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R Sing < >

Story of ISLAMIC SEPARATISM that ended in PARTITION

 

Thank you for the brave response.

Your extremely moving description of the scene at Amritsar railway station on August 15, 1947, will become an eternal page in the history of Hindusthan.

 

We, who were betrayed along with our sacred and divine Mother India, will NEVER LET THE RULING “RATS & JACKALS” BURY THE DEAD & DETAILS OF THE HIGH TREASON THAT IS CALLED “PARTITION OF INDIA!”

 

rajput

14 June 17

 

From: Mohan Alok < >

 

Dear Sir,

Your following statement does not surprise me.

“I could never understand as to how our own Jawaharlal NEHRU (“priya neta”) could “congratulate” the first Governor General of Pakistan, Mohammed Ali Jinnah, over the dead bodies of two million massacred Hindus and Sikhs, by officially recognizing the bogus new borders drawn right through the States of Bengal and Punjab” as people of the remaining un partitioned regions of India always considered these leaders as their role models and had no sympathy for our communities.

 

Rather they made these leaders as their role models like Fathers Uncles and so on .

Sir One of the survivor of 1947 partition had told me that consequent to cold blooded massacres of Hindus dead bodies of millions of Hindus were thrown into rivers especially “Ravi River”.

 

Nehru and Jinnah went ahead with   the unjustified river water agreement with Pakistan so as to maintain river flow so that the dead bodies of Hindus are carried to sea and no evidence is left against the perpetrators of crime.

(Else there was no reason to deprive Punjab from it rightful share of 50 percent water)

I shall also like to share another post received by me just now

 

😢पहली ट्रेन पाकिस्तान से (15.8.1947) 😢

 

अमृतसर का लाल इंटो वाला रेलवे स्टेशन अच्छा खासा शरणार्थियों कैम्प बना हुआ था!पंजाब के पाकिस्तानी हिस्से से भागकर आये हुए हज़ारों हिन्दुओ-सिखों को यहाँ से दूसरे ठिकानों पर भेजा जाता था ! वे धर्मशालाओं में, टिकट की खिड़की के पास, प्लेट फार्मों पर भीड़ लगाये अपने खोये हुए मित्रों और रिश्तेदारों को हर आने वाली गाड़ी मै खोजते थे…15 अगस्त 1947 को तीसरे पहर के बाद स्टेशन मास्टर छैनी सिंह अपनी नीली टोपी और हाथ में सधी हुई लाल झंडी का सारा रौब दिखाते हुए पागलों की तरह रोती-बिलखती भीड़ को चीरकर आगे बढे…थोड़ी ही देर में 10 डाउन, पंजाब मेल के पहुँचने पर जो द्रश्य सामने आने वाला था, उसके लिये वे पूरी तरह तैयार थे….मर्द और औरतें थर्ड क्लास के धूल से भरे पीले रंग के डिब्बों की और झपट पडेंगे और बौखलाए हुए उस भीड़ में किसी ऐसे बच्चे को खोजेंगे, जिसे भागने की जल्दी में पीछे छोड़ आये थे ! चिल्ला चिल्ला कर लोगों के नाम पुकारेंगे और व्यथा और उन्माद से विहल होकर भीड़ में एक दूसरे को ढकेलकर-रौंदकर आगे बढ़ जाने का प्रयास करेंगे ! आँखो में आँसू भरे हुए एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे तक भाग भाग कर अपने किसी खोये हुए रिश्तेदार का नाम पुकारेंगे! अपने गाँव के किसी आदमी को खोजेंगे कि शायद कोई समाचार लाया हो ! आवश्यक सामग्री के ढेर पर बैठा कोई माँ बाप से बिछडा हुआ कोई बच्चा रो रह होगा, इस भगदड़ के दौरान पैदा होने वाले किसी बच्चे को उसकी माँ इस भीड़-भाड़ के बीच अपना ढूध पिलाने की कोशिश कर रही होगी….

स्टेशन मास्टर ने प्लेट फार्म एक सिरे पर खड़े होकर लाल झंडी दिखा ट्रेन रुकवाई ….जैसे ही वह फौलादी दैत्याकार गाड़ी रुकी, छैनी सिंह ने एक विचित्र द्रश्य देखा..चार हथियार बंद सिपाही, उदास चेहरे वाले इंजन ड्राइवर के पास अपनी बंदूकें सम्भाले खड़े थे !! जब भाप की सीटी और ब्रेको के रगड़ने की कर्कश आवाज बंद हुई तो स्टेशन मास्टर को लगा की कोई बहुत बड़ी गड़बड़ है…प्लेट फार्म पर खचाखच भरी भीड़ को मानो साँप सुंघ गया हो..उनकी आँखो के सामने जो द्रश्य था उसे देखकर वह सन्नाटे में आ गये थे !

स्टेशन मास्टर छेनी सिंह आठ डिब्बों की लाहौर से आई उस गाड़ी को आँखे फाड़े घूर रहे थे! हर डिब्बे की सारी खिड़कियां खुली हुई थी, लेकिन उनमें से किसी के पास कोई चेहरा झाँकता हुआ दिखाई नहीँ दे रहा था, एक भी दरवाजा नहीँ खुला.. एक भी आदमी नीचे नहीँ उतरा,उस गाड़ी में इंसान नहीँ #भूत आये थे..स्टेशन मास्टर ने आगे बढ़कर एक झटके के साथ पहले डिब्बे के द्वार खोला और अंदर गये..एक सेकिंड में उनकी समझ में आ गया कि उस रात न.10 डाउन पंजाब मेल से एक भी शरणार्थी क्यों नही उतरा था..वह भूतों की नहीँ बल्कि #लाशों की गाड़ी थी..उनके सामने डिब्बे के फर्श पर इंसानी कटे-फटे जिस्मों का ढेर लगा हुआ था..किसी का गला कटा हुआ था.किसी की खोपडी चकनाचूर थी ! किसी की आते बाहर निकल आई थी…डिब्बों के आने जाने वाले रास्ते मे कटे हुए हाथ-टांगे और धड़ इधर उधर बिखरे पड़े थे..इंसानों के उस भयानक ढेर के बीच से छैनी सिंह को अचानक किसी की घुटी.घुटी आवाज सुनाई दी ! यह सोचकर की उनमें से शायद कोई जिन्दा बच गया हो उन्होने जोर से आवाज़ लगाई..”अमृतसर आ गया है यहाँ सब हिंदू और सिख है.पुलिस मौजूद है, डरो नहीँ”..उनके ये शब्द सुनकर कुछ मुरदे हिलने डुलने लगे..इसके बाद छैनी सिंह ने जो द्रश्य देखा वह उनके दिमाग पर एक भयानक स्वप्न की तरह हमेशा के लिये अंकित हो गया …एक स्त्री ने अपने पास पड़ा हुआ अपने पति का ‘कटा सर’ उठाया और उसे अपने सीने से दबोच कर चीखें मारकर रोने लगी…उन्होंने बच्चों को अपनी मरी हुई माओ के सीने से चिपट्कर रोते बिलखते देखा..कोई मर्द लाशों के ढेर में से किसी बच्चे की लाश निकालकर उसे फटी फटी आँखों से देख रहा था..जब प्लेट फार्म पर जमा भीड़ को आभास हुआ कि हुआ क्या है तो उन्माद की लहर दौड़ गयी…स्टेशन मास्टर का सारा शरीर सुन्न पड़ गया था वह लाशों की कतारो के बीच गुजर रहा था…हर डिब्बे में यही द्रश्य था अंतिम डिब्बे तक पहुँचते पहुँचते उसे मतली होने लगी और जब वह ट्रेन से उतरा तो उसका सर चकरा रहा था उनकी नाक में मौत की बदबू बसी हुई थी और वह सोच रहे थे की रब ने यह सब कुछ होने कैसे दिया ? मुस्लिम कौम इतनी निर्दयी हो सकती है कोई सोच भी नहीँ सकता था….उन्होने पीछे मुड़कर एक बार फ़िर ट्रेन पर नज़र डाली…हत्यारों ने अपना परिचय देने के लिये अंतिम डिब्बे पर मोटे मोटे सफेद अक्षरों से लिखा था…..”यह पटेल और नेहरू को हमारी ओर से आज़ादी का नज़राना है ” !

 

तो यह है वह ‘गज़वा ए हिन्द’ का सच जो कांग्रेसियों व सेकुलर गिरोह ने हिन्दुओ के सामने कभी आने नही दिया..अब होश में आओ हिन्दुओं !! वरना हम व हमारा हिंदुस्तान एक दिन इतिहास में सिमट कर रहा जायेगा !!

हिंदू-सिख लाशों से भरी यह अकेली और आखिरी गाडी नहीं थी !!😢😢

(आंसू और खून)

I WISH OUR GOVERNMENT WAKES UP AND INVESTIGATE ALL INJUSTICES DONE TO OUR PREVIOUS GENERATIONS BY NEHRU AND PARTY (CONGRESS)

Best regards

AM

 

From: Pramod Agrawal < >

मुगलों के हरम की औलाद को हरामजादा कहा जाता है।

 

शाहजहाँ के हरम में ८००० रखैलें थीं जो उसे उसके पिता जहाँगीर से विरासत में मिली थी। उसने बाप की सम्पत्ति को और बढ़ाया। उसने हरम की महिलाओं की व्यापक छाँट की तथा बुढ़ियाओं को भगा कर और अन्य हिन्दू परिवारों से बलात लाकर हरम को बढ़ाता ही रहा।” (अकबर दी ग्रेट मुगल : वी स्मिथ, पृष्ठ ३५९)

 

कहते हैं कि उन्हीं भगायी गयी महिलाओं से दिल्ली का रेडलाइट एरिया जी.बी. रोड गुलजार हुआ था और वहाँ इस धंधे की शुरूआत हुई थी। जबरन अगवा की हुई हिन्दू महिलाओं की यौन-गुलामी और यौन व्यापार को शाहजहाँ प्रश्रय देता था, और अक्सर अपने मंत्रियों और सम्बन्धियों को पुरस्कार स्वरूप अनेकों हिन्दू महिलाओं को उपहार में दिया करता था।

यह नर पशु,यौनाचार के प्रति इतना आकर्षित और उत्साही था,कि हिन्दू महिलाओं का मीना बाजार लगाया करता था, यहाँ तक कि अपने महल में भी।

 

सुप्रसिद्ध यूरोपीय यात्री फ्रांकोइस बर्नियर ने इस विषय में टिप्पणी की थी कि, ”महल में बार-बार लगने वाले मीना बाजार,

जहाँ अगवा कर लाई हुई सैकड़ों हिन्दू महिलाओं का, क्रय-विक्रय हुआ करता था,राज्य द्वारा बड़ी संख्या में नाचने वाली लड़कियों की व्यवस्था,और नपुसंक बनाये गये सैकड़ों लड़कों की हरमों में उपस्थिती, शाहजहाँ की अनंत वासना के समाधान के लिए ही थी। (टे्रविल्स इन दी मुगल ऐम्पायर-फ्रान्कोइसबर्नियर :पुनः लिखित वी. स्मिथ, औक्सफोर्ड १९३४)

 

**शाहजहाँ को प्रेम की मिसाल के रूप पेश किया जाता रहा है और किया भी क्यों न जाए।

 

८००० औरतों को अपने हरम में रखने वाला अगर किसी एक में ज्यादा रुचि दिखाए तो वो उसका प्यार ही कहा जाएगा।आप यह जानकर हैरान हो जायेंगे कि मुमताज का नाम मुमताज महल था ही नहीं बल्कि उसका असली नाम “अर्जुमंद-बानो-बेगम” था। और तो और जिस शाहजहाँ और मुमताज के प्यार की इतनी डींगे हांकी जाती है वो शाहजहाँ की ना तो पहली पत्नी थी ना ही आखिरी । मुमताज शाहजहाँ की सात बीबियों में चौथी थी। इसका मतलब है कि शाहजहाँ ने मुमताज से पहले 3 शादियाँ कर रखी थी और,मुमताज से शादी करने के बाद भी उसका मन नहीं भरा तथा उसके बाद भी उस ने 3 शादियाँ और की यहाँ तक कि मुमताज के मरने के एक हफ्ते के अन्दर ही उसकी बहन फरजाना से शादी कर ली थी। जिसे उसने रखैल बना कर रखा हुआ था जिससे शादी करने से पहले ही शाहजहाँ को एक बेटा भी था।

अगर शाहजहाँ को मुमताज से इतना ही प्यार था तो मुमताज से शादी के बाद भी शाहजहाँ ने 3 और शादियाँ क्यों की….?????

अब आप यह भी जान लो कि शाहजहाँ की सातों बीबियों में सबसे सुन्दर मुमताज नहीं बल्कि इशरत बानो थी जो कि उसकी पहली पत्नी थी । उस से भी घिनौना तथ्य यह है कि शाहजहाँ से शादी करते समय मुमताज कोई कुंवारी लड़की

नहीं थी बल्कि वो शादीशुदा थी और,उसका पति शाहजहाँ की सेना में सूबेदार था जिसका नाम “शेर अफगान खान” था।शाहजहाँ ने शेर अफगान खान की हत्या कर मुमताज से शादी की थी। गौर करने लायक बात यह भी है कि ३८ वर्षीय

मुमताज की मौत कोई बीमारी या एक्सीडेंट से नहीं बल्कि चौदहवें बच्चे को जन्म देने के दौरान अत्यधिक कमजोरी के कारण हुई थी। यानी शाहजहाँ ने उसे बच्चे पैदा करने की मशीन ही नहीं बल्कि फैक्ट्री बनाकर मार डाला। **शाहजहाँ कामुकता के लिए इतना कुख्यात था कि कई इतिहासकारों ने उसे उसकी अपनी सगी बेटी जहाँआरा के साथ स्वयं सम्भोग करने का दोषी कहा है।

 

शाहजहाँ और मुमताज महल की बड़ी बेटी जहाँआरा बिल्कुल अपनी माँ की तरह लगती थी। इसीलिए मुमताज की मृत्यु के बाद उसकी याद में लम्पट शाहजहाँ ने अपनी ही बेटी जहाँआरा को फंसाकर भोगना शुरू कर दिया था। जहाँआरा को शाहजहाँ इतना प्यार करता था कि उसने उसका निकाह तक होने न दिया। बाप-बेटी के इस प्यार को देखकर जब महल में

चर्चा शुरू हुई,तो मुल्ला-मौलवियों की एक बैठक बुलाई गयी और उन्होंने इस पाप को जायज ठहराने के लिए एक हदीस का उद्धरण दिया और कहा कि – “माली को अपने द्वारा लगाये पेड़ का फल खाने का हक़ है”।

(Francois Bernier wrote, ” Shah Jahan used to have regular sex with his eldest daughter Jahan Ara. To defend himself,Shah Jahan used to say that, it was the privilege of a planter to taste the fruit of the tree he had planted.”)

 

**इतना ही नहीं जहाँआरा के किसी भी आशिक को वह उसके पास फटकने नहीं देता था। कहा जाता है की एकबार जहाँआरा जब अपने एक आशिक के साथ इश्क लड़ा रही थी तो शाहजहाँ आ गया जिससे डरकर वह हरम के तंदूर में छिप गया, शाहजहाँ नेतंदूर में आग लगवा दी और उसे जिन्दा जला दिया।

 

**दरअसल अकबर ने यह नियम बना दिया था कि मुगलिया खानदान की बेटियों की शादी नहीं होगी।

इतिहासकार इसके लिए कई कारण बताते हैं। इसका परिणाम यह होता था कि मुग़लखानदान की लड़कियां अपने जिस्मानी भूख मिटाने के लिए अवैध तरीके से दरबारी,नौकर के साथ साथ, रिश्तेदार यहाँ तक की सगे सम्बन्धियों का भी सहारा लेती थी।

 

**जहाँआरा अपने लम्पट बाप के लिए लड़कियाँ भी फंसाकर लाती थी। जहाँआरा की मदद से शाहजहाँ ने मुमताज के भाई शाइस्ता खान की बीबी से कई बार बलात्कार किया था।

**शाहजहाँ के राजज्योतिष की 13 वर्षीय ब्राह्मण लडकी को जहाँआरा ने अपने महल में बुलाकर धोखे से नशा करा बाप के हवाले कर दिया था जिससे शाहजहाँ ने 58 वें वर्ष में उस 13 बर्ष की ब्राह्मण कन्या से निकाह किया था। बाद में इसी ब्राहम्ण कन्या ने शाहजहाँ के कैद होने के बाद औरंगजेब से बचने और एक बार फिर से हवस की सामग्री बनने से खुद को बचाने के लिए अपने ही हाथों अपने चेहरे पर तेजाब डाल लिया था। **शाहजहाँ शेखी मारा करता था कि ‘ ‘वह तिमूर

(तैमूरलंग)का वंशज है जो भारत में तलवार और अग्नि लाया था। उस उजबेकिस्तान के जंगली जानवर तिमूर से और

उसकी हिन्दुओं के रक्तपात की उपलब्धि से इतना प्रभावित था कि उसने अपना नाम तिमूरद्वितीय रख लिया

(दी लीगेसी ऑफ मुस्लिम रूल इन इण्डिया-डॉ. के.एस. लाल, १९९२ पृष्ठ- १३२).

 

**बहुत प्रारम्भिक अवस्था से ही शाहजहाँ ने काफिरों (हिन्दुओं) के प्रति युद्ध के लिए साहस व रुचि दिखाई थी।

अलग-अलग इतिहासकारों ने लिखा था कि, ”शहजादे के रूप में ही शाहजहाँ ने फतेहपुर सीकरी पर अधिकार करलिया था और आगरा शहर में हिन्दुओं का भीषण नरसंहार किया था ।

 

**भारत यात्रा पर आये देला वैले,इटली के एक धनी व्यक्ति के अुनसार -शाहजहाँ की सेना ने भयानक बर्बरता का परिचय कराया था। हिन्दू नागरिकों को घोर यातनाओं द्वारा अपने संचित धन को दे देने के लिए विवश किया गया,और अनेकों

उच्च कुल की कुलीन हिन्दू महिलाओं का शील भंग किया गया।” (कीन्स हैण्ड बुक फौर विजिटर्स टू आगरा एण्ड

इट्सनेबरहुड, पृष्ठ २५)

 

**हमारे वामपंथी इतिहासकारों ने शाहजहाँ को एक महान निर्माता के रूप में चित्रित किया है। किन्तु इस मुजाहिद ने अनेकों कला के प्रतीक सुन्दर हिन्दू मन्दिरों और अनेकों हिन्दू भवन निर्माण कला के केन्द्रों का बड़ी लगन और जोश से विध्वंस किया था अब्दुल हमीद ने अपने इतिहास अभिलेख, ‘बादशाहनामामें लिखा था-महामहिम शहंशाह महोदय की सूचना में लाया गया कि हिन्दुओं के एक प्रमुख केन्द्र,बनारस में उनके अब्बा हुजूर के शासनकाल में अनेकों मन्दिरों के

पुनः निर्माण का काम प्रारम्भ हुआ था और काफिर हिन्दू अब उन्हें पूर्ण कर देने के निकट आ पहुँचे हैं।

इस्लाम पंथ के रक्षक,शहंशाह ने आदेश दिया कि बनारस में और उनके सारे राज्य में अन्यत्र सभी

स्थानों पर जिन मन्दिरों का निर्माण कार्य आरम्भ है, उन सभी का विध्वंस कर दिया जाए।

 

**इलाहाबाद प्रदेश से सूचना प्राप्त हो गई कि जिला बनारस के छिहत्तर मन्दिरों का ध्वंस कर दिया गया था।

(बादशाहनामा : अब्दुल हमीद लाहौरी, अनुवाद एलियट और डाउसन, खण्ड VII, पृष्ठ ३६)

 

**हिन्दू मंदिरों को अपवित्र करने और उन्हें ध्वस्त करनेकी प्रथा ने शाहजहाँ के काल में एक व्यवस्थित विकराल रूप धारण कर लिया था। (मध्यकालीन भारत – हरीश्चंद्र वर्मा – पेज-१४१)

 

*”कश्मीर से लौटते समय १६३२ में शाहजहाँ को बताया गया कि अनेकों मुस्लिम बनायी गयी महिलायें फिर से हिन्दू हो गईं हैं और उन्होंने हिन्दू परिवारों में शादी कर ली है। शहंशाह के आदेश पर इन सभी हिन्दुओं को बन्दी बना लिया गया।

प्रथम उन सभी पर इतना आर्थिक दण्ड थोपा गया कि उनमें से कोई भुगतान नहीं कर सका। तब इस्लाम स्वीकार कर लेने और मृत्यु में से एक को चुन लेने का विकल्प दिया गया। जिन्होनें धर्मान्तरण स्वीकार नहीं किया, उन सभी पुरूषों का सर काट दिया गया। लगभग चार हजार पाँच सौं महिलाओं को बलात् मुसलमान बना लिया गया और उन्हें सिपहसालारों, अफसरों और शहंशाह के नजदीकी लोगों और रिश्तेदारों के हरम में भेज दिया गया।” (हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ दी इण्डियन पीपुल : आर.सी. मजूमदार, भारतीय विद्या भवन,पृष्ठ३१२)

 

* १६५७ में शाहजहाँ बीमार पड़ा और उसी के बेटे औरंगजेब ने उसे उसकी रखैल जहाँआरा के साथ आगरा के किले में बंद कर दिया। परन्तु औरंगजेब मे एक आदर्श बेटे का भी फर्ज निभाया और अपने बाप की कामुकता को समझते हुए उसे अपने

साथ ४० रखैलें (शाही वेश्याएँ) रखने की इजाजत दे दी। दिल्ली आकर उसने बाप के हजारों रखैलों में से कुछ गिनी चुनी औरतों को अपने हरम में डालकर बाकी सभी को उसने किले से बाहर निकाल दिया। उन हजारों महिलाओं को भी दिल्ली के उसी हिस्से में पनाह मिली जिसे आज दिल्ली का रेड लाईट एरिया जीबी रोड कहा जाता है। जो उसके अब्बा शाहजहाँ की मेहरबानी से ही बसा और गुलजार हुआ था ।

 

***शाहजहाँ की मृत्यु आगरे के किले में ही २२ जनवरी १६६६ ईस्वी में ७४ साल की उम्र में द हिस्ट्री चैन शाहजहाँ की मृत्यु आगरे के किले में ही २२ जनवरी १६६६ ईस्वी में ७४ साल की उम्र में द हिस्ट्री चैनल के अनुसार अत्यधिक कमोत्तेजक दवाएँ खा लेने का कारण हुई थी। यानी जिन्दगी के आखिरी वक्त तक वो अय्याशी ही करता रहा था।

** अब आप खुद ही सोचें कि क्यों ऐसे बदचलन और दुश्चरित्र इंसान को प्यार की निशानी समझा कर महानबताया जाता है…… ????? क्या ऐसा बदचलन इंसान कभी किसी से प्यार कर सकता है….?????

क्या ऐसे वहशी और क्रूर व्यक्ति की अय्याशी की कसमेंखाकर लोग अपने प्यार को बे-इज्जत नही करते हैं ??

 

दरअसल ताजमहल और प्यार की कहानी इसीलिए गढ़ी गयी है कि लोगों को गुमराह किया जा सके और लोगों खास कर हिन्दुओं से छुपायी जा सके कि ताजमहल कोई प्यार की निशानी नहीं बल्कि महाराज जय सिंह द्वारा बनवाया गया भगवान् शिव का मंदिर””तेजो महालय”” है….! और जिसे प्रमाणित करने के लिए डा० सुब्रहमण्यम स्वामी आज भी सुप्रीम कोर्ट में सत्य की लड़ाई लड़ रहे हैं।

 

** असलियत में मुगल इस देश में धर्मान्तरण, लूट-खसोट और अय्याशी ही करते रहे परन्तु नेहरू के आदेश पर हमारे इतिहासकारों नें इन्हें जबरदस्ती महान बनाया। और ये सब हुआ झूठी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर। #साभार_समाधान blogspot, ना जाने किस मुंह से सेकुलर कहते हैं कि हिन्दू मुस्लिम भाई भाई या ईश्वर अल्ला तेरो नाम?

 

सदा सर्वदा सुमंगल,

हर हर महादेव,

जय भवानी,

जय श्री राम.

 

 

From: Pramod Agrawal < >

शुर्णपंखा और इस्लाम ।

 

रामायण में सभी राक्षसों का वध हुआ था। लेकिन शूर्पनखा का वध नहीं हुआ था .उसकी नाक और कान काट कर छोड़ दिया गया था । वह कपडे से अपने चेहरे को छुपा कर रहती थी ।

 

रावण के मर जाने के बाद वह अपने पति के साथ शुक्राचार्य के पास गयी और जंगल में उनके आश्रम में रहने लगी ।

राक्षसों का वंश ख़त्म न हो इसलिए, शुक्राचार्य ने शिव जी की आराधना की ।

 

शिव जी ने अपना स्वरुप शिवलिंग शुक्राचार्य को दे कर कहा की जिस दिन कोई “वैष्णव” इस पर गंगा जल चढ़ा देगा उस दिन राक्षसों का नाश हो जायेगा । उस आत्म लिंग को शुक्राचार्य ने वैष्णव मतलब हिन्दुओं से दूर रेगिस्तान में स्थापित किया जो आज अरब में “मक्का मदीना” में है । शूर्पनखा जो उस समय चेहरा ढक कर रखती थी वो परंपरा को उसके बच्चो ने पूरा निभाया ओर आज भी मुस्लिम औरतें चेहरा ढकी रहती हैं।

 

शूर्पनखा के वंशज आज मुसलमान कहलाते हैं । क्यूँकी शुक्राचार्य ने इनको जीवन दान दिया , इस लिए ये शुक्रवार को विशेष महत्त्व देते हैं ।

 

पूरी जानकारी तथ्यों पर आधारित सच है।⛳

 

जानिए इस्लाम कैसे पैदा हुआ..

 

असल में इस्लाम कोई धर्म नहीं है .एक मजहब है.. दिनचर्या है.. मजहब का मतलब अपने कबीलों के गिरोह को बढ़ाना..

यह बात सब जानते है की मोहम्मदी मूलरूप से अरब वासी है ।

 

अरब देशो में सिर्फ रेगिस्तान पाया जाता है.वहां जंगल नहीं है, पेड़ नहीं है. इसीलिए वहां मरने के बाद जलाने के लिए लकड़ी न होने के कारण ज़मीन में दफ़न कर दिया जाता था.

 

रेगिस्तान में हरीयाली नहीं होती.. ऐसे में रेगिस्तान में हरा चटक रंग देखकर इंसान चला आता की यहाँ जीवन है ओर ये हरा रंग सूचक का काम करता था.

 

अरब देशो में लोग रेगिस्तान में तेज़ धुप में सफ़र करते थे, इसीलिए वहां के लोग सिर को ढकने के लिए टोपी पहनते थे।

जिससे की लोग बीमार न पड़े.

 

अब रेगिस्तान में खेत तो नहीं थे, न फल, तो खाने के लिए वहा अनाज नहीं होता था. इसीलिए वहा के लोग जानवरों को काट कर खाते थे. और अपनी भूख मिटाने के लिए इसे क़ुर्बानी का नाम दिया गया।

 

रेगिस्तान में पानी की बहुत कमी रहती थी, इसीलिए मुत्रमार्ग साफ करने में पानी बर्बाद न हो जाये इसीलिए लोग खतना कराते थे।

 

सब लोग एक ही कबिले के खानाबदोश होते थे इसलिए आपस में भाई बहन ही निकाह कर लेते थे।

 

रेगिस्तान में मिट्टी मिलती नहीं थी मुर्ती बनाने को इसलिए मुर्ती पुजा नहीं करते थे| खानाबदोश थे , एक जगह से दुसरी जगह जाना पड़ता था इसलिए कम बर्तन रखते थे और एक थाली नें पांच लोग खाते थे|

 

कबीले की अधिक से अधिक संख्या बढ़े इसलिए हर एक को चार बीवी रखने की इज़ाजत दी जाती थी

..

अब समझे इस्लाम कोई धर्म नहीं मात्र एक कबीला है.. और इसके नियम असल में इनकी दिनचर्या है ।

 

नोट : पोस्ट पढ़के इसके बारे में सोचो।

 

#इस्लाम_की_सच्चाई

 

अगर हर हिँदू माँ-बाप अपने बच्चों को बताए कि अजमेर दरगाह वाले ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती ने किस तरह इस्लाम कबूल ना करने पर पृथ्वीराज चौहान की पत्नी संयोगिता को मुस्लिम सैनिकों के बीच बलात्कार करने के लिए निर्वस्त्र करके फेँक दिया था ।

 

और फिर किस तरह पृथ्वीराज चौहान की वीर पुत्रियों ने आत्मघाती बनकर मोइनुद्दीन चिश्ती को 72 हूरों के पास भेजा था।

तो शायद ही कोई हिँदू उस मुल्ले की कब्र पर माथा पटकने जाए .

 

“अजमेर के ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती को ९० लाख हिंदुओं को इस्लाम में लाने का गौरव प्राप्त है ।

मोइनुद्दीन चिश्ती ने ही मोहम्मद गोरी को भारत लूटने के लिए उकसाया और आमंत्रित किया था…

 

(सन्दर्भ – उर्दू अखबार “पाक एक्सप्रेस, न्यूयार्क १४ मई २०१२).

 

 

From: Pramod Agrawal < >

हलाल से हलाला तक !!

इस्लामी पारिभाषिक शब्दों में “हलाल , और “हलाला ” यह ऐसे दो शब्द हैं , जिनका कुरान और हदीसों में कई जगह प्रयोग किया गया है . दिखने में यह दौनों शब्द एक जैसे लगते हैं .यह बात तो सभी जानते हैं कि,जब मुसलमान किसी जानवर के गले पर अल्लाह के नाम पर छुरी चलाकर मार डालते हैं , तो इसे हलाल करना कहते हैं .हलाल का अर्थ “अवर्जित ” होता है . लेकिन हलाला के बारे में बहुत कम लोग ही जानते हैं .क्योंकि इस शब्द का सम्बन्ध मुसलमानों वैवाहिक जीवन और कुरान के महिला .विरोधी कानून से है .क्योंकि कुरान में अल्लाह के बनाये हुए इस जंगली ,और मूर्खता पूर्ण कानून की आड़ में मुल्ले , मौलवी और मुफ्ती खुल कर अय्याशी करते हैं
इस बात को ठीक से समझने के लिए अल्लाह की औरतों के प्रति घोर नफ़रत , और मुसलमानों की पारिवारिक स्थितियों के बारे में जानना बहुत जरूरी है,मुसलमानों में दो दो , तीन तीन औरतें रखना साधारण सी बात है . और फिर मुसलमान रिश्ते की बहिनों से भी शादियाँ कर लेते हैं .और अक्सर संयुक्त परिवार में रहना पसंद करते हैं .इसलिए पति पत्नी में झगड़े होते रहते हैं. और कभी पति गुस्से में पत्नी को तलाक भी दे देता है . चूंकि अल्लाह की नजर में औरतें पैदायशी अपराधी होती है , इसलए कुरान में पति की जगह पत्नी को ही सजा देने का नियम है .यद्यपि तलाक देने के कई कारण और तरीके हो सकते हैं , लेकिन सजा सिर्फ औरत को ही मिलती है . इसे विस्तार से प्रमाण सहित बताया गया है .जो कुरान और हदीसों पर आधारित है .
1-तलाक कैसे हो जाती है 
यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी के सामने तीन बार “तलाक ” शब्द का उच्चारण कर दे , या कहे की मैंने तुझे तीनों तलाक दे दिए , तो तलाक हो जाती है ..क्योंकि इस कथन को उस व्यक्ति की कसम माना जाता है .जैसा की कुरान ने कहा है ,
” और अगर तुम पक्की कसम खाओगे तो उस पर अल्लाह जरुर पकड़ेगा “सूरा – मायदा 5 :89
तलाक के बारे में कुरान की इसी आयत के आधार पर हदीसों में इस प्रकार लिखा है ,
-“इमाम अल बगवी ने कहा है , यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी से कहे की मैंने तुझे दो तलाक दिए और तीसरा देना चाहता हूँ , तब भी तलाक वैध मानी जाएगी .और सभी विद्वानों ने इसे जायज बताया है.(Rawdha al-talibeen 7/73” 

“فرع قال البغوي ولو قال أنت بائن باثنتين أو ثلاث ونوى الطلاق وقع ثم إن نوى طلقتين أو ثلاثا فذاك

-“इमाम इब्न कदमा ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी से कहे कि मैंने तुझे तीनों तलाक दे दिए हैं . लेकिन चाहे उसने यह बात एक ही बार कही हो , फिर भी तलाक हो जायेगा .Al-Kafi 3/122 
إذا قال لزوجته : أنت طالق ثلاثا فهي ثلاث وإن نوى واحدة“

2-अल्लाह की तरकीब 
ऐसा कई बार होता है कि व्यक्ति अपनी पत्नी को तलाक देकर बाद में पछताता है , क्योंकि औरतें गुलामों की तरह काम करती हैं , और बच्चे भी पालती हैं . कुछ पढ़ी लिखी औरतें पैसा कमा कर घर भी चलाती है . इस इसलिए लोग फिर से अपनी औरत चाहते है .
” हे नबी तू नहीं जनता कि कदाचित तलाक के बाद अल्लाह कोई नयी तरकीब सुझा दे ” सूरा -अत तलाक 65 :1
और इस आयत के बाद काफी सोच विचार कर के अल्लाह ने जो उपाय निकाला है ,वह औरतों के लिए शर्मनाक है
3-हलाला 
तलाक़ दी हुई अपनी बीवी को दोबारा अपनाने का एक तरीका है जिस के तहेत मत्लूका(तलाक दी गयी पत्नी ) को किसी दूसरे मर्द के साथ निकाह करना होगा और उसके साथ हम बिस्तरी की शर्त लागू होगी फिर वह तलाक़ देगा, बाद इद्दत ख़त्म औरत का तिबारा निकाह अपने पहले शौहर के साथ होगा, तब जा कर दोनों तमाम जिंदगी गुज़ारेंगे.हलाला के बारे में कुरान और हदीसों में इस प्रकार लिखा है ,
और यदि किसी ने पत्नी को तलाक दे दिया , तो उस स्त्री को रखना जायज नहीं होगा . जब तक वह स्त्री किसी दूसरे व्यक्ति से सहवास न कर ले .फिर वह व्यक्ति भी उसे तलाक दे दे . तो फिर उन दौनों के लिए एक दूसरे की तरफ पलट आने में कोई दोष नहीं होगा “सूरा – बकरा 2 :230

“فَإِن طَلَّقَهَا فَلَا تَحِلُّ لَهُ مِن بَعْدُ حَتَّىٰ تَنكِحَ زَوْجًا غَيْرَهُ ۗ فَإِن طَلَّقَهَا فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا أَن يَتَرَاجَعَا إِن ظَنَّا أَن يُقِيمَا حُدُودَ اللَّهِ ۗ وَتِلْكَ حُدُودُ اللَّهِ يُبَيِّنُهَا لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ 2:230

(नोट -इस आयत में अरबी में ” تحلّل لهُ ‘तुहल्लिल लहु”शब्द आया है , मुस्लिम इसका अर्थ “wedding ” करते हैं , जबकि sexual intercourse सही अर्थ होता है .
इसी से ” हलालाह حلالہ ” शब्द बना है . अंगरेजी के एक अनुवाद में है “uptill she consummated intercourse with another person “यानी जबतक किसी दूसरे व्यक्ति से सम्भोग नहीं करवा लेती .)और तलाक शुदा औरत का हलाला करवाकर घर वापसी को ” रजअ رجع” कहा जाता है .
हलाला इस तरह होता है, पहले तलाकशुदा महिला इद्दत का समय पूरा करे। फिर उसका कहीं और निकाह हो। शौहर के साथ उसके वैवाहिक रिश्ते बनें। इसके बाद शौहर अपनी मर्जी से तलाक दे या उसका इंतकाल हो जाए। फिर बीवी इद्दत का समय पूरा करे। तब जाकर वह पहले शौहर से फिर से निकाह कर सकती है।
बड़े बड़े इस्लाम के विद्वान् तलाक शुदा पत्नी को वापिस रखने के लिए हलाला को सही मानते हैं , देखिये (विडिओ )
Teen Talaaq aur Halala part 1

http://www.youtube.com/watch?v=APVNOo5pVg8

4-हलाला का असली उद्देश्य 
हलाला का उद्देश्य पति पत्नी में सुलह कराना नहीं , बल्कि तलाक दी गयी औरत से वेश्यावृत्ति करना है , जो इन हादिसों से साबित होता है ,
-“आयशा ने कहा कि रसूल के पास रिफ़ा अल कुरैजी कि पत्नी आई और बोली , रीफा ने मुझे तलक दे दिया था . और मैंने अब्दुर रहमान बिन अबू जुबैर से शादी कर ली , लेकिन वह नपुंसक है , अब मैं वापिस रिफ़ाके पास जाना चाहती हूँ . रसूल ने कहा जब तक अब्दुर रहमान तुम्हारे साथ विधिवत सम्भोग नहीं कर लेता , तुम रिफ़ा के पास वापिस नहीं जा सकती .
“إلا إذا كان لديك علاقة جنسية كاملة مع “
Bukhari, Volume 7, Book 63, Number 186
-“उम्मुल मोमिनीन आयशा ने कहा कि एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी से तीन बार तलाक कह दिया , और फिर से अपनी पत्नी से शारीरिक सम्बन्ध बनाने की इच्छा प्रकट की . रसूल ने कहा ऐसा करना बहुत बड़ा गुनाह है .. और जब तक उसकी पत्नी किसी दुसरे मर्द का शहद और वह उसके शहद का स्वाद नहीं चख लेते .
“حتى انها ذاق العسل من الزوج الآخر وذاقه العسل لها “
Abu Dawud, Book 12, Number 2302
5-हलाला व्यवसाय 
जिन मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में पति पत्नी में झगड़े होते रहते हैं ,वहां मुल्ले मुफ्ती अपने दफ्तर बना लेते हैं , और साथ में दस बीस मुस्टंडे भी रखते हैं .इनका काम फतवे देना होता है . चूँकि इस विज्ञानं के युग में नेट , फोन ,और फेक्स जैसे साधन सामान्य है , और उन्ही के द्वारा तलाक देने का रिवाज हो चला है . कई बार मेल या फेक्स से औरत को तलाक की सूचना नहीं मिलती फिर भी मुल्ले तलाक मानकर हलाला तय कर देते हैं .
देखिये देवबंद का फतवा
अगर इंसान शराब के नशे में अपनी बीवी को फोन पर तीन बार तलाक बोल दे, लेकिन बाद में उसे पछतावा हो और वह तलाक न चाहता हो …तो क्या ऐसी सूरत में भी तलाक हो जाएगा’दारुल उलूम देवबंद के फतवा विभाग दारुल इफ्ता से। इस पर मुफ्तियों ने फतवा जारी किया है कि अगर तलाक नशे की हालत में दिया गया हो, तो भी पति-पत्नी का रिश्ता खत्म हो जाएगा। फोन पर दिया गया तलाक भी मान्य है। अगर ऐसा शख्स अपनी बीवी के साथ रहना चाहता है तो हलाला के सिवाय कोई दूसरा विकल्प नहीं है।
the Qazi can separate them both after analyzing the case. Reference Sahih Bukhari 7:63:227 & 231

मुल्ले मुफ्ती फ़ोन से या इशारे से दी गयी तलाक को जिन हदीसों का हवाला देते हैं , उन में से एक यह है ,
-“आयशा ने कहा कि एक व्यक्ति ने सिर्फ तीन तलाक देने का इशारा ही किया था , और तलाक हो गयी , फिर उसकी पत्नी ने दुसरे आदमी से शादी कर ली .और अपने पहले पति के पास जाने की इच्छा प्रकट की . क्या ऐसा संभव है ? रसूल ने कहा जब तक उसका दूसरा व्यक्ति उसे तीसरे आदमी से सहवास नहीं नहीं करा देता , औरत पूर्व पति के पास नहीं जा सकती .Bukhari, Volume 7, Book 63, Number 187
6-हलाली मुल्लों की हकीकत 
चूँकि हलाला करवाने वाली औरत को किसी दूसरे व्यक्ति के साथ सम्भोग करना और उसका सबूत भी प्रस्तुत करना जरूरी होता है , और फिर ऐसे व्यक्ति को खोजना होता है , जो बाद में उसे तलाक भी दे दे, तभी वह औरत अपने पहले पति के पास जा सकती है . इस लिए इन मुल्लों ने बेकार जवान पाल रखे हैं , जो रुपये लेकर हलाला का धंदा करते है . यह लोग जासूसी करते हैं और जहाँ भी कोई शराब पीकर भी औरत से तलाक बोल देता है वहीँ हलाला करने धमक जाते हैं . विवश होकर मुर्ख मुसलमान अपनी पत्नियाँ हलाला करा लेते है, कई बार तो यह मुफ्ती फर्जी तलाकनामे भी जारी कर देते हैं .दिल्ली के पास बवाना गाँव में यही होता है .ऐसी औरतें जिनका हलाला हो जाता है , वह अल्लाह का हुक्म समझकर चुप रहती है .और मुल्लों को औरत के साथ दौलत भी मिलती है .कुछ लोग इसे बुरा भी कहते हैं , देखिये ,
Halala Nikah s of 6 time a Mosque Imam s wife( video)

http://www.youtube.com/watch?v=tqIbskjydRY

7-लखनऊ की सत्य घटना 
दिनांक 8 मार्च 2011 इतवार को India Times की लखनऊ संवाद दाता मंजरी मिश्रा ने एक चौंकाने वाली खबर दी थी . जिसने मुताबिक दोपहर के समय करीब 200 मुस्लिम महिलाये , सिर्फ दुपट्टा सर पर डाले हुए मुस्लिम वूमेन पर्सनल बोर्ड के दफ्तर में घुस गयीं . वह नारे लगा रही थी की मुस्लिम ख्वातीन को मुल्लों से बचाया जाए , जो फर्जी तलाकनामे बनाकर उनको हलाला करवाने पर दवाब डालते रहते है, या तलाक को रद्द करने के लिए रूपया मांगते हैं . उन औरतों का नेतृत्व शाइस्ता अम्बर कर रही थी .कुछ औरतों ने ऐसे मुल्लों की धुनाई भी कर दी थी .

दिल्ली के पास बवाना गाँव में यही होता है .ऐसी औरतें जिनका हलाला हो जाता है , वह अल्लाह का हुक्म समझकर चुप रहती है .और मुल्लों को औरत के साथ दौलत भी मिलती है





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From: Rajput < >

Cruelty in the Quran

They will wish to come forth from the Fire, but they will not come forth from it. Theirs will be a lasting doom. — 5:37

  1. Don’t bother to warn the disbelievers. Allah has blinded them. Theirs will be an awful doom. 2:6
  2. Allah has sickened their hearts. A painful doom is theirs because they lie. 2:10
  3. A fire has been prepared for the disbelievers, whose fuel is men and stones. 2:24
  4. Disbelievers will be burned with fire. 2:39, 90
  5. “Whosoever hath done evil and his sin surroundeth him; such are rightful owners of the Fire. ” 2:81
  6. If you believe in only part of the Scripture, you will suffer in this life and go to hell in the next. 2:85
  7. Jews are the greediest of all humankind. They’d like to live 1000 years. But they are going to hell. 2:96
  8. For disbelievers is a painful doom. 2:104
  9. For unbelievers: ignominy in this world, an awful doom in the next. 2:114
  10. “And thou wilt not be asked about the owners of hell-fire. ” (They are the non-muslims. ) 2:119
  11. Allah will leave the disbelievers alone for a while, but then he will compel them to the doom of Fire. 2:126
  12. The doom of the disbelievers will not be lightened. 2:162
  13. Allah is severe punishment! 2:165-6
  14. They will not emerge from the Fire. 2:167
  15. Those who hide the Scripture will have their bellies eaten with fire. Theirs will be a painful doom. 2:174
  16. How constant are they in their strife to reach the Fire! 2:175
  17. “Fight in the way of Allah. ” 2:190, 2:244
  18. Believers must retaliate. Those who transgress will have a painful doom. 2:178
  19. Kill disbelievers wherever you find them. If they attack you, then kill them. Such is the reward of disbelievers. (But if they desist in their unbelief, then don’t kill them. ) 2:191-2
  20. “Guard us from the doom of Fire. ” 2:201
  21. Those who fail in their duty to Allah are proud and sinful. They will all go to hell. 2:206
  22. War is ordained by Allah, and all Muslims must be willing to fight, whether they like it or not. 2:216
  23. Those who die in their disbelief will burn forever in the Fire. 2:217
  24. Those who marry unbelievers will burn in the Fire. 2:221
  25. Disbelievers worship false gods. The will burn forever in the Fire. 2:257
  26. “Those who swallow usury . . . are rightful owners of the Fire. ” 2:275
  27. Those who disbelieve the revelations of Allah, theirs will be a heavy doom. 3:4
  28. Those who disbelieve will be fuel for the Fire. 3:10
  29. Those who disbelieve shall be overcome and gathered unto Hell. 3:12
  30. “Guard us from the punishment of Fire. ” 3:16
  31. Those who disbelieve, promise them a painful doom. 3:21
  32. “They [Christians and Jews] say: The Fire will not touch us save for a certain number of days. That which they used to invent hath deceived them regarding their religion. ” (The Fire will burn them forever. ) 3:24
  33. Theirs will be a painful doom. 3:77
  34. All non-Muslims will be rejected by Allah after they die. 3:85
  35. Disbelievers will be cursed by Allah, angels, and men. They will have a painful doom. 3:87-88
  36. Disbelievers will have a painful doom. And they will have no helpers. 3:91
  37. “Ye were upon the brink of an abyss of fire, and He did save you from it. ” 3:103
  38. Disbelievers will have their faces blackened on the last day. They will face an awful doom. 3:105-6
  39. Those who disbelieve will be burnt in the Fire. 3:116
  40. The Fire is prepared for disbelievers. 3:131
  41. We shall cast terror into the hearts of those who disbelieve. Their habitation is the Fire 3:151
  42. “Is one who followeth the pleasure of Allah as one who hath earned condemnation from Allah, whose habitation is the Fire?”

Unbelievers will burn forever in the Fire. 3:162

  1. Theirs will be an awful doom. 3:176
  2. Disbelievers do not harm Allah, but will have a painful doom. 3:177
  3. Disbelievers will have a shameful doom. 3:178
  4. Whoso is removed from the Fire and is made to enter paradise, he indeed is triumphant. ” (The rest will burn forever in the Fire. ) 3:185
  5. Those who brag about doing good will go to hell. 3:188
  6. “Preserve us from the doom of Fire. ” 3:191
  7. “Our Lord! Whom Thou causest to enter the Fire: him indeed Thou hast confounded. For evil-doers there will be no helpers. ” 3:192
  8. Disbelievers will go to Hell. 3:196
  9. Don’t steal from orphans (or Allah will burn you forever in hell). 4:10
  10. Those who disobey Allah and his messenger will be burnt with fire and suffer a painful doom. 4:14
  11. For the disbelievers and those who make a last-minute conversion, Allah has prepared a painful doom. 4:18
  12. “We shall cast him into Fire, and that is ever easy for Allah. ” 4:30
  13. For disbelievers, We prepare a shameful doom. 4:37
  14. Hell is sufficient for their burning. 4:55
  15. Unbelievers will be tormented forever with fire. When their skin is burned off, a fresh skin will be provided. 4:56
  16. Allah will bestow a vast reward on those who fight in religious wars. 4:74
  17. Believers fight for Allah; disbelievers fight for the devil. So fight the minions of the devil. 4:76
  18. Have no unbelieving friends. Kill the unbelievers wherever you find them. 4:89
  19. If the unbelievers do not offer you peace, kill them wherever you find them. Against such you are given clear warrant. 4:91
  20. Believers who kill believers will face the awful doom of hell. 4:93
  21. “Their habitation will be hell, an evil journey’s end. ” 4:97
  22. Those who oppose the messenger and become unbelievers will go to hell. 4:115
  23. Allah will lead them astray and they will go to hell. 4:119-121
  24. Those who believe, then disbelieve, then believe and disbelieve again will never be forgiven by Allah. 4:137
  25. For the hypocrites there will be a painful doom. 4:138
  26. Allah will gather hypocrites and disbelievers into hell. 4:140
  27. The hypocrites will be in the lowest part of hell and no one will help them there. 4:145
  28. You must believe everything Allah and his messengers tell you. Those who don’t are disbelievers and will face a painful doom. 4:150-151
  29. For the wrongdoing Jews, Allah has prepared a painful doom. 4:160-1
  30. God will guide disbelievers down a road that leads to everlasting hell. 4:168-169
  31. If you don’t do good works, Allah will punish you with a painful doom. 4:173
  32. Those who deny Islam will be losers in the Hereafter. 5:5
  33. Disbelievers are the rightful owners of Hell. 5:10
  34. “The owners of the fire. That is the reward of evil-doers. ” 5:29
  35. Those who make war with Allah and his messenger will be killed or crucified, or have their hands and feet on alternate sides cut off, or will be expelled out of the land. That is how they will be treated in this world, and in the next they will have an awful doom. 5:33
  36. Disbelievers will have a painful doom. 5:36
  37. Disbelievers will want to come out of the Fire, but will not. Their will be a lasting doom. 5:37
  38. Cut off the hands of thieves. It is an exemplary punishment from Allah. 5:38
  39. Allah makes some people sin. He will not cleanse their hearts. They will have ignominy in this world, and in the Hereafter an awful doom. 5:41
  40. Life for life, eye for eye, nose for nose, ear for ear, and tooth for tooth. Non-muslims are wrong doers. 5:45
  41. Christians will be burned in the Fire. 5:72
  42. Christians are wrong about the Trinity. For that they will have a painful doom. 5:73
  43. Muslims that make friends with disbelievers will face a doom prepared for them by Allah. 5:80
  44. Disbelievers will be owners of hell-fire. 5:86
  45. Allah will test believers to see if they are afraid. Those who fail a second test will suffer a a painful doom. 5:94
  46. Many generations have been destroyed by Allah. 6:6
  47. Disbelievers will say when they see the Fire that they would have believed if they had known the truth. But they are all liars. 6:27-28
  48. Allah will torment those how deny his revelations. 6:49
  49. Those who disbelieve will be forced to drink boiling water, and will face a painful doom. 6:70
  50. When nonbelievers die, the angels will deliver to them doom and degradation. 6:93
  51. Allah allows some to disbelieve in the afterlife, and to take pleasure in their disbelief, so that he can torment them forever after they die. 6:113
  52. Allah chooses to lead some astray, and he lays ignominy on those who disbelieve. 6:125
  53. Allah will send everyone the Fire, except those he chooses to deliver. 6:128
  54. Let the idolaters kill their children. It is Allah’s will. 6:137
  55. The worst thing anyone can do is deny the revelations of Allah. Those who do so will be awared an evil doom. 6:157
  56. How many a township have We destroyed! As a raid by night, or while they slept at noon, Our terror came unto them. 7:4-5
  57. Allah banishes Iblis and promises to fill hell with those who are mislead by him. 7:18
  58. Disbelievers are the rightful owners of the Fire. 7:36
  59. Entire nations have entered the Fire. Some get a double torment. 7:38
  60. “Taste the doom for what ye used to earn. ” 7:39
  61. Disbelievers will be excluded from heaven. Theirs will be a bed of hell. 7:40-41
  62. Those in the fire will be taunted by those in the Garden. “So how’s it going down there? Are you enjoying the warmth of the Fire?” 7:44
  63. Those in the Garden will plead with Allah not to be cast into the Fire. 7:47
  64. Those in the Fire will cry out to those in heaven, saying: “Pour water on us. ” But Allah has forbidden that to disbelievers. 7:50
  65. “Why preach ye to a folk whom Allah is about to destroy or punish with an awful doom?” 7:164
  66. Allah has already sent many people and jinn to hell. They were worse than cows: they couldn’t see or hear and were neglectful. 7:179
  67. Allah will throw fear into the hearts of the disbelievers, and smite their necks and fingers. 8:12
  68. Disbelievers will be tormented in the Fire. 8:14
  69. When you fight with disbelievers, do not retreat. Those who do will go to hell. 8:15-16
  70. Those that the Muslims killed were not really killed by them. It was Allah who did the killing.

8:17

  • “Rain down stones on us or bring on us some painful doom!” 8:32
  • Taste of the doom because ye disbelieve. 8:35
  • Those who disbelieve will be gathered into hell. 8:36
  • “The wicked will He place piece upon piece, and heap them all together, and consign them unto hell. ” 8:37
  • The angels smite the face and backs of disbelievers, saying: “Taste the punishment of burning!” 8:50
  • The worst beasts in Allah’s sight are the disbelievers. 8:55
  • Don’t let the disbelievers think they can escape. They are your enemy and the enemy of Allah. 8:59-60
  • Had it not been for an ordinance of Allah which had gone before, an awful doom had come upon you. ” 8:68
  • Give tidings (O Muhammad) of a painful doom to those who disbelieve. 9:3
  • Slay the idolaters wherever you find them. 9:5
  • Don’t let idolaters tend the sanctuaries. Their works are in vain and they will be burned in the Fire. 9:17
  • Give tidings (O Muhammad) of a painful doom to the rich and greedy Christian monks and Jewish rabbis. 9:34
  • Those who are tormented in the Fire will have their foreheads and backs branded. 9:35
  • If you refuse to fight, Allah will afflict you with a painful doom. 9:39
  • Disbelievers go to hell. 9:49
  • “Allah will afflict you with a doom from Him or at our hands. ” 9:52
  • Those who vex the Prophet, for them there is a painful doom. 9:60
  • Those who oppose Allah and His messenger will burn in the fire of hell. 9:63
  • Allah promises hypocrites and disbelievers the fire of hell. Allah curses them. They will have a lasting torment. 9:68
  • Fight the disbelievers and hypocrites. Be harsh with them. They are all going to hell anyway. 9:73
  • Allah will afflict disbelievers with a painful doom in this world and the Hereafter. 9:74
  • “Theirs will be a painful doom. ” 9:79
  • Those who refuse to give their wealth and lives to Allah will face the fire of hell. 9:81-83
  • For disbelievers there will be a painful doom. 9:90
  • Non-muslim who pretend to believe (so they won’t be killed by Muslims) are unclean and will go to hell. 9:95
  • The unbelieving Arabs will be punished by Allah with an evil fortune. 9:97-98
  • “We shall chastise them twice; then they will be relegated to a painful doom. ” 9:101
  • Those that ignore Allah will be thown into the fire of hell. 9:109
  • Believers must fight for Allah. They must kill and be killed , and are bound to do so by the Torah, Gospel, and Quran. But Allah will reward them for it. 9:111
  • Don’t pray for idolaters (not even for your family) after it is clear they are people of hell-fire. 9:113
  • Fight disbelievers who are near you, and let them see the harshness in you. 9:123
  • Disbelievers will have a boiling drink and a painful doom. 10:4
  • Those who neglect Allah’s revelations will make their home in the Fire. 10:7-8
  • Allah has destroyed entire generations. 10:13
  • “Such are rightful owners of the Fire. ” 10:27
  • On the last day Allah will kill all the disbelievers (and then he will torture them forever in hell). 10:45
  • “His doom cometh unto you as a raid by night. ” 10:50
  • The damned will feel remorse for what they have done, but it will not save them from the doom that Allah has prepared. 10:54
  • Those who disbelieved will face a dreadful doom. 10:70
  • Allah drowned those who disbelieved his revelations. 10:73
  • Moses asked Allah to harden the hearts of the Egyptians so that they would not believe until they saw the painful doom. 10:88
  • If you deny the revelations of Allah, you will be among the losers and will “see the painful doom. ” 10:95-97
  • “The doom cannot be averted from them, and that which they derided will surround them. ” 11:8
  • Allah sent a lasting doom on those who mocked Noah. 11:39
  • Allah will send a painful doom on several nations. 11:48
  • “Lo! there cometh unto them a doom which cannot be repelled. ” 11:76
  • Allah killed everyone in Sodom and Gomorrah by dropping burning stones on them. 11:82-83
  • Lo! Is fear for you the doom of a besetting Day. ” 11:84
  • “Ye will soon know on whom there cometh a doom that will abase him. ” 11:93
  • “He . . . will lead them to the Fire for watering-place. ” 11:98
  • “The doom of the Hereafter” 11:103
  • Those in the Fire will suffer as long as the heavens and earth endure. 11:106-7
  • “Incline not toward those who do wrong lest the Fire touch you. ” 11:113
  • Allah will fill hell with humans and jinn. 11:119
  • “What shall be his reward, who wisheth evil to thy folk, save prison or a painful doom?” 12:25
  • Disbelievers are the rightful owners of the Fire 13:5
  • Those who do not answer Allah’s call will go to hell. 13:18
  • Disbelievers will be tormented in this life, and suffer even more pain in the Hereafter. 13:33-34
  • The reward for disbelievers is the Fire. 13:35
  • “When Allah doometh there is none that can postpone His doom. ” 13:41
  • Woe unto the disbelievers. Theirs will be an awful doom. 14:2
  • Those who are in hell will be forced to drink festering water which they can hardly swallow. They will want to die, but they will not be able to. Theirs is a harsh doom. 14:16-17
  • There is no escape from Allah’s doom. 14:21
  • “Lo! for wrong-doers is a painful doom. ” 14:22
  • Allah leads wrong-doers astray and then sends them to hell. 14:27-29
  • “They set up rivals to Allah that they may mislead (men) from His way. Say: Enjoy life (while ye may) for lo! your journey’s end will be the Fire. ” 14:30
  • “Warn mankind of a day when the doom will come upon them. ” 14:44
  • Those in hell will be chained together. Their clothing will be made of pitch and fire will cover their faces. 14:49-50
  • Iblis will lead humans astray. Only perfect Muslims will be safe from him. The rest will go to hell. 15:39-43
  • Allah’s doom is a dolorous doom. 15:50
  • Allah made a roof fall in to kill unbelievers. “And the doom came on them whence they knew not. ” 16:26
  • Disbelievers are evil and will dwell in hell forever. 16:27-29
  • Allah “will cause the earth to swallow” those who plan ill-deeds. the doom will come on them when they least expect it. 16:45
  • Theirs will be the Fire, and they will be abandoned. ” 16:62
  • “Theirs will be a painful doom. ” 16:63
  • “The Hour of Doom is but a twinkling of the eye. ” 16:77
  • “When those who did wrong behold the doom, it will not be made light for them. “

From: Srinandan < >

Namaste,

In this edition of the Vedic Friends Association Monthly Journal I have included the article by our VFA member Subhash Kak on “How I Discovered Vedic Science.” This is one of the chapters in our VFA book called “Vedic Culture: The Difference it can Make in Your Life.” I always found this article very interesting since I’m always fascinated by how people became influenced by the Vedic tradition. However, Subhash Kak’s story is quite deep and scientific, which makes it even more intriguing.

So, I hope you find this interesting as I do, and until next time,

All the best and Hari Om,

Stephen Knapp

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How I Discovered Vedic Science

Subhash Kak

My father was a serious yogic apprentice for several years before he married, so as a boy I heard many inspiring stories about the spiritual side of life. Our home was a magnet to swamis and householders on their spiritual path of devotion to Vishnu, Shiva, or Shakti. We would question the visitors, who would provide explanations for the more difficult passages in the Bhagavad Gita and the Upanishads. I was impressed but I don’t think I fully understood all that I was told.

After school and college in various places in Jammu and Kashmir, I went to the Indian Institute of Technology (IIT) in Delhi for further studies in science and engineering. It was not before long that I became acutely aware of the limitations of the mainstream paradigm of science. For example, in the physical sciences, the past determines the future completely, but on the other hand, freedom of action is taken for granted at the level of the individual. Our lives are strung, so to speak, between these two extreme views. We make private adjustments to this situation, acknowledging that there are larger forces that define history at the personal level, and somehow our freedom matters.

I had also started studying mystical experience, and this led me to meetings with Gopi Krishna, who had become internationally famous for his yogic autobiography, Kundalini. Subsequently, I got to know many leading mystics and scientists. Meanwhile, I had begun teaching at IIT Delhi, where I continued with my meditations on science and self. It was clear that science must confront the mystery of awareness. Why is it to be found in the brain-machine but not in the computer? In what sense is the consciousness of animals different from that of humans? Although our bodies change with time, why do we feel that our personhood remains unchanged? Many more such questions may be asked.

After I came to the United States in 1979, I decided to go beyond information and look at the problem of self and consciousness from the points of view of physics and neuroscience. Meanwhile, my work on the history of Indian science led me to study Vedic texts in the original and not just depend on old commentaries, which I soon realized were not reliable.

My objective was to go beyond philosophy, in which there has been an unbroken tradition and for which one can find reasonable expositions in English and other languages, and explore the heart of Vedic knowledge. I began with an examination of the Vedic altar ritual, especially Agnichayana and Ashvamedha which were the grandest sacrifices. My discoveries were serendipitous. Perhaps they emerged out of my own spiritual advancement.

I don’t wish to go into the arcane details of my findings, for which I would recommend my books such as the Astronomical Code of the Rgveda and the Architecture of Knowledge to the reader. Suffice it to say that Vedic ritual represented the astronomical knowledge of its times in the altar constructions and by virtue of the equation that the macrocosm is mirrored in the microcosm, this also was a representation of the spiritual self.

This explains why the number 108, which is the average distance the sun and the moon are away from the earth in terms of their respective diameters (the diameter of the sun is also 108 times the earth’s diameter), shows up in unexpected situations in the Vedic lore. For example, the Natya Shastra claims that there exist 108 basic dance poses, the Hindu rosary has 108 beads, and God and Goddess have 108 names.

The Vedas recognize that the outer reality follows laws. They assert that there are two sciences: the lower, concerning the outer reality; and the higher, concerning the experiencing self. Since the self cannot be associated with any object, therefore one cannot have a multiplicity of it. But to speak of a self that is single invites the postulation of other selves, hence it is claimed that this self is non-dual. It transcends physical extension and time.

Ordinary language cannot describe the mystery, which is why formal descriptions are contradictory or paradoxical. The skeptic might say that all this sounds good and it may even be considered inspirational, but why should one take it to be the truth and not just an arbitrary belief system? The Vedas claim the proof of this science is the reality that one can obtain knowledge of the outer reality (a projection of the transcendent Brahman or Krishna or Shiva or Devi) by means of meditation.

There are at least three numerical values in the Vedic texts that support the view that knowledge is an uncovering of the potential within. They are:

  • The age of the universe: 8.64 billion years in the current cycle, that is of the same order of magnitude as current estimates. This should be contrasted with the biblical view that the universe was created in 4004 BC.
  • The speed of light: 4,404 yojanas in a nimesha found in manuscripts that are over 600 years old. This figure is almost exactly the correct value of 186,000 miles per second. Note that the modern value was found only over a hundred years ago, and even Newton thought its speed was infinite.
  • The number of Species on earth: Vedic thought conceives of 8.4 million species, which is impressive, considering that modern authorities (such as Graur and Li in their Fundamentals of Molecular Evolution, page 436) estimate the number of extant species to be 4.5 to 10 million.

One may look at these numbers as coincidences, but one is boggled by the odds against that view. On the other hand, the Vedas speak of rishis whose insight is so extraordinary that they can obtain knowledge from meditation alone. Of course, this intuition can only be expressed in terms of known linguistic associations, that is, in terms of concepts already known.

 

SURPRISING IDEAS IN THE VEDIC TEXTS

It was Herodotus who first spoke of the idea of the wonders of the ancient world. He was, of course, talking only of monumental art. There is a list of the wonders from the Greek world that was compiled in the Middle Ages. This list has the great pyramid of Giza, the hanging gardens of Babylon, the statue of Zeus at Olympia, the temple of Artemis at Ephesus, the mausoleum at Halicarnassus, the colossus of Rhodes, and the lighthouse of Alexandria. Only one of these seven survives.

There are other lists too that are not Greek-centric. We have marvels of art and architecture from China, Mexico, Europe, Peru, Iran, India, Indonesia, Cambodia, Sri Lanka, and other countries. Not all of these marvels are in a good state of repair. Some are under the threat of destruction. Three of the most magnificent creations were lost in Afghanistan just recently.

But here I don’t wish to speak of wonders of stone and metal. Rather, I wish to propose a list of the ‘Seven Wonders of the Ancient Mind’. These are revolutionary and astonishing ideas that have had a lasting influence on the world. Not surprisingly, it is hard for us to place these ideas in context. For most of them, we cannot name the originator.

Such lists are subjective, and mine is no exception. I had to leave out many obviously impressive ideas, such as airplanes, space travel, weapons that can destroy the world, embryo transplantation, multiple babies from the same embryo, space travel, and so on–from just the Mahabharata and the Puranas. (Lest I be misunderstood, we are not speaking of real planes, bombs, and biotechnology, but rather of the conception of their possibility.)

The ideas that I chose are perhaps more fundamental than those above that I left out. Ultimately, I used the criterion of not just originality, but continuing relevance and sheer improbability of the thought of it in the ancient world.

Here’s my list of the seven most astonishing ideas:

  1. An Extremely Old Universe:

The idea that the universe is very old is quite startling, when one notes that humanity’s collective memory doesn’t go further than a few thousand years. The universe is taken to go through cycles of creation and destruction. This conception also assumes infinite number of solar systems.

  1. An Atomic World and the Subject/Object Dichotomy:

According to the atomic doctrine of Kanada, there are nine classes of substances: ether, space, and time that are continuous; four elementary substances (or particles) called earth, air, water, and fire that are atomic; and two kinds of mind, one omnipresent and another which is the individual. This system also postulates a subject/object dichotomy, which is a part of the systems of Sankhya and Vedanta as well. In these systems, the conscious subject is separate from the material reality but he is, nevertheless, able to direct its evolution. The atomic doctrine of Kanada is much more interesting than that of Democritus. It is the recognition of the subject/object dichotomy that led to the creation of modern physics.

  1. Relativity of Time and Space:

That space and time need not flow at the same rate for different observers is a pretty revolutionary notion. We encounter it in Puranic stories and in the Yoga Vasishtha. Obviously, we are not speaking here of the mathematical theory of relativity related to an upper limit to the speed of light, yet the consideration of time acting different to different observers is quite remarkable. To see the significance of this idea a couple of thousand years ago, note that modern relativity theory was forced upon scientists a hundred years ago by certain equations related to the transmission of electromagnetic waves. Here’s a passage on anomalous flow of time from the Bhagavata Purana: “Taking his own daughter, Revati, Kakudmi went to Lord Brahma in Brahmaloka, and inquired about a husband for her. When Kakudmi arrived there, Lord Brahma was engaged in hearing musical performances by the Gandharvas and had not a moment to talk with him. Therefore Kakudmi waited, and at the end of the performance he saluted Lord Brahma and made his desire known. After hearing his words, Lord Brahma laughed loudly and said to Kakudmi, ‘O King, all those whom you may have decided within the core of your heart to accept as your son-in-law have passed away in the course of time. Twenty-seven chaturyugas have already passed. Those upon whom you may have decided are now gone, and so are their sons, grandsons and other descendants. You cannot even hear about their names.’”

There are other stories, less dramatic, where an observer returns from a journey to another loka, and finds that people he loves have aged many more decades than he has.

  1. Evolution of Life:

The Puranas have a chapter on creation and the rise of mankind. It is said that man arose at the end of a chain where the beginning was with plants and various kind of animals. Here’s the quote from the Yoga Vasishtha: “I remember that once upon a time there was nothing on this earth, neither trees and plants, nor even mountains. For a period of eleven thousand years the earth was covered by lava. In those days there was neither day nor night below the polar region: for in the rest of the earth neither the sun nor the moon shone. Only one half of the polar region was illumined. Apart from the polar region the rest of the earth was covered with water. And then for a very long time the whole earth was covered with forests, except the polar region. Then there arose great mountains, but without any human inhabitants. For a period of ten thousand years the earth was covered with the corpses of the asuras who roamed the world.”

Vedic evolution is not at variance with Darwinian evolution but it has a different focus. The urge to evolve into higher forms is taken to be inherent in nature. A system of an evolution from inanimate to progressively higher life is clearly spelled out in the system of Sankhya. At the traditional level this is represented by an ascent of Vishnu through the forms of fish, tortoise, boar, man-lion, the dwarf, finally into man. Aurobindo has argued that this evolution of intelligence is still at work.

  1. A Science of Mind, Yoga:

Yoga psychology, described in the Vedic books and systematized by Patanjali in his Yoga-sutras is a very sophisticated description of the nature of the human mind and its capacity. It makes a distinction between memory, states of awareness, and the fundamental entity of consciousness. It puts the analytical searchlight on mind processes, and it does so with such clarity and originality that it continues to influence people all over the world. Several kinds of yoga are described. They provide a means of mastering the body-mind connection. Indian music and dance also has an underlying yogic basis.

  1. Binary Number System, Zero:

A Binary number system was used by Pingala (450 BC, if we accept the tradition that he was Panini’s brother) to represent meters of songs. The structure of this number system may have helped in the invention of the sign for Zero that, I believe, took place around 50 BC – 50 AD. Without the binary system, the development of computers would be much harder; and without a sign for zero, mathematics would have languished. It is of course true that the binary number system was independently invented by Leibnitz in 1678, but the fact that the rediscovery had to wait almost 2,000 years only emphasizes the originality of Pingala’s idea.

  1. A Complete Grammar, Limitation of Language:

The Ashtadhyayi is a grammar of the Sanskrit language by Dakshiputra Panini (450 BC) that describes the entire language in 4,000 algebraic rules. The structure of this grammar contains a meta-language, meta-rules, and other technical devices that make this system effectively equivalent to the most powerful computing machine. No grammar of similar power has yet been constructed for any other language since. The famous American scholar Leonard Bloomfield called Panini’s achievement as “one of the greatest monuments of human intelligence.”

The other side to the discovery of this grammar is the idea that language (as a formal system) cannot describe reality completely. This limitation of language, the rishis tell us, is why the Truth can only be experienced and never described fully!

 

 

 

 

 

VEDANTA AND PHYSICS

Let me now talk of a savant who followed Vedic ideas and was inspired enough to create a modern theory that has transformed the world. I have in mind the Austrian physicist Erwin Schrödinger, who was arguably one of the two greatest scientists of the 20th century. If Albert Einstein is celebrated for his creation of the theory of relativity, Erwin Schrödinger is equally famous for his creation of Quantum mechanics, the deepest theory at the basis of outer reality. Quantum mechanics went so far beyond the already radical framework of relativity that Einstein refused to accept it to his last day. Without quantum theory, advances in chemistry and electronics that are the foundation of modern technology would have been impossible.

It is a fact that the great European scientists have searched for truth by first abandoning the narrow theologies of the religion into which they were born. But for Schrödinger, Vedic ideas provided the very foundation for his uncompromising search for meaning.

It is not generally known that before he created quantum mechanics he expressed his intention to give form to central ideas of Vedanta which, therefore, has had a role in the birth of quantum mechanics. In 1925, before his revolutionary theory was complete, Erwin Schrödinger wrote:

This life of yours which you are living is not merely a piece of this entire existence, but in a certain sense the “whole”; only this whole is not so constituted that it can be surveyed in one single glance. This, as we know, is what the Brahmins express in that sacred, mystic formula which is yet really so simple and so clear: tat tvam asi, this is you. Or, again, in such words as “I am in the east and the west, I am above and below, I am this entire world.”

Schrödinger’s influential What is Life? (1944) also used Vedic ideas. The book became instantly famous although it was criticized by some for its emphasis on Indian ideas. Francis Crick, the co-discoverer of the DNA code, credited this book for key insights that led him to his revolutionary discovery. According to his biographer Walter Moore, there is a clear continuity between Schrödinger’s understanding of Vedanta and his research:

The unity and continuity of Vedanta are reflected in the unity and continuity of wave mechanics. In 1925, the world view of physics was a model of a great machine composed of separable interacting material particles. During the next few years, Schrödinger and Heisenberg and their followers created a universe based on superimposed inseparable waves of probability amplitudes. This new view would be entirely consistent with the Vedantic concept of All in One.

Schrödinger was born on August 12, 1887. He became a Vedantist, a Hindu, as a result of his studies in his search for truth. He kept a copy of the Hindu scriptures at his bedside. He read books on Vedas, yoga, and Sankhya philosophy, and he reworked them into his own words, and ultimately came to believe them. The Upanishads and the Bhagavad-gita were his favorite scriptures.

According to his biographer Moore, “His system–or that of the Upanishads–is delightful and consistent: the self and the world are one and they are all. He rejected traditional western religious beliefs (Jewish, Christian, and Islamic) not on the basis of any reasoned argument, nor even with an expression of emotional antipathy, for he loved to use religious expressions and metaphors, but simply by saying that they are naive.”

Schrödinger was a professor at several universities in Europe. He was awarded the Nobel Prize in 1933. During the Hitler era he was dismissed from his position for his opposition to the Nazi ideas and he fled to England. For some years he was in Ireland, but after the conclusion of World War II he returned to Vienna where he died in 1961.

Quantum mechanics goes beyond ordinary logic. According to it reality is a superposition of all possibilities which restates Vedic ideas. It is quantum mechanics which explains the mysteries of chemical reactions and of life. In recent years, it has been suggested that the secrets of consciousness have a quantum basis.

In a famous essay on determinism and free will, he expressed very clearly the sense that consciousness is a unity, arguing that this “insight is not new… From the early great Upanishads the recognition Atman = Brahman (the personal self equals the omnipresent, all-comprehending eternal self) was in Indian thought considered, far from being blasphemous, to represent the quintessence of deepest insight into the happenings of the world. The striving of all the scholars of Vedanta was, after having learnt to pronounce with their lips, really to assimilate in their minds this grandest of all thoughts.”

He considered the idea of pluralization of consciousness and the notion of many souls to be naive. He considered the notion of plurality to be a result of deception (maya): “the same illusion is produced by a gallery of mirrors, and in the same way Gaurisankar and Mt. Everest turned out to be the same peak seen from different valleys.”

Schrödinger’s ideas continue to be fundamental in a variety of new fields. The wonders of modern science, such as electronics, biology, chemistry, wouldn’t have been possible without the insights of quantum theory. The possibilities inherent in quantum theory have not all been realized. Schrödinger remains one of the most discussed figures in modern scientific thought. His ideas will continue to inspire science.

Schrödinger was a very complex person. But he had a sense of humor and paradox. He called his dog Atman. Perhaps he did this to honour Yudhishthira whose own dog, an incarnation of cosmic justice (Dharma), accompanied him on his last march to the Himalayas. More likely, he was calling attention to the unity that pervades the web of life.

 

EVOLUTION AND RELIGION

The West has seen a Cold War between science and religion going back to Charles Darwin. His subversive thought that man evolved out of apes had a chilling effect on religion; it freed science from the meddling by church, giving birth to the modern age. Western religion has retreated from one defensive position to another. After a few decades it conceded that animals may have evolved, insisting man was special. By now that the idea of the Garden of Eden with Adam and Eve has been discarded, the fight has shifted from the creation of man to whether God created the first life. The church is certain that life couldn’t have arisen without an intelligent designer.

In the West, evolution theory has led to a loss of the traditional religious belief. If nature could be explained naturalistically, then there is no place for an anthropomorphic God. The church having retired from the academic debate, the main fight in the academy is between those who believe that biology can determine human behavior to a great degree and others who claim that for man biology stands superseded by the world of culture, with its own laws of interaction and evolution.

Western and Indian thought are divided on the argument for design. In the West, thinkers from Aquinas to Newton maintain that nature manifests the design of a preexistent mind or the Creator. This idea helps to define the Westerner’s personal sense of purpose and meaning.

In Indian thought, there is no separation between the Creator (the preexistent mind) and the universe. Consciousness is taken to be the fundamental characteristic of reality out of which material nature and individual minds emerge. Laws govern physical processes, but individuals remain free.

Evolution is basic to this view. Life is seen to have evolved over millions of years in a manner that makes the cell mirror the cosmos. This is expressed in the famous sentence: yat pinde tad brahmande, ‘as in the cell so in the universe’.

From Consciousness arises matter (prakriti), and matter evolves as the balance between its three attributes (gunas) called sattva, rajas and tamas changes. This is the principle of Vedic evolution as given in Kapila’s Sankhya darshan. Even mind evolves out of matter. The evolutionary sequence goes through many levels. There exist tattvas (principles) that lead to the emergence of life out of inert matter. These tattvas, which include the various sensory and motor capacities, are latent in matter. The chain of sensory organ adaptations may be seen amongst the animals.

The gunas are not to be taken as abstract principles alone. Indian thought believes that structure in nature is recursive, and the gunas show up in various forms at different levels of expression. For example, at the cellular level, the genetic informational flow is sattva, the metabolic activity is rajas, and the membrane that provides identity to the cell is tamas.

Texts such as the Mahabharata and the Puranas speak of evolution of life at many places. Earth is not considered unique regarding life. We are told that there exist countless planetary worlds, which go through cycles of evolution and decline. Hindu cosmology speaks of recursive cycles of creation and destruction.

The texts imply that ingredients for the growth of life are available throughout the universe. Infinite numbers of universes are conceived, so as a new one is created like a bubble in an ocean of bubbles, life elements from other existing universes migrate and at a suitable time lead to larger life forms. This idea supports the notion of an extra-terrestrial source of life on Earth. (On September 28, 1969, a meteorite fell over Murchison, Australia. Analysis of the meteorite revealed that it was rich with amino acids. The Murchison meteorite shows that the Earth may have acquired some of its amino acids and other organic compounds from outer space.)

The story of Vishnu’s avataras is seen by some to represent evolution through the stages of fish, tortoise, boar, man-lion, dwarf, Rama the axe-man, Rama (the ethical man), Krishna (the spiritual man).

The Indic idea of structure showing up at different levels may be seen in the parallels between biological and linguistic evolution. Their analogies may be divided into four principal types. In historical and comparative linguistics, species with individuals capable of interbreeding are compared to the mutually comprehensible speakers of a language. In the study of animal behaviour, genes coding for physical and behavioral traits are compared to fragments of culture capable of transmission and expression. In evolutionary epistemology or history of ideas, competing scientific concepts are compared to interacting organisms in an environment in an intellectual ecology. Finally, there is an analogy between the processes in living cells and processes in the brains of persons. Each cell listens to and comprehends its own DNA speech stream; likewise, the human language helps to generate and maintain a stable network of mental reactions (mental metabolism) by means of the ongoing inner dialogue.

 

DRIVING FORCES IN EVOLUTION

The idea of evolution was originally taken to be a linear, ladder-climbing ascent from simple life to humans. Darwin assumed blended inheritance, in which if an organism inherits certain factors, A and B, from its parents, it passes a factor which is a blending of A and B to its offspring. But evolution cannot proceed with such a theory: the variation needed for evolution disappears rapidly as it is blended out of existence.

The next advance was provided by the Mendelian theory of heredity where the organism preserves the inheritance from the father and the mother, without blending it. The idea of such non-blending genetic inheritance is also in the Garbha Upanishad.

Mendelian ideas combined with Darwinian ideas provide a synthetic theory of evolution that has been called neo-Darwinism. In this theory, although mutation is recognized as the ultimate source of genetic variation, natural selection is given the dominant role in shaping the genetic make-up of populations and in the process of gene substitution.

In the 1960s, Mitoo Kimura proposed that molecular evolution was mainly driven not by natural selection but by random drift among equally well-adapted sequence variants. This theory (neutral theory of molecular evolution) contends that a neutral drift is the cause of most of the evolutionary change at the molecular level; also, much of the variability within species is caused not by positive selection of advantageous alleles, or by balancing selection, but by random genetic drift of mutant alleles that are selectively neutral.

Evidence supporting the neutral theory includes the discovery that synonymous base substitutions, which do not cause amino acid changes, almost always occur at much higher rate than nonsynonymous (amino acid altering) substitutions. Evolutionary base substitutions at introns also occur at a comparatively high rate. This is because the changes that are subjected to natural selection will include many that are deleterious and so unlikely to survive in later generations.

In contrast to phenotypic evolution, molecular evolution is characterized by two outstanding features. First is the constancy of the rate, so that for each protein or gene region, the rate of amino acid or nucleotide substitution is approximately constant per site per year (giving rise to the molecular clock). The second is that functionally less important molecules, or portions of molecules, evolve faster than more important ones.

Molecular evolution is like language change where grammatical markers and basic vocabulary changes much more slowly than the less basic vocabulary. It is providing new insights in biological evolution, and the molecular clock has been critical in helping reconstruct the history of life. Similarly, language evolution has helped in the understanding of ancient history.

Vedic evolution theory is like the neutral theory. If the gene function is seen through the agency of the three gunas, then evolution has a net genetic drift towards higher intelligence.

The tattvas are not discrete and their varying expression creates the diversity of life in and across leading different species. Each sensory and motor tattva is mapped into a corresponding organ.

Schrödinger, in his (book) “What is Life?” was the one to suggest that an “aperiodic crystal forms the hereditary substance,” inspiring Watson and Crick to search for this molecule (DNA). He also thought that the Sankhyan tattvas were the most plausible model for the evolution of the sensory organs.

 

ALIENATION AND HEALTH

The world is in a crisis, not only because of religious conflict, but also due to the corrosive effect of materialism on the human psyche. There is violence in the schools, despair and depression amongst the young, and the fear that globalization will be destructive to social well-being.

In the midst of this, modern medicine is failing: not only because of the side-effects of drugs, but also because of the manner it creates drug dependency, so that most people are on one medication or other for stress, heart disease, cholesterol reduction, or pain. This has driven up the cost of health care so high that American companies are no longer competitive in the international marketplace, placing American prosperity at risk.

Perhaps this is because modern medicine seeks to look only at the body, without thought for the mind. The linkages between the mind and body are becoming apparent to science as a result of new research. For example, it is now known that stress caused reduction in the immune function. But, in itself, this knowledge is not helpful in creating new therapies. One needs a paradigmatic shift that takes as the starting point the Vedic conception of mind and body as a single entity.

Vedic science offers a vision of the world that is richer than that of materialist science, which it subsumes as a lower kind of knowledge. Unlike the Bible or the Koran, the Vedas are not in conflict with secular knowledge. They offer a way to obtain knowledge of the self that is essential for self-transformation, a knowledge that complements secular knowledge.

The challenge is to translate the categories that describe the nature of consciousness in the Vedas and the later books into a contemporary idiom that makes them accessible to a wider audience. Meanwhile, personal sadhana on the Vedic path is a way to obtain wisdom and insight needed to navigate through the present times.

 

From: Vinod Kumar Gupta < >

धार्मिक आस्था पर आघात की घृणित राजनीति ⁉

 

⭕भारतीय संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट करके भूमि पुत्र बहुसंख्यक हिंदुओं की आस्थाओं पर निरंतर प्रहार करते रहने की मुगलकालीन परंपरा अभी जीवित है। आज केंद्र में राष्ट्रवादी भाजपानीत राजग सरकार के सशक्त शासन में भी देशद्रोहियों व भारतविरोधियों के षड्यंत्रो पर अंकुश नहीं लग पा रहा है।

⭕यह कितना विचित्र है कि जिस “कांग्रेस” ने आरंभ में गौवंश “दो बैलो की जोड़ी” व “गाय-बछड़े” के चुनाव चिन्ह के आधार पर भी भारतीय संस्कृति का भरपूर लाभ उठाते हुए बहुसंख्यक हिंदुओं को लुभाकर दशकों देश पर शासन किया वहीँ आज सत्ता से बाहर होने पर उन मान बिंदुओं के प्रति भी निरंकुश हो रही है ।

⭕सत्ताहीनता की पीड़ा में कांग्रेसजनों के निरन्तर असन्तुलित व्यवहार से होने वाली छटपटाहट अनेक अवसरों पर उनकी अराष्ट्रीय भावनाओं व अपरिपक्वता के दुखद संकेत कराती है।

⭕ जिसके परिणामस्वरुप केरल में काग्रेसियों के दुःसाहस ने गाय के बछड़े को सार्वजनिक रुप से काट कर उसका वितरण करके समस्त भारतवासियों को आक्रोशित कर दिया है।

⭕क्या खाते है यह व्यक्तिगत है परंतु क्या खा रहें है इसका प्रदर्शन करने का क्या हेतू है? क्या राष्ट्रवादियों की भावनाओं को भडका कर सामाजिक व साम्प्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ कर अराजकता फैलाना और साम्प्रदायिक दंगे करवाकर निर्दोष लोगों के जान-माल के साथ साथ राष्ट्रीय सम्पत्तियों हो हानि पहुँचाना उचित है? इस नृशस घटना ने बहुसंख्यक हिन्दुओं के मान-बिंदुओं पर प्रहार करके जिहादी संस्कृति के दुःसाहस को और बढ़ाया है।

⭕हमारा केंद्र व केरल की सरकार से विनम्र अनुरोध है कि इस दुर्दान्त घटना में सम्मलित सभी आरोपियों को अविलम्ब कठोर वैधानिक कार्यवाही करके उचित दंड दिया जाय। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाये कि इस प्रकार से केवल हिंदुओं को अपमानित करने और उनको ठेस पहुँचाने के लिये उनकी संस्कृति व आस्थाओं पर प्रहार करने वालों पर भविष्य में भी कठोर कार्यवाही की जायेगी।

⭕ध्यान रहें केंद्र सरकार ने 23 मई को “पशु क्रूरता निवारण कानून” के अंतर्गत गौवंश, भैस, ऊंट आदि पशुओं के अनावश्यक वध को रोकने और बाज़ार में इन पशुओं की क्रय-विक्रय को नियमित करने की अधिसूचना जारी की थी। परंतु धर्मद्रोहियों ने हम हिन्दू धर्मावलंबियों को पीड़ा पहुँचाने के लिये विशेषरुप से गौवंश काटने और उसके मांस के भक्षण का खुला प्रदर्शन किया है।

⭕अतः इस मानसिकता का पोषण करके उसका सशक्तिकरण करने वाली अमानवीय प्रवृतियों को जब तक कुचला नही जायेगा तब तक माँ भारती पर हो रहें ऐसे आघातो को नियंत्रित नही किया जा सकता।

⭕यह ठीक है कि हमारे संविधान का अनुच्छेद 19 (1 जी) के अनुसार सभी नागरिकों को कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने का अधिकार दिया गया है। परंतु इसको नियंत्रित करने की व्यवस्था भी अनुच्छेद 19 (6) में स्पष्ट कर दी गई है ।जिसके अनुसार यह स्पष्ट है कि अनुच्छेद 19 (1जी) में दिये गये अधिकारों का दुरुपयोग न हो सके इसके लिये केंद्र व राज्य सरकार को उचित क़ानून बनाने का अधिकार प्राप्त है । अतः जिसप्रकार नागरिकों को व्यापार चुनना मौलिक अधिकार है तो उसी प्रकार सरकार का यह दायित्व व अधिकार है कि सभी बाजारो को विनियमित करें और रखें।

⭕यहां यह उल्लेख भी आवश्यक है कि पशु मेले में पशुओं के क्रय-विक्रय में अधिकाँश पशुओ को कत्लगाह, बूचड़खाने व स्लाटर हाउस में कटने के लिये ही भेजा जाता है । जबकि इन मेलों में कृषि कार्यो के लिये पशुओं के क्रय-विक्रय की मान्यता होती है । इसके अतिरिक्त यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि भारत बंग्ला देश की सीमाओं पर गौवंश की तस्करी का वर्षो पुराने आपराधिक कृत्यों में अनेक अपराधी व आतंकवादी निरन्तर सक्रिय रहते है।

⭕एक समाचार के अनुसार भारतीय सीमा सुरक्षा बलों ने भारत-बंग्ला देश सीमा से केवल वर्ष 2015 में ही लगभग एक लाख पशु मुक्त कराये थे जिसमें अधिकांश गाय, बैल व बछड़े थे। उस समय भारत व बंग्लादेश के 400 तस्कर भी पकडे गये थे। परिणामस्वरुप बंग्ला देश में गाय के मूल्यों में 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई जिससे उनके चमड़ा उद्योग में 15 प्रतिशत व गौमांस के अंतर्राष्ट्रीय बाजार में 75 प्रतिशत की गिरावट हुई थी।

⭕देश में प्रतिवर्ष 14 जनवरी से 29 जनवरी तक पशु कल्याण पखवाड़ा मनाया जाता है, परंतु संभवतः अधिकांश लोगों को यह ज्ञात ही न होगा और न ही उन्होंने कभी सुना व देखा होगा? बहुत से समाजसेवी समय समय पर यह मांग भी करते रहें है कि मानवाधिकारों की तरह पशु अधिकारों को भी नियोजित किया जाये।

⭕भारतीय सेना ने भी अपने डॉग-स्क्वॉयड के डॉग सदस्यों को अवकाश देने के बाद न मारने का कुछ वर्ष पूर्व निश्चय किया था। इस संबंध में अक्टूबर 2015 में राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित एक लेख के अनुसार एक चौकाने वाला प्रसंग है कि स्पेन के एक क्षेत्र / कस्बे ‘टिग्योरास डि वैले’ में एक विचित्र घटना हुई जिसमें उस क्षेत्र में वोटिंग करवा कर बहुमत से वहां के लोगों ने निश्चय किया कि कुत्तो व बिल्लियों आदि पालतु पशुओं को भी “गैर इंसानी नागरिक” का स्टेटस दिया जाय। फिर वहां पशु अधिकार क़ानून में यह स्पष्ट किया गया कि ‘गैर इंसानी नागरिकों’ को अपनी मौज़-मस्ती के लिए तंग करना व तड़पाने का ‘इंसानी नागरिकों’ को कोई अधिकार नही है और उस इंसान को दंडित भी किया जायेगा जो इन पशुओं को यातना देगा।

⭕यहां यह उल्लेख इसलिए आवश्यक है कि जब पालतू पशुओं के प्रति इतनी उदारता व सहिष्णुता मनुष्य में है तो फिर हिन्दुओं की धार्मिक आस्था से जुड़े गौवंश के प्रति सम्मान तो सभी को रखना ही चाहिये।

⭕वर्षो से गौवध को प्रतिबंधित करने के अनेक छोटे-बड़े आंदोलन किये जाते आ रहें है और कुछ राज्यों में इसके लिये कानून बने भी है, परंतु राजनैतिक विमर्श बार बार असफल होता रहा है ।

⭕केंद्र सरकार के इस निर्णय का तमिलनाडु, केरल व पश्चिम बंगाल की सरकारों के साथ साथ देशविरोधी तत्वों ने भी विरोध किया है, जबकि राज्य सरकारें इस पर अपने विधि-विधान में आवश्यक संशोधन करने के लिए स्वतंत्र है। लेकिन गऊ माता को ईश्वर तुल्य मानने वाले हिन्दू बहुल समाज की मर्यादाओं को अपमानित करके उनके उत्पीडन से एक विशेष वर्ग (मुसलमानों) को प्रसन्न करने की ओछी राजनीति ने सेक्युलर कहें जाने वाले समाज को जकड़ लिया है।जिससे राष्ट्रहित सर्वोपरि की भावना का सर्वथा अभाव होता जा रहा है ।

⭕इन समस्त आग्रहों, दुराग्रहों व पूर्वाग्रहों के बीच यह सुखद है कि अनेक मुस्लिम नेताओं ने गाय को “राष्ट्रीय पशु” घोषित करने व गौवध को प्रतिबंधित करने की मांग उठायी है और उसका समर्थन करने का भी निश्चय किया है।

 

✍🏻विनोद कुमार सर्वोदय

(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)