiped out from the land of Rishi Kashap.

 

During the reign of these barbarians in India tens of thousands of temples, shrines, and places of worship of Hindus, Sikhs, Buddhists and Jains, were similarly occupied, looted, destroyed and/or converted in to mosques.  Additionally, somewhere between half a million and a million of Hindus were captured and taken to mountains in Afghanistan, and were slaughtered to please the blood thirsty Allah. Consequently, these mountains came to be known as the “Hindu Kush” range of mountains.

 

Due to the limitless appeasement, encouragement and freedom afforded by one after the other modern day Indian regimes, the Kashmiri Islamists are crusading to revive that reign of terror for all the non-Muslims.

 

On the one hand, these double-faced disaffected Islamists of India will tell you “the Pundits are our brothers, and Kashmir is incomplete without them;” and on the other they are actively engaged in removing every trace of Kashmir’s Hindu past. They have already vandalized, looted, destroyed and converted Hindu temples by the hundreds into mosques, and Islamized the names of thousands of villages, towns, cities, roads, hills, lakes and other conspicuous places. The Muslim law “Sharia” has been made law of the state.

 

Citing the environmental reasons, the Abdullah regime recently withdrew permission to a handful of Kashmiri Pundits for undertaking pilgrimage to the traditional Hindu shrine at Kounsar Naag to perform Puja there. Yet the same regime not only looked the other way, but actively cooperated with the anti-Hindu Islamists for building the foundation walls of a mosque right in the middle of the location traditionally meant for Hindu Puja, rituals and worshipping.

 

If the rulers of India–BJP–and particularly the defenders of Hindu Samaaj have their eyes open, and they are listening, here is the latest example and evidence:

 

Under the foreign influences, rewards, and Wahhabi indoctrination, the Kashmiri Islamists have rendered themselves incapable of living in peace and harmony with the members of other faiths.

 

Therefore, the only way the uprooted Kashmiri Hindus can live in a safe and secure environment in Kashmir is when a “Homeland” for them is created with the presence of the Indian Constitution and the body of law enforcements created under it.

 

Without the change of status quo and political reorganization of Kashmir, and without establishing a “Union Territory” for the exiled Kashmir Pundits, asking them to return back to their homeland would be tantamount to sending them in to the “Valley of Death.”

==

 

A suggested solution:

From Skanda987 < >

 

A solution or plan of action for Hindustan–BJP–is this:

 

  1. By a military action take over Kashmir overnight, and at the same time amend the Bharat’s constitution declaring Kashmir a state of Bharat like all other states.
    1. Keep the military presence alert to kill intruders at the border
    2. Capture all known terrorists’ or separatists’ leaders, and put them in prison
    3. Declare and enforce curfew in Kashmir for three or so months
    4. In that three months or so period establish police, military, and guptachar organizations in the whole Kashmir
    5. Re-possess all the homes of the Hindus (the Pundits) who were forced to runaway overnight to save lives. Arrest the occupants and put them in prison
  2.  As preparation for the above operation, let the police and military be kept prepared in all major cities to handle well and effectively any riots by the Muslims.
  3.  At the same time the Hindu organizations launch a massive non-violent program for persuading the Muslims of India to give up Islam. The rationale for giving up Islamform them are:
    1. Their ancestors a few centuries ago were Hindu who were forced to accept Islam
    2. Islam is a foreign ideology that has forcibly invaded in Bharat. Therefore, it has no right to be in Bharat which is the land of the Hindus since millenniums
    3. Islam is extremely intolerant of all other faiths and ideologies. The Hindus (or kafirs) cannot have peace if there is Islam around
    4. It will create lasting peace and prosperity in Bharat for all
  4. As soon as possible make Bharat a Vedic State because Vedic dharma is inherently tolerant of all the tolerant faiths. Therefore, we do not need “secularism,” which is European medicine against Christianity.
  5. Also, the Hindu sampradays need to start a movement all over Bharat to stop any malpractice of Vedic dharma anywhere it has happened in recen times. Correct Vedic dharma is provided to mankind by Bhagavaan Krishna in Bhagavad Gita. Therefore, Gita’s message needs to be spread among the Hindus, and others interested in it.
  6. No mosque or a mullah should be allowed to motivate Muslims to do jihad against anyone. No hate speeches be allowed.

I request other Vedic military/poliical strategist readers to share their solution ideas.

Jai Sri Krishna!

-Skanda987

AUM

VEDAS FOR ALL

By Chitranjan Sawant

 

At the beginning of the human creation, God transmitted divine knowledge to mankind for a style of life generating health and happiness. God revealed VEDAS or Divine Knowledge to the Rishis or the sages and they passed it on without in any way discriminating between man and woman or between man and man on grounds of caste, creed or color, The entire human race is entitled to read the Ved mantras, meditate on them and improve the quality of life.

 

One has just to make an effort to read and meditate on the mantra and the happy results would not be far to find. One may read the original mantra compilation called samhitaa or go to the translation of the text and explanation or exposition in English or Hindi language. Treatises explaining meaning of the Ved  mantras may be available in other languages too. Meditation on mantras leads to bliss. “Vedo Akhilo Dharm Moolam’’ – Vedas are the roots of righteousness. When one walks on the path of righteousness one is doing one’s Dharma as a good man ought to. Who is a good man? One who is socially efficient is a good man or a woman. 

 

He or she is an achiever of right goals through right means. This Mister Right cares as much for the society as for himself. Should there be a conflict of interests between the self and the society, self must be made subservient to the society. This is what the Vedic way of life is all about. This path of social efficiency is paved with and illuminated by the Ved Mantras. 

 

The Ved Mantras always show light at the end of the tunnel and bring in optimism and become a source of inspiration to lift a man or a woman when he or she is d own in the dumps. It may also be understood that the Vedas, being divine knowledge, are considered to be infallible. Other branches of knowledge originate from this pristine source. Maharishi Swami Dayaanand Saraswati, founder of the Arya Samaaj, has opined that the non-Vedic works conforming to the Vedic Dharma are acceptable but the ones in conflict with the Vedic precepts are not acceptable. Ved mantras are the touchstone to decide either way. Ved mantras are cornerstones of the edifice of the Vedic Dharma.

 

The Vedas are four in number: Rigveda, Yajurveda, Saamaveda and Atharvaveda. At the beginning of the creation, the Rishis in whose hearts the four Vedas, Rig, Yajur, Saama and Atharva were revealed are Agni, Vaayu, Aaditya and Angiraa respectively. 

 

Now let us take a close look at them and meditate on Ved mantras relevant to the human scenario today. The Rigveda is the Ved of Sciences. There are ten thousand five hundred eighty nine mantras spread over ten mandals or ten major cantos. 

 

 With a view to understanding the spiritual import of Ved Mantras, quite a few Vedic scholars of yore like Sayan and Mahidhar wrote Ved Bhashya or Vedic commentaries in simple Sanskrit. In the 19th century India a Vedic renaissance took place. Maharshi Swami Dayaanand Saraswati had the distinction of being the first Rishi to write commentaries on the divine Vedas both in Sanskrit and Hindi. The Vedic wisdom was unlocked and the biggest beneficiary was the common man on the street. It was a religious revolution. 

 

Unlocking the Vedic knowledge and letting the deprived segments of society reap the harvest definitely enriched quality of life of an average man. 

 

The Yajurveda comprises one thousand nine hundred seventy five mantras. Its basic emphasis is on Karmakaand, correlating mantras and yajna. The mantras inspired men and women to realize God in their inner self. Mantras motivated men and women to banish the evil and imbibe the noble. Making donations for charities is one of the ways to attain nobility on the path to attain Moksha, that is liberation of soul from the bondage of repeated cycles of births and deaths.

 

The Saamaveda comprises one thousand eight hundred seventy five mantras. This is known as Upasanaakaand or the prayer sung for realization of the Supreme Being n one’s inner self. The word SA-AM, inter-alia, means a communion of soul with God. SA means the Almighty and AM is soul or Jeeva and SAAM is a synthesis of the two. The Atharvaveda comprises five thousand nine hundred and seventy seven mantras. It is known as the Jynankand. The mantras of Atharvaved enlighten men and women in their quest of God and help them seek Him in “Matter or objects of this mundane world’’. 

 

The Vedas propound the philosophy of Trinity, i.e. existence of God, soul and matter before the Creation, during the Creation and after the Creation is over. The three exist as independent entities with myriad opportunities to interact. God, of course, is Supreme Being always and every time. Correlating the Vedic knowledge with the mundane matters of today, one may like to take a look at the scenario of terrorism and what the Vedas have to say on the subject. 

 

Does a Vedic sanction exist against wanton killings of human beings and destruction of property with a view to terrorizing human beings? Of course it does. 

 

The Rigveda gives a definite direction to punish the killers and eulogize the warrior who wields Vajra. Punishment of the criminal killer is a must. The Rigveda defines a warrior as one who wields the invincible weapon of war, Vajra, for the common good of the society. He fights the battle with self-confidence, high morale and velour against terrorists. 

 

A Vedic warrior against terrorist has to keep himself cool, calm and collected. Let the like-minded men and women consolidate the forces of good people against the evil terrorists and eliminate them once for all. It is high time the saints wielded the Vedic Vajra and killed the sinner-killers. According to the Vedic philosophy God is one. He is without a form or shape. He is never born in this world and, therefore the question of His death or disappearance does not arise. In other words, Vedas do not subscribe to the theory of AVATAR or God coming to this world in a human form to help man.

 

God is omnipresent, omniscient and all powerful to run this universe as per the divine laws which He too does not break or infringe. The Vedic Dharma does not subscribe to the theory of God deputing prophets to run His errands. There is a direct communication between God and man and there is no place for a middleman. That is why the treasure of Vedic knowledge made available to man through mantras does not envisage a godman who is different from a common man. It is indeed the divine right of men and women to delve deep into the Vedic realm and live a life of righteousness. 

 

Vedas lay an emphasis on the Truth.”Satyam Vad, Dharmam Chara” is the epitome of the path of righteousness. It means: tell the truth and go by the principles of Dharma or the code of conduct aiming at purity in life. One may wonder if that is a pragmatic philosophy of life. Of course it is. A path strewn with untruth and dishonesty may pay seemingly rich dividends but in actual fact these dividends are ephemeral. A short –term gain may eventually lead one into a dark abyss where one is condemned to live in pain and misery forever.

 

The Vedic way of life takes care of life after death which is followed by a rebirth. What Samskaar a soul acquires when it is embodied has its effects in the birth after death too. Vedas prescribe a clean life which pays dividends many times over. 

 

The Vedas prescribe a four-fold path to Moksha or liberation of soul from the endless cycle of birth, death and rebirth. It is DHARMA, ARTHA, KAAMA and MOKSHA. As we proceed further in subsequent chapters, we shall dwell on the salient aspects of this four-fold path. For the time being one may understand that Dharma takes one on the right course of life, Artha enables one to earn wealth by the sweat of brow, kaama enables one to have a high ideal to be achieved through hard work. Should a man or a woman follow this Vedic path, Moksha or liberation from birth, death and rebirth will not be far to seek.

 

Brigadier Chitranjan Sawant

VSM “UPVAN”, 609, Sector 29,

NOIDA-201303 INDIA

==

 

 

From: Subodh Kumar < >

 

 

मन्यु का महत्व

 

मन्यु का अर्थ  दुष्टों पर क्रोध है. इसी लिए यजुर्वेद 19.9 में प्रार्थना है .मन्युरसि मन्युं मयि धेहि, हे दुष्टों पर क्रोध करने वाले (परमेश्वर) ! आप दुष्ट कामों और दुष्ट जीवो पर क्रोध करने का स्वभाव मुझ में  भी  रखिये. भारत वर्ष  में महाभारत के पश्चात ऐसा लगता है कि समाज मन्यु  विहीन हो गया.  तभी तो हम सब दुष्टों के व्यवहार को परास्त न कर के , उन से समझौता करते चले  आ रहे  हैं . समाज राष्ट्र संस्कृति की सुरक्षा के लिए, मन्यु कितना मह्त्व का  विषय है यह इस बात से सिद्ध होता है कि ऋग्वेद मे पूरे दो सूक्त केवल मन्यु पर हैं. और इन्हीं दोनो सूक्तों का अथर्व वेद मे पुनः उपदेश मिलता है.

 

Rig Veda Book 10 Hymn 83 same as AV 4.32

यस्ते मन्योSविधद्वज्र सायक सह ओजः पुष्यति विश्वमानुषक |

साह्याम दासमार्यं त्वया युजा सहस्कृतेन सहसा सहस्वता || ऋ 10/83/1

(वज्र सायक मन्यो)  Confidence is born out of being competently equipped and trained to perform a job.

 

हे मन्यु, जिस ने तेरा आश्रयण किया है, वह अपने शस्त्र सामर्थ्य को, समस्त बल और पराक्रम को निरन्तर पुष्ट करता है.साहस से उत्पन्न हुवे बल और परमेश्वर के साहस रूपि सहयोग से समाज का अहित करने वालों पर  बिना मोह माया ( स्वार्थ, दुख) के यथा योग्य कर्तव्य करता  है.

 

मन्युरिन्द्रो मन्युरेवास देवो मन्युर्होता वरुणो जातवेदाः |

मन्युं विश ईळते मानुषीर्याः पाहि नो मन्यो तपसा सजोषाः || ऋ 10/83/2

 

मन्युदेव इंद्र जैसा सम्राट है. मन्युदेव ज्ञानी सब ओर से प्रचेत ,सचेत तथा धनी वरुण जैसे गुण वाला है  .वही यज्ञाग्नि द्वारा समस्त वातावरण और समाज मे कल्याण कारी तप के उत्साह से सारी मानव प्रजा का सहयोग प्राप्त करने मे समर्थ होता है. (सैनिकों और अधिकारियों के मनों में यदि मन्यु की उग्रता न हो तो युद्ध में सफलता नहीं हो सकती. इस प्रकार युद्ध में मन्यु ही पालक तथा रक्षक होता है.)

 

अभीहि मन्यो तवसस्तवीयान् तपसा युजा वि जहि शत्रून् |

अमित्रहा वृत्र हा दस्युहा च विश्वा वसून्या भरा त्वं नः || ऋ 10/83/3

 

हे वज्ररूप, शत्रुओं के लिए अन्तकारिन्‌ , परास्त करने की शक्ति के साथ उत्पन्न होने वाले, बोध युक्त क्रोध ! अपने कर्म के साथ प्रजा को स्नेह दे कर अनेक सैनिकों के बल द्वारा समाज को महाधन उपलब्ध करा.

 

त्वं हि मन्यो अभिभूत्योजाः सवयंभूर्भामो अभिमातिषाहः |

विश्वचर्षणिः सहुरिः सहावानस्मास्वोजः पर्तनासु धेहि || ऋ 10/83/4

 

हे बोधयुक्त क्रोध मन्यु!

सब को परास्त कारी ओज वाला, स्वयं सत्ता वाला, अभिमानियों का  पराभव  करने वाला , तू विश्व का शीर्ष नेता है. शत्रुओं के आक्रमण को जीतने वाला विजयवान है. प्रजाजनों, अधिकारियों, सेना में अपना ओज स्थापित कर.

 

अभागः सन्नप परेतो अस्मि तव क्रत्वा तविषस्यप्रचेतः |

तं त्वा मन्यो अक्रतुर्जिहीळाहं स्वा तनूर्बलदेयाय मेहि ||ऋ 10/83/5

 

हे त्रिकाल दर्शी मन्यु, तेरे वृद्धिकारक  कर्माचरण से विमुख हो कर , मैने तेरा निरादर किया है ,मैं पराजित  हुवा हूँ. हमें अपना बल तथा ओज शाली स्वरूप दिला.

 

अयं ते अस्म्युप मेह्यर्वाङ्  प्रतीचीनः सहुरे विश्वधायः |

मन्यो वज्रिन्नभि मामा ववृत्स्व हनाव दस्यूंरुत बोध्यापेः || ऋ 10/83/6

 

हे प्रभावकारी समग्र शक्ति प्रदान करने वाले मन्यु, हम तेरे अपने हैं .  बंधु अपने आयुध और बल के साथ हमारे पास लौट कर आ, जिस से हम तुम्हारे सहयोग से सब अहित करने वाले शत्रुओं पर सदैव विजय पाएं.

 

अभि प्रेहि दक्षिणतो भवा मे Sधा वृत्राणि जङ्घनाव भूरि |

जुहोमि ते धरुणं मध्वो अग्रमुभा उपांशु प्रथमा पिबाव ||ऋ 10/83/7

 

हे मन्यु , मैं तेरे श्रेष्ठ भाग और पोषक, मधुररस की स्तुति करता हूं . हम दोनो युद्धारम्भ से पूर्व अप्रकट मंत्रणा करें ( जिस से हमारे शत्रु को हमारी योजना की पूर्व जानकारी न हो). हमारा दाहिना हाथ बन, जिस से हम राष्ट्र  का आवरण करने वाले शत्रुओं पर विजय पाएं.

****************************************************************

 

Rig Veda Book 10 Hymn 84 same as AV 4.31

 

त्वया मन्यो सरथमारुजन्तो हर्षमाणासो धर्षिता मरुत्वः |

तिग्मेषव आयुधा संशिशाना अभि प्र यन्तु नरो अग्निरूपाः || ऋ 10/84/1 अथव 4.31.1

 

हे  मरने  की अवस्था में भी उठने की प्रेरणा करने  वाले  मन्यु , उत्साह !  तेरी सहायता से रथ सहित शत्रु को विनष्ट करते हुए और स्वयं आनन्दित  और प्रसन्न चित्त हो कर  हमें उपयुक्त शस्त्रास्त्रों से अग्नि के समान तेजस्वी नेत्रित्व  प्राप्त हो.

 

अग्निरिव मन्यो तविषितः सहस्व सेनानीर्नः सहुरे हूत एधि |

हत्वाय शत्रून् वि भजस्व वेद ओजो मिमानो वि मृधो नुदस्व ||ऋ 10/84/2 अथर्व 4.31.2

 

हे उत्साह रूपि मन्यु तू अग्नि के समान तेजस्वी हो कर, हमें समर्थ बना. घोष और  वाणी से आह्वान  करता हुवा  हमारी सेना  को नत्रित्व प्रदान करने वाला हो. अपने शस्त्र बल को नापते  हुए  शत्रुओं को परास्त करा के हटा दे.

 

सहस्व मन्यो अभिमातिमस्मे रुजन् मृणन् प्रमृन् प्रेहि शत्रून् |

उग्रं ते पाजो नन्वा रुरुध्रे वशी वशं नयस एकज त्वम् || ऋ 10/84/3अथर्व 4.31.3

 

अभिमान करने वाले शत्रुओं को नष्ट करने का तुम अद्वितीय  सामर्थ्य रखते हो.

 

एको बहूनामसि मन्यवीळितो विशं-विशं युधये सं शिशाधि |

अकृत्तरुक त्वया युजा वयं द्युमन्तं घोषं विजयाय कर्ण्महे || ऋ 10/84/4अथर्व 4.31.4

 

(मन्यो एक: बहूनां ईडिता असि) (विशं विशं युद्धाय सं शिशाधि) (अ कृत्त रुक त्वया युजा वयं ) (द्युमन्तं घोषं विजयाय कृण्मसि)

 

विजेषकृदिन्द्र इवानवब्रवो Sस्माकं मन्यो अधिपा भवेह |

प्रियं ते नाम सहुरे गृणीमसि विद्मा तमुत्सं आबभूथ ||  ऋ 10/84/5अथत्व 4.31.5

( मन्यो इन्द्र: इव विजेष्कृत् ) (अनवब्रव: ) (इह अस्माकं अधिवा: भव)( सहुरे ते प्रियं नाम गृणमसि) ( तं उत्सं विद्म) (यत: आ बभूव)

 

आभूत्या सहजा वज्र सायक सहो बिभर्ष्यभिभूत उत्तरम |

क्रत्वा नो मन्यो सह मेद्येधि महाधनस्य पुरुहूतसंसृजि ||ऋ 10/84/6  अथर्व 4.31.6

 

संसृष्टं धनमुभयं समाकृतमस्मभ्यं दत्तां वरुणश्च मन्युः |

भियं दधाना हर्दयेषु शत्रवः पराजितासो अप नि लयन्ताम् || ऋ10/84/7  AV4.31.7

 

हे मन्यु ,  बोधयुक्त क्रोध , समाज के शत्रुओं द्वारा (चोरी से) प्राप्त प्रजा के धन को तथा उन शत्रुओं  के द्वारा राष्ट्र से पूर्वतः एकत्रित किये  गये  दोनो प्रकार के धन को शत्रु के साथ युद्ध में जीत कर सब प्रजाजनों अधिकारियों को प्रदान कर (बांट). पराजित शत्रुओं के हृदय में इतना भय उत्पन्न कर दे कि वे निलीन हो जाएं.

 

( क्या यह स्विस बेंकों मे राष्ट्र के धन के बारे में उपदेश नहीं है?)

Subodh Kumar

 

 

India is a Hindu nation

India is a Hindu nation

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.