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⭕ “समान नागरिक संहिता” (Uniform Civil Code ) का प्रावधान हमारे संविधान में  आरंभ (1950) से ही है और इसे धीरे धीरे लागू करने की अनुशंसा अनुच्छेद 44 में की गयी है । परन्तु मुस्लिम वोट बैंक के लालच में व इमामों के दबाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरु जी ने अनेक विवादों के बाद भी “समान नागरिक संहिता”  के प्रावधान को संविधान के मौलिक अधिकारों की सूची से हटा कर “नीति निर्देशक तत्वों” में डलवा दिया। परिणामस्वरुप यह विषय न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर हो गया और वह अब केवल सरकार को इस क़ानून को बनाने के लिए परामर्श दे सकती बाध्य नहीं कर सकती। अनेक विवादों के बाद भी सुधार के लिए हिन्दुओ के पर्सनल लॉ होने के उपरांत भी 1956 में  हिन्दू कोड बिल ( Hindu Code Bill ) थोपा गया था। परंतु अन्य धर्मावलंबियों के पर्सनल लॉ को यथावत बनाये रखने की क्या बाध्यता थी जबकि उनमे भी आवश्यक सुधारों की आवश्यकता अभी भी बनी हुई  है। ऐसा क्यों नही हो सका इसका उत्तर धर्मनिरपेक्षता के बुर्के में ढक जायेगा।
⭕यह अत्यधिक दुर्भाग्यपूर्ण है कि पिछले 30- 35 वर्षो में 5 -6 बार उच्चतम न्यायालय ने  समाज में घृणा, वैमनस्यता व असमानता दूर करने के लिए समान कानून को लागू करना आवश्यक माना है फिर भी अभी तक कोई सार्थक पहल नही हो पायी । लगभग 15-20  वर्ष पूर्व में किये गए एक सर्वे के अनुसार भी  84 % जनता इस कानून के समर्थन में थी । इस सर्वे में अधिकांश मुस्लिम माहिलाओं व पुरुषो ने भी भाग लिया था । संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी सन  2000 में समान नागरिक व्यवस्था के लिये भारत सरकार को  परामर्श दिया था। क्या यह राष्ट्रीय विकास के लिए अनिवार्य नहीं ? क्या “सबका साथ व सबका विकास ” के लिए एक समान कानून व्यवस्था बनें तो इसमें आपत्ति कैसी ?
⭕विश्व में किसी भी देश में धर्म के आधार पर अलग अलग कानून नहीं होते सभी नागरिकों के लिए एक सामान व्यवस्था व कानून होते है। केवल भारत ही एक ऐसा देश है जहां अल्पसंख्यक  समुदायों के लिए पर्सनल लॉ बनें हुए है। जबकि हमारा संविधान अनुच्छेद 15 के अनुसार धर्म, लिंग, क्षेत्र व भाषा आदि के आधार पर समाज में भेदभाव नहीं करता और एक समान व्यवस्था सुनिश्चित करता है। परंतु संविधान के अनुच्छेद 26 से लेकर 31 तक से कुछ  ऐसे व्यवधान है जिससे हिंदुओं के सांस्कृतिक -शैक्षिक-धार्मिक संस्थानों व धार्मिक ट्रस्टो को विवाद की स्थिति में शासन द्वारा अधिग्रहण किया जाता आ रहा है । जबकि अल्पसंख्यकों के संस्थानों आदि में विवाद होने पर शासन कोई हस्तक्षेप नही करता….यह विशेषाधिकार क्यों ?
⭕ इसके अतिरिक्त एक और विचित्र व्यवस्था संविधान में की गई कि  अल्पसंख्यको को अपनी धार्मिक शिक्षाओं को पढ़ने की पूर्ण स्वतंत्रता रहेगी । जबकि संविधान सभा ने  बहुसंख्यक हिन्दूओं के लिए यह धारणा मान ली कि वह तो अपनी धर्म शिक्षाओं को पढ़ाते ही रहेंगे। अतः हिन्दू धर्म शिक्षाओं को पढ़ाने को संविधान में लिखित रुप में प्रस्तुत नही किये जाने का दुष्परिणाम आज तक हिन्दुओं को भुगतना पड़ रहा है।
⭕हमारे संविधान में अल्पसंख्यकों को एक ओर तो उनको अपने धार्मिक कानूनों (पर्सनल लॉ) के अनुसार पालन करने की छूट है और दूसरी ओर संवैधानिक अधिकार भी बहुसंख्यकों के बराबर ही मिले हुए है। फिर भी विभिन्न राष्ट्रीय योजनाओं और नीतियों जैसे परिवार नियोजन, पल्स पोलियो, राष्ट्रगान, वन्देमातरम् आदि  पर विशेष सम्प्रदाय का विपरीत व्यवहार किसी से छुपा नहीं है । परंतु पर्सनल लॉ के अन्तर्गत  उत्तराधिकार, विवाह, तलाक़ आदि में मुस्लिम महिलाओं का उत्पीड़न अमानवीय अत्याचार कहें तो गलत नहीं होगा।
⭕यह कैसी मुस्लिम धार्मिक कुप्रथा है जिसमे तीन बार तलाक़ की अभिव्यक्ति के अनेक रुपो में से किसी भी एक प्रकार से एक पुरुष अपनी पत्नी को तलाक दे देता है। परंतु उस पीड़ित मुस्लिम महिला जिससे निकाह के समय तीन बार “कुबूल है- कुबूल है -कुबूल है” कहलवाया जाता है , उसकी तलाक़ में कोई सहमति नहीं ली जाती तो क्या यह एकपक्षीय अन्याय नहीं हुआ ?  किसी भूल सुधार व पश्चाताप की स्थिति में (तलाक़ होने के बाद)  पुनः अपने पूर्व पति से निकाह के लिए हलाला जैसी व्यवस्था व्यभिचार को बढ़ावा देकर मानवीय संवेदनाओं का शोषण व चारित्रिक पतन की पराकाष्ठा ही है।अनेक बार हलाला की अत्यंत निंदनीय, व महिला का मानसिक व शारीरिक उत्पीड़न करने वाली रस्में पूरी करने के बाद भी पूर्व पति अपनी तलाक़शुदा पत्नी को पुनः स्वीकार नही करके जलालत की सारी सीमायें लांघ देता है। इसप्रकार सदियों से मुस्लिम महिलाओं को आत्मग्लानि भरा का जीवन जीने को विवश होना पड़ता है। मुस्लिम पुरुषों की ऐसी अधिनायकवादी सोच के कारण सामान्यतः पीड़ित मुस्लिम महिलायें “मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड” को  “मुस्लिम मर्द पर्सनल लॉ बोर्ड” कहती है। अधिकाँश कट्टरपंथी व सेक्युलर कहते है कि सरकार को धार्मिक मामलो में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। परंतु सरकार का अपने नागरिको को ऐसे अमानवीय अत्याचारों से बचाने का संवैधानिक दायित्व तो है ।
⭕आज के वैज्ञानिक युग में जब आधुनिक समाज चारों ओर अपनी अपनी प्रतिभाओं के अनुसार निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर है तो उस परिस्थिति में तलाक़, हलाला व बहुविवाह जैसी अमानवीय कुरीतियों को प्रतिबंधित करना ही होगा। तभी मुस्लिम महिलाओं को व्याभिचार की गंदगी से बचा कर उनके साथ न्याय हो सकेगा और वे एक सामान्य जीवन सम्मान से जी सकेगी ? इसके विरुद्ध  उच्चतम न्यायालय में  एक पीड़ित मुस्लिम महिला शायरा बानो का विवाद विचाराधीन है । आजकल  जहां प्रिंट मीडिया में नित्य बड़े बड़े लेख छप रहें है वही टीवी न्यूज चैनलो पर भी तीन तलाक़ पर बड़ी बड़ी बहसें चल रही है।
⭕परंतु तीन तलाक़ के साथ ही  “समान नागरिक संहिता ” का विरोध करने वाले कट्टरपंथी मुल्लाओं को इन धार्मिक कूरीतियों के प्रति कोई आक्रोश नहीं आता ? अगर उनकी धार्मिक पुस्तकों में ऐसी व्यवस्था है तो उसमें संशोधन करके उन्हें अपने समाज को इससे बाहर निकालना चाहिये। “समान नागरिक संहिता” से इस कुप्रथा का कोई संबंध नहीं फिर भी मुल्लाओं ने मुस्लिम समाज में इसका एक ऐसा भय बना रखा है मानो की भविष्य में उनके शवों को भी दफनाने की प्रथा के स्थान पर कही जलाने की व्यवस्था न हो जाय ?
⭕ इस प्रकार के अज्ञानता से भरे रुढीवादी समाज को “अपना विकास और सबका साथ” तो चाहिए परंतु उसको ठोस आधार देने वाली “समान नागरिक संहिता” स्वीकार नहीं,  क्यों ? यह कहां तक उचित है कि राष्ट्र में सुधारात्मक नीतियों का विरोध केवल इसलिए किया जाय कि कट्टरपंथी मुल्लाओं की आक्रमकता बनी रहें और अमानवीय अत्याचार होते रहें ? जबकि मुस्लिमों को  देश में ढोंगी धर्मनिरपेक्षता के बल पर अनेक लाभकारी योजनाओं से मालामाल किया जाता आ रहा है। फिर भी वे अपनी दकियानूसी धार्मिक मान्यताओं से कोई समझौता तो दूर उसमें कोई दखल भी सहन नहीं करना चाहते।
⭕अनेक प्रकार से अल्पसंख्यकों को निरंतर पोषित करने की नीतियों के लिए सरकार पर दबाव बनाये रखने की मुस्लिम मानसिकता में कभी कोई परिवर्तन होगा ? क्या यह आक्रामकता उनकी भारत को दारुल-इस्लाम बनाने की वर्षो पुरानी घिनौनी महत्वाकांक्षा की ओर एक संकेत तो नहीं ? कुछ मुल्लाओं और मौलवियों ने तलाक़, हलाला व बहुविवाह आदि में संशोधन व सुधार की चर्चाओं में  ऐसा होने पर  देश में गृह युद्ध जैसी स्थिति होने की चेतावनी भी दी है। क्या ऐसी धमकी देना राष्ट्रद्रोह नहीं ?
⭕यहां एक और विचारणीय बिंदु यह भी है कि मुस्लिम समुदाय ने अपराधों पर अपने धार्मिक कानून शरिया को अलग करके भारतीय दंड संहिता को ही अपनाना उचित समझा है। क्योंकि शरिया में अपराधों की सजा का प्रावधान अत्यधिक कष्टकारी है। फिर भी “समान नागरिक संहिता” का विरोध करना इन कट्टरपंथियों का जिहादी जनून है ।
⭕”समान नागरिक संहिता” ऐसी होनी चाहिये जिसका मुख्य आधार केवल भारतीय नागरिक होना चाहिये और कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म, जाति व सम्प्रदाय का हो सभी को सहज स्वीकार हो।जबकी विडम्बना यह है कि एक समान कानून की मांग को साम्प्रदायिकता का चोला पहना कर हिन्दू कानूनों को अल्पसंख्यकों पर थोपने के रुप में प्रस्तुत किये जाने का कुप्रचार किया जा रहा है।
⭕यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि 1947 में हुए धर्माधारित विभाजन के पश्चात भी हम आज लगभग 70 वर्ष बाद भी उस विभाजनकारी व समाजघाती सोच को समाप्त न कर सकें बल्कि उन समस्त कारणों को अल्पसंख्यकवाद के मोह में फंस कर प्रोत्साहित ही करते आ रहे है। हमारे मौलिक व संवैधानिक अधिकारो व साथ में पर्सनल लॉ की मान्यताए कई बार विषम परिस्थितियां खड़ी कर देती है , तभी तो उच्चतम न्यायालय  “समान नागरिक संहिता” बनाने के लिए सरकार से बार-बार आग्रह कर रहा है।
⭕”राष्ट्र सर्वोपरि”  की मान्यता मानने वाले सभी यह चाहते है कि एक समान व्यवस्था से राष्ट्र स्वस्थ व समृद्ध होगा और भविष्य में अनेक संभावित समस्याओं से बचा जा सकेगा। यह भी कहना उचित ही होगा कि भविष्य में असंतुलित जनसंख्या अनुपात के संकट से भी बचने के कारण राष्ट्र का धर्मनिरपेक्ष स्वरुप व लोकतांन्त्रिक व्यवस्था भी सुरक्षित रहेगी और जिहादियों का बढ़ता दुःसाहस भी कम होगा ।
⭕अब सरकार का दायित्व है कि इसको लाने के लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति के साथ संविधान की मूल आत्मा व सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के आधार पर एक प्रारुप तैयार करके राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक परिचर्चा के माध्यम से इस कानून का निर्माण करवायें। निःसंदेह  आज देश की एकता, अखंडता, सामाजिक व साम्प्रदायिक समरसता के लिए  “समान नागरिक संहिता” को अपना कर विकास के रथ को गति देनी होगी।

✍विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)
गाज़ियाबाद

From: Vinod Kumar Gupta < >

“साम्प्रदायिक सद्भाव एक मृग मरीचिका”

▶ क्या गांधी जी का देश बताने वाले साम्प्रदायिक सद्भावना की बात करके कभी उस सौहार्द को बना पाएं या गांधी जी भी कभी उस मृग मरीचिका को खोज पायें? अनेक महापुरुषों के कथनों से भी यही सत्य छलकता रहा कि हिन्दू- मुस्लिम एकता संभव नहीं अर्थात साम्प्रदायिक सद्भाव कहने व सुनने में अच्छा लगता है पर इसकी दूरी अनन्त है। पाकिस्तान के जनक मोहम्मद अली जिन्नाह ने भी कहा था कि हिन्दू मुस्लिम दो अलग अलग विचारधाराएं है और इनका एक साथ रहना संभव नहीं। जब मुसलमान जिहादी दर्शन का अनुसरण करेंगें और गैर मुस्लिमों पर अत्याचार या उनकी धार्मिक आस्थाओं पर निरंतर आघात करते रहेँगेँ तो कब तक कोई अपने अस्तित्व की रक्षा में उनके विरोध से बचता रहेगा ? अतः ये कैसे कहा जा सकता है कि हमारा देश सदियों से सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल रहा है ? इतिहास को झुठलाया नहीं जा सकता । भारत के कोने कोने में आप मुगलो की बर्बरता के निशान आज भी देख सकते है। क्या साम्प्रदायिक सद्भाव के लेखो व भाषणों से कोई इसको समझने के लिए तैयार होगा ? सन 1947 में देश के विभाजन का मूल कारण हिन्दू-मुस्लिम धर्म पर ही आधारित था।

▶आज समाज जागरुक हो गया है। अब असत्य व अन्याय सहकर प्रताड़ित होंते रहने का समय नहीं, हिंदुओं ने एक तरफा हुए अपने ही सगे-संबंधियों के भीषण कत्लेआमो को झेला है । उन्होंने अपनी भीरुता और कायरता से हज़ारों मंदिरो को विंध्वस होते देखा है और साथ ही अपनी व देश की अनन्त सम्पदा को लुटवाया है। अत्याचारों से चीखती -विलखती बहन बेटियों की चीत्कार को आज भी भुलाया नहीं जा सकता। कब तक इतिहास के काले पन्ने सार्वजनिक नहीं किये जायेंगें? एक वर्ग दूसरे वर्ग को लूटता रहें , उनकी बहन बेटियों को उठाता रहें, उसकी दुकान -मकान आदि सम्पति को जलाता रहें तो वो कब तक चुप रहकर क्यों कर सद्भाव की बड़ी बड़ी बातें कर पायेगा ? जबकि “द पॉलिटिक्स ऑफ कम्युनिलिज्म 1989″ की लेखिका एवं मुस्लिम स्कॉलर जैनब बानो के अनुसार यह स्पष्ट होता है कि 75% साम्प्रदायिक दंगों की शुरुआत मुसलमान ही करते है । दशकों पूर्व जब भिवंडी ( महाराष्ट्र) में हुए दंगो पर 14 मई 1970 को जनसंघ के नेता के रुप मे श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जो कहा उसके कुछ अंश… ” डेढ साल में हुए प्रमुख दंगो के कारणों की जांच एवं उसके विवरण भारत सरकार के द्वारा तैयार एक रिपोर्ट में उपलब्ध है। उस काल मे 23 दंगे हुए और मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार उन 23 दंगों में से 22 दंगों का प्रारंभ उन लोगों ने किया जो अल्पसंख्यक समुदाय के माने जाते है।” (बही पृष्ठ-254)। ऐसे में साम्प्रदायिक सद्भाव एक मृग मरीचिका से अधिक और कुछ नही।

▶क्या यह भी सत्य नही है कि स्वतंत्र भारत की वर्तमान राजनीति अल्पसंख्यकों के नाम पर मंत्रालय व आयोग गठन करके वर्षो से नित्य नई नई योजनाओं द्वारा मुसलमानों पर अरबों रुपया लुटाती आ रही है? ऐसी विचित्र परिस्थितियों में अनेक प्रकार से अपने अधिकारों से वंचित होने वाले बहुसंख्यक हिन्दू समाज से यह आशा करें कि वह साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए उदाहरण बन कर राष्ट्र की एकता और अखंडता बनायें रखें ? यह भेदभावपूर्ण नीतियां भारतीय राजनीति में एक जोंक की तरह चिपक गई है । इससे क्या हमारे लोकतांन्त्रिक मूल्य स्वस्थ व सुरक्षित रह पायेंगे ?

▶यहां पिछले वर्षों में हुई कुछ घटनाओं का उल्लेख करना भी अनुचित नही । ग्रेटर नोएडा के एक गांव बिसाहडा (दादरी) जिसमे 28 सितम्बर 2015 की रात को धार्मिक आघातों पर हुई घृणा से एक धर्म विशेष (मुसलमान) व्यक्ति की मृत्यु होने से मीडिया व राजनीति को एक धारदार हथियार हाथ लग गया था। समाज की ढोंगी धर्मनिरपेक्षता इस धार को अपने अपने अनुसार उचित अनुचित की फ़िक्र न करते हुए प्रयोग कर रही थी । विभिन्न साहियकारों ने इसके बहाने सरकार को घेरने व उसको बदनाम करने के लिए धीरे धीरे अपने पुरस्कार लौटाने आरंभ कर दिये थे। परंतु उसमें प्रमाण पत्र के साथ साथ मिलने वाली धनराशि भी सम्मलित थी या नही, अभी किसी ने स्पष्ट नहीं किया है। इस प्रकरण को सांप्रदायिकता के परिणाम से हुई हिंसा के लिए उस पर आक्रोश दिखाने का एक नाटक समझा जाये तो अनुचित नही होगा ? क्योंकि इस घटना के सहारे अनेक षड्यंत्रकारी तत्व भारत की छवि को देश-परदेश में धूमिल करके उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार को कटघरे में खड़े करने के स्थान पर केंद्र में मोदी जी की सरकार पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने लगे। इसमें सबसे अधिक सक्रियता उन स्वयं सेवी संस्थाओं ने दिखाई जो नियम विरुद्ध बाहरी देशों के धन पर फल-फूल रही थी और जिनको केंद्रीय सरकार जांच के घेरे में ला रही थी। इन संस्थाओं के कर्ताधर्ताओं ने देश और विदेश में भारत की धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिक सद्भावना पर भयंकर संकट का झूठा प्रचार किया। साथ ही अनेक मानवाधिकारवादियों को भी भ्रमित करने में सफल हुए। इन षड्यंत्रकारियों को कुछ माह बाद बिहार के चुनावों में बीजेपी की हार से बड़ा संतोष मिला था। इस प्रकार साम्प्रदायिकता के नाम पर राष्ट्रवाद को झुठलाना एक सामाजिक चुनौती बनती जा रही है।

▶यह भी नही भुलाया जा सकता कि कश्मीर, मालदा, कैराना व शामली के समान देश के विभिन्न क्षेत्रों में मुसलमान अपनी संख्या बढ़ा कर वहां रहने वाले हिन्दुओं पर अनेक दुर्व्यवहार व अत्याचार करते है। जिससे पीड़ित हिन्दू वहां से पलायन करने को विवश हो जाते है। इस प्रकार देश के हज़ारो क्षेत्रो में मुस्लिम बहुल बस्तियां विकसित होती जा रही है। जिनको कोई “मिनी पाकिस्तान” कह देता है कोई “मौहल्ला पाकिस्तान” बना देता है। जबकि विभिन्न हिन्दू बहुल बस्तियों में कम संख्या में रहने वाले मुसलमान भी कभी पीड़ित नही होते बल्कि सहिष्णु हिन्दुओं से प्रेम व सम्मान ही पाते है।

▶राष्ट्रवाद को झुठलाने की एक और घटना जब सितम्बर 2008 में बटला हाउस (दिल्ली) में आजमगढ़ के आतंकियों को मारा गया तो उसमे दिल्ली पुलिस के शूरवीर इंस्पेक्टर के बलिदान को ही संदेहात्मक बना दिया और (छदम्) धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम आतंकियो के घर आजमगढ़ जाने की नेताओं में होड़ ही लग गयी थी। यहा तक समाचार आये थे कि उस समय सत्ता के शीर्ष को नियंत्रित करने वाली सोनिया गांधी ने भी आजमगढ़ के आतंकवादियों पर आंसू बहायें थे । सितंबर 2008 की इस घटना के बाद से आज तक आजमगढ़ के कट्टरपंथी मुसलमान और उलेमाओं की टोली जंतर-मंतर (नई दिल्ली) में प्रतिवर्ष सितंबर माह में विरोध प्रदर्शन करके आतंकियों को निर्दोष और हुतात्मा महेश चंद्र शर्मा के बलिदान को व्यर्थ प्रमाणित करना चाहती है। क्या यह कट्टरता साम्प्रदायिक सद्भाव बनने देगी ?

▶इससे अधिक भयावह व दर्दनाक घटनायें भी देश में होती रही है पर एक तरफ़ा देखने की प्रवृति का चलन बने रहने से स्वस्थ व निष्पक्ष विचार की सोच लुप्त होती रही है । साम्प्रदायिक सौहार्द की बात कहने वाले केवल कट्टरपंथियों के पक्ष में खड़ें रहकर ढोंगी धर्मनिरपेक्षता की आड़ में उदार हिन्दू समाज व राष्ट्रवाद को कोसने से बाज़ नही आते। अनेक देशद्रोही व मुस्लिम साम्प्रदायिकता के घृणित दुष्प्रभावों के समाचार आते रहते है पर देश के गणमान्य लोगो ने उस पर कभी प्रतिक्रिया नहीं करी । ऐसी अनेक चुभने वाली सूचनायें व समाचार दिलों से निकले नहीं है। हमारा मीडिया उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर , बिजनौर, बरेली, लखनऊ, कानपुर, सहारनपुर,आगरा आदि में हुए पिछले पांच वर्षों के सांप्रदायिक दंगों की स्वस्थ पत्रकारिता से बचता आ रहा है।

इसी प्रकार पश्चिम बंगाल के बर्द्धमान , मालदा व धूलागढ़ आदि में पिछले वर्षों की मुस्लिम साम्प्रदायिकता के नंगे नाच की अनेक घटनाओं पर न जाने किस बोझ तले स्वस्थ पत्रकारिता का परिचय नही मिलता ?

जबकि मुस्लिम आतंकियों व धार्मिक भावनाओं पर आघात पहुँचाने के वशीभूत हुई किसी मस्लिम की मौत पर मीडिया जगत ऐसे व्यवहार करता है मानो कि हिंदू समाज ने मुस्लिम आतंकवादियों से भी बड़ा अपराध कर दिया हो .

▶यह सत्य है कि इस्लाम का जिहादी दर्शन आक्रान्ताओं को ही बढ़ावा देता है जबकि भारतीय दर्शन सद्भाव की बात करके वसुधैव कुटुंबकुम्ब की धारणा को बल देता है ।

परंतु आत्मस्वाभिमान मिटा कर आत्मघात सहकर अपने अस्तित्व को समाप्त करके जिहादियों के दारुल-इस्लाम के सपने को साकार करना या स्वीकार करने का सद्भाव ही भारतीयों को क्यों सिखाया जाता है ?

क्या अफगानिस्तान, पाकिस्तान , बंग्ला देश व कश्मीर में हिन्दुओ को सम्पूर्ण विनाश की ओर ले जा रहें जिहादियों के अंदर बैठे शैतान को कभी कोई नष्ट करने की सोचेगा ? आज पूरी दुनिया इसी जिहादी मानसिकता से जूझ रही है।

▶आज महात्मा कहे जाने वाले मोहनदास करमचंद “गांधी” अप्रसांगिक हो चुके है ,एक विभाजन झेल लिया है, अतः अब भारत माता को खंड खंड करने के षड्यंत्रों को रोकने के प्रयास करने होंगे .

मुजफ्फरनगर, बिसाहड़ा, मालदा व धूलागढ़ जैसे काण्ड पुनः न हो इसके लिए किसी की भी धार्मिक भावनाओं पर आघात नहीं हो ऐसा कौन सुनिश्चित करेगा ?

अतः जब तक जिहादी दर्शन व इस्लामिक शिक्षाओं में आवश्यक परिवर्तन नहीं होगा तब तक साम्प्रदायिक सद्भाव की बात करना व लिखना मृग मरीचिका ही बनी रहेगी .

 

विनोद कुमार सर्वोदय

(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)

गाज़ियाबाद

 

From: Pramod Agrawal < >

आप जानते हैं ?
कि यूपीए सरकार ने किस तरह से एक एक्ट के जरिये सेना के हाथ को बांध दिया है ? 
नही ? 
तो पढ़िए ये और सोचिए कि हमारी सेना क्या सच मे इतनी कमजोर है ?

2010 में मनमोहन सरकार ने आतंकवादियों के हितों 
(याद रखिये आतंकवादी का हित) को संज्ञान में लेते हुए कश्मीर में सदभावना_एक्ट लगाई जिसमें कुछ ऐसे पहलू को शामिल किया गया है जिसके अनुसार हमारे फौजियो को गुनाहगार बनाना आसान हो गया

1–जब तक आंतकवादी फायर न करे तब तक फायर नहीं करना है। 
( मतलब फायर के अलावा कुछ भी करे, पत्थर फेंके थप्पड़ मारे डंडे मारे मगर फोर्स चुपचाप पिटती रहे अपने हाथ पैर को बांधके, जैसा कि हमेशा 
 पत्थर फेंकने की घटना सामने आती है और अभी जल्द ही एक वीडियो में देखा गया था कि सेना चुपचाप है और कश्मीरी लड़के सेना को थप्पड़ और 
पैर मार रहे )…
2– मारे गए आंतकवादी के पास हथियार होंना जरूरी है,और हथियार हो भी तो भी सैनिक तब तक फायर नही कर सकता जब तक कि आतंकवादी 
फायर न करे
( मतलब सेना आतंकवादी के फायर करने का वेट करे और अगर आतंकवादी मारा जाता है और मरने के बाद कोई उसका हितैषी हथियार छुपा दे तो उसे आतंकवादी घोषित न करके सीधा सादा कश्मीरी जवान घोषित किया जा सकता है और सैनिकों के ऊपर केस किया जा सकता है, और ये बात सबको पता है कि कश्मीर की लोकल पुलिस भी आतंकवादियों से मिली होती है तो हथियार छुपाना कोई मुश्किल नही होगा)…
3–मारे गए आतंकवादी के परिजनों को स्थानीय अदालत ( ज्ञातव्य हो कि कश्मीर के स्थानीय अदालत जहाँ सेना बेगानी ही होती है )में ये साबित करना होगा की जो मारा गया वो आतंकवादी ही है और उसके पक्ष में आतंकवादी के परिजन कोर्ट में सेना के खिलाफ रिट कर सकते है
और अगर आतंकवादी आतंकवादी साबित न हुआ तो सेना के (उसको मारने वाले) जवानो पर कत्ल का केस चलता है ( मतलब की एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा हुआ साबित हो हमारे सैनिक के लिए, आतंकवादी मारने पर प्रोत्साहन कम सज़ा ज्यादा मिले तो कौन सी सेना एनकाउंटर करना चाहेगी? और अगर एनकाउंटर किया तो प्रूफ रखे, यानि की एनकाउंटर बाद में पहले कैमरा आन करके रिकार्डिंग करे जबकि एनकाउंटर तो तुरन्त का लिया गया एक्शन होता है )
2010 के इस एक्ट से आंतकवादी बहुत सेफ हो गए है और सबको पता है कि ये लोग बच्चों को 500 रुपया देते है पत्थर मारने का…
आंतकवादियों के बच्चों की मुफ़्त पढाई और उसकी अगर 3/4 बीबियाँ है तो तीनो को पेंशन दिया जाता है और ये मन मोहन सिंह की सरकार का किया धरा है जो सेना के साथ आज की सरकार भी भुगत रही है.
ये कांग्रेस के खोदे हुए गड्ढे है जिसका भुगतान हमारी सेना को करना पड़ रहा है…. 
एक तो 370, उस पर मामला यू एन ओ में , ऊपर से सदभावना के नाम पर आंतकवादियो की सुरक्षा …
मोनी बाबा या सोनिया या और कांग्रेसी क्या सोच रखते थे ये सोच लो आप लोग ..
आज की मौजूदा सरकार अगर सद्भावना_एक्ट खत्म करें तो किस बिना पर? अगर एक्ट खत्म किया तो यही लोग चिल्लाएगे कि कश्मीरी अल्पसँख्यको 
पर जुल्म हो रहा है चाहे भले ही वहां के हिन्दुओ के साथ सेना के साथ सौतेला रवैया अपनाया जाए पर अल्पसंख्यको के नाम पर आतंकवादियो को खरोंच तक न आना चाहिए…
छोटे छोटे बच्चे तक पत्थरो का इस्तेमाल करते हैं जो जग जाहिर है और औरते फौज के सामने खुद अपने कपड़े फाड़कर इल्जाम लगाने से भी नही चूकती हैं ये बात उसी को पता है जो वहां उन परिस्थितियों से रोज 2/4 होता हो …
गोली का जवाब तो गोली दे सकते है मगर आँतकवादी मारने की कार्यवाई करने पर अदालत से बचने के लिए और अपनी सेफ्टी की खातिर फौज वीडियो बनाती है…..
आंतकवादियो के परिजनों को पेंशन मिलती है जो की एमजीआर पेंशन के नाम से नहीं सदभावना_पुनर्वास_सहायता के नाम से है और ये राशि 7500
 होती है ….
अब नाम भी इस तरह का दे दिया है की लोग उसके खिलाफ बोल भी न पाएं और आतंकवादियों को इसी तरह फलित किया जाए जिससे कश्मीर में सेना का मनोबल न बढ़े और हिंदूवादी सोच भी पनपने न पाए
अब आप बताओ की ऐसे में किसको दोष दिया जाय या आप अगर मोदी की जगह होते तो क्या कर पाते ?
इन सबको सुधारने में वक्त लगेगा और तब तक सुधार नही हो सकता जब तक कि लोगो का माइंड सेट न हो जाता ।
वैसे भी एक मोदी को रोकने के लिए सब चोर डाकू एक जो जाते हैं और हम जनता आंख मूदकर उनपर विश्वास कर लेते हैं।

From: Pramod Agrawal < >

चमार एवं खटिक जाति का गौरवशाली इतिहास..

सिकन्दर लोदी (१४८९-१५१७) के शासनकाल से पहले पूरे भारतीय इतिहास में ‘चमार’ नाम की किसी जाति का उल्लेख नहीं मिलता। आज जिन्हें हम ‘चमार’ जाति से संबोधित करते हैं और जिनके साथ छूआछूत का व्यवहार करते हैं, दरअसल वह वीर चंवरवंश के क्षत्रिय हैं। जिन्हें सिकन्दर लोदी ने चमार घोषित करके अपमानित करने की चेष्टा की।
भारत के सबसे विश्वसनीय इतिहास लेखकों में से एक विद्वान कर्नल टाड को माना जाता है जिन्होनें अपनी पुस्तक ‘द हिस्ट्री आफ राजस्थान’ में चंवरवंश के बारे में विस्तार से लिखा है।
प्रख्यात लेखक डॅा विजय सोनकर शास्त्री ने भी गहन शोध के बाद इनके स्वर्णिम अतीत को विस्तार से बताने वाली पुस्तक “हिन्दू चर्ममारी जाति: एक स्वर्णिम गौरवशाली राजवंशीय इतिहास” लिखी। महाभारत के अनुशासन पर्व में भी इस राजवंश का उल्लेख है।
डॉ शास्त्री के अनुसार प्राचीनकाल में न तो चमार कोई शब्द था और न ही इस नाम की कोई जाति ही थी।
‘अर्वनाइजेशन’ की लेखिका डॉ हमीदा खातून लिखती हैं,
मध्यकालीन इस्लामी शासन से पूर्व भारत में चर्म एवं सफाई कर्म के लिए किसी विशेष जाति का एक भी उल्लेख नहीं मिलता है। हिंदू चमड़े को निषिद्ध व हेय समझते थे। लेकिन भारत में मुस्लिम शासकों के आने के बाद इसके उत्पादन के भारी प्रयास किए गये थे।
डा विजय सोनकर शास्त्री के अनुसार तुर्क आक्रमणकारियों के काल में चंवर राजवंश का शासन भारत के पश्चिमी भाग में था और इसके प्रतापी राजा चंवरसेन थे। इस क्षत्रिय वंश के राज परिवार का वैवाहिक संबंध बाप्पा रावल वंश के साथ था। राणा सांगा व उनकी पत्नी झाली रानी ने चंवरवंश से संबंध रखने वाले संत रैदासजी को अपना गुरु बनाकर उनको मेवाड़ के राजगुरु की उपाधि दी थी और उनसे चित्तौड़ के किले में रहने की प्रार्थना की थी।
संत रविदास चित्तौड़ किले में कई महीने रहे थे। उनके महान व्यक्तित्व एवं उपदेशों से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में लोगों ने उन्हें गुरू माना और उनके अनुयायी बने। उसी का परिणाम है आज भी विशेषकर पश्चिम भारत में बड़ी संख्या में रविदासी हैं। राजस्थान में चमार जाति का बर्ताव आज भी लगभग राजपूतों जैसा ही है। औरतें लम्बा घूंघट रखती हैं आदमी ज़्यादातर मूंछे और पगड़ी रखते हैं।
संत रविदास की प्रसिद्धी इतनी बढ़ने लगी कि इस्लामिक शासन घबड़ा गया सिकन्दर लोदी ने मुल्ला सदना फकीर को संत रविदास को मुसलमान बनाने के लिए भेजा वह जानता था की यदि रविदास इस्लाम स्वीकार लेते हैं तो भारत में बहुत बड़ी संख्या में इस्लाम मतावलंबी हो जायेगे लेकिन उसकी सोच धरी की धरी रह गयी स्वयं मुल्ला सदना फकीर शास्त्रार्थ में पराजित हो कोई उत्तर न दे सका और उनकी भक्ति से प्रभावित होकर अपना नाम रामदास रखकर उनका भक्त वैष्णव (हिन्दू) हो गया। दोनों संत मिलकर हिन्दू धर्म के प्रचार में लग गए जिसके फलस्वरूप सिकंदर लोदी आगबबूला हो उठा एवं उसने संत रैदास को कैद कर लिया और इनके अनुयायियों को चमार यानी अछूत चंडाल घोषित कर दिया। उनसे कारावास में खाल खिचवाने, खाल-चमड़ा पीटने, जुती बनाने इत्यादि काम जबरदस्ती कराया गया उन्हें मुसलमान बनाने के लिए बहुत शारीरिक कष्ट दिए। लेकिन उन्होंने कहा —–
”वेद धर्म सबसे बड़ा, अनुपम सच्चा ज्ञान,
फिर मै क्यों छोडू इसे, पढ़ लू झूठ कुरान.
वेद धर्म छोडू नहीं, कोसिस करो हज़ार,
तिल-तिल काटो चाहि, गोदो अंग कटार” (रैदास रामायण)
संत रैदास पर हो रहे अत्याचारों के प्रतिउत्तर में चंवर वंश के क्षत्रियों ने दिल्ली को घेर लिया। इससे भयभीत हो सिकन्दर लोदी को संत रैदास को छोड़ना पड़ा था।
संत रैदास का यह दोहा देखिए:
बादशाह ने वचन उचारा । मत प्यारा इसलाम हमारा ।।
खंडन करै उसे रविदासा । उसे करौ प्राण कौ नाशा ।।
जब तक राम नाम रट लावे । दाना पानी यह नहींपावे ।।
जब इसलाम धर्म स्वीकारे । मुख से कलमा आपा उचारै ।।
पढे नमाज जभी चितलाई । दाना पानी तब यह पाई ।
समस्या तो यह है कि आपने और हमने संत रविदास के दोहों को ही नहीं पढ़ा, जिसमें उस समय के समाज का चित्रण है जो बादशाह सिकंदर लोदी के अत्याचार, इस्लाम में जबरदस्ती धर्मांतरण और इसका विरोध करने वाले हिंदू ब्राहमणों व क्षत्रियों को निम्न कर्म में धकेलने की ओर संकेत करता है।
चंवरवंश के वीर क्षत्रिय जिन्हें सिकंदर लोदी ने ‘चमार’ बनाया और हमारे-आपके हिंदू पुरखों ने उन्हें अछूत बना कर इस्लामी बर्बरता का हाथ मजबूत किया।
इस समाज ने पददलित और अपमानित होना स्वीकार किया, लेकिन विधर्मी होना स्वीकार नहीं किया आज भी यह समाज हिन्दू धर्म का आधार बनकर खड़ा है।
 
अब आइये जानते हैं खटिक जाति के बारे में :-
खटिक जाति मूल रूप से वो ब्राहमण जाति है, जिनका काम आदि काल में याज्ञिक पशु बलि देना होता था। आदि काल में यज्ञ में बकरे की बलि दी जाती थी। संस्कृत में इनके लिए शब्द है, ‘खटिटक’।
मध्यकाल में जब क्रूर इस्लामी अक्रांताओं ने हिंदू मंदिरों पर हमला किया तो सबसे पहले खटिक जाति के ब्राहमणों ने ही उनका प्रतिकार किया। राजा व उनकी सेना तो बाद में आती थी। मंदिर परिसर में रहने वाले खटिक ही सर्वप्रथम उनका सामना करते थे। तैमूरलंग को दीपालपुर व अजोधन में खटिक योद्धाओं ने ही रोका था और सिकंदर को भारत में प्रवेश से रोकने वाली सेना में भी सबसे अधिक खटिक जाति के ही योद्धा थे। तैमूर खटिकों के प्रतिरोध से इतना भयाक्रांत हुआ कि उसने सोते हुए हजारों खटिक सैनिकों की हत्या करवा दी और एक लाख सैनिकों के सिर का ढेर लगवाकर उस पर रमजान की तेरहवीं तारीख पर नमाज अदा की। (पढ़िये मेरे पिछले पोस्ट “भारत में इस्लामी आक्रमण एवं धर्मान्तरण का खूनी इतिहास” ४ भागों में)
मध्यकालीन बर्बर दिल्ली सल्तनत में गुलाम, तुर्क, लोदी
वंश और मुगल शासनकाल में जब अत्याचारों की मारी हिंदू जाति मौत या इस्लाम का चुनाव कर रही थी तो खटिक जाति ने अपने धर्म की रक्षा और बहू बेटियों को मुगलों की गंदी नजर से बचाने के लिए अपने घर के आसपास सूअर बांधना शुरू किया।
इस्लाम में सूअर को हराम माना गया है। मुगल तो इसे देखना भी हराम समझते थे। और खटिकों ने मुस्लिम शासकों से बचाव के लिए सूअर पालन शुरू कर दिया। उसे उन्होंने हिंदू के देवता विष्णु के वराह (सूअर) अवतार के रूप में लिया। मुस्लिमों की गो हत्या के जवाब में खटिकों ने सूअर का मांस बेचना शुरू कर दिया और धीरे धीरे यह स्थिति आई कि वह अपने ही हिंदू समाज में पददलित होते चले गए। कल के शूरवीर ब्राहण आज अछूत और दलित श्रेणी में हैं।
1857 की लडाई में मेरठ व उसके आसपास अंग्रेजों के पूरे के पूरे परिवारों को मौत के घाट उतारने वालों में खटिक समाज सबसे आगे था। इससे गुस्साए अंग्रेजों ने 1891 में पूरी खटिक जाति को ही वांटेड और अपराधी जाति घोषित कर दिया।
जब आप मेरठ से लेकर कानपुर तक 1857 के विद्रोह की दासतान पढेंगे तो रोंगटे खडे हो जाए्ंगे। जैसे को तैसा पर चलते हुए खटिक जाति ने न केवल अंग्रेज अधिकारियों, बल्कि उनकी पत्नी बच्चों को इस निर्दयता से मारा कि अंग्रेज थर्रा उठे। क्रांति को कुचलने के बाद अंग्रेजों ने खटिकों के गांव के गांव को सामूहिक रूप से फांसी दे दिया गया और बाद में उन्हें अपराधि जाति घोषित कर समाज के एक कोने में ढकेल दिया।
आजादी से पूर्व जब मोहम्मद अली जिन्ना ने डायरेक्ट
एक्शन की घोषणा की थी तो मुस्लिमों ने कोलकाता शहर
में हिंदुओं का नरसंहार शुरू किया, लेकिन एक दो दिन में ही पासा पलट गया और खटिक जाति ने मुस्लिमों का इतना भयंकर नरसंहार किया कि बंगाल के मुस्लिम लीग के मंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा कि हमसे भूल हो गई। बाद में इसी का बदला मुसलमानों ने बंग्लादेश में स्थित नोआखाली में लिया।
आज हम आप खटिकों को अछूत मानते हैं, क्योंकि हमें
उनका सही इतिहास नहीं बताया गया है, उसे दबा दिया
गया है।
आप यह जान लीजिए कि दलित शब्द का सबसे पहले प्रयोग अंग्रेजों ने 1931 की जनगणना में ‘डिप्रेस्ड क्लास’ के रूप में किया था। उसे ही बाबा साहब अंबेडकर ने अछूत के स्थान पर दलित शब्द में तब्दील कर दिया। इससे पूर्व पूरे भारतीय इतिहास व साहित्य में ‘दलित’ शब्द का उल्लेख कहीं नहीं मिलता है।
हमने और आपने मुस्लिमों के डर से अपना धर्म नहीं छोड़ने वाले, हिंसा और सूअर पालन के जरिए इस्लामी आक्रांताओं का कठोर प्रतिकार करने वाले एक शूरवीर ब्राहमण खटिक जाति को आज दलित वर्ग में रखकर अछूत की तरह व्यवहार किया है और आज भी कर रहे हैं।
भारत में 1000 ईस्वी में केवल 1 फीसदी अछूत जाति थी, लेकिन मुगल वंश की समाप्ति होते-होते इनकी संख्या 14 फीसदी हो गई। आखिर कैसे..?
सबसे अधिक इन अनुसूचित जातियों के लोग आज के उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल, मध्य भारत में है, जहां मुगलों के शासन का सीधा हस्तक्षेप था और जहां सबसे अधिक धर्मांतरण हुआ। आज सबसे अधिक मुस्लिम आबादी भी इन्हीं प्रदेशों में है, जो धर्मांतरित हो गये थे।
डॉ सुब्रहमनियन स्वामी लिखते हैं, ” अनुसूचित जाति
उन्हीं बहादुर ब्राह्मण व क्षत्रियों के वंशज है, जिन्होंने
जाति से बाहर होना स्वीकार किया, लेकिन मुगलों के
जबरन धर्म परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया। आज के हिंदू समाज को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए, उन्हें कोटिश: प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि उन लोगों ने हिंदू के भगवा ध्वज को कभी झुकने नहीं दिया, भले ही स्वयं अपमान व दमन झेला।”
प्रोफेसर शेरिंग ने भी अपनी पुस्तक ‘
हिंदू कास्ट एंड टाईव्स’ में स्पष्ट रूप से लिखा है कि ”
भारत के निम्न जाति के लोग कोई और नहीं, बल्कि
ब्राहमण और क्षत्रिय ही हैं।”
स्टेनले राइस ने अपनी पुस्तक “हिन्दू कस्टम्स एण्ड देयर ओरिजिन्स” में यह भी लिखा है कि अछूत मानी जाने वाली जातियों में प्राय: वे बहादुर जातियां भी हैं, जो मुगलों से हारीं तथा उन्हें अपमानित करने के लिए मुसलमानों ने अपने मनमाने काम करवाए थे।
यदि आज हम बचे हुए हैं तो अपने इन्हीं अनुसूचित जाति के भाईयों के कारण जिन्होंने नीच कर्म करना तो स्वीकार किया, लेकिन इस्लाम को नहीं अपनाया।
आज भारत में 23 करोड़ मुसलमान हैं और लगभग 35 करोड़ अनुसूचित जातियों के लोग हैं। जरा सोचिये इन लोगों ने भी मुगल अत्याचारों के आगे हार मान ली होती और मुसलमान बन गये होते तो आज भारत में मुस्लिम जनसंख्या 50 करोड़ के पार होती और आज भारत एक मुस्लिम राष्ट्र बन चुका होता। यहाँ भी जेहाद का बोलबाला होता और ईराक, सीरिया, सोमालिया, पाकिस्तान और अफगानिस्तान आदि देशों की तरह बम-धमाके, मार-काट और खून-खराबे का माहौल होता। हम हिन्दू या तो मार डाले जाते या फिर धर्मान्तरित कर दिये जाते या फिर हमें काफिर के रूप में अत्यंत ही गलीज जिन्दगी मिलती।
धन्य हैं हमारे ये भाई जिन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी अत्याचार
और अपमान सहकर भी हिन्दुत्व का गौरव बचाये रखा और स्वयं अपमानित और गरीब रहकर भी हर प्रकार से भारतवासियों की सेवा की।
हमारे अनुसूचित जाति के भाइयों को पूरे देश का सलाम

From: Pramod Agrawal < >

इस्लाम की_सच्चाई जाने तो शायद ही कोई हिँदू उस मुल्ले की कब्र पर माथा पटकने जाए .

 

अगर हर हिँदू माँ-बाप अपने बच्चों को बताए कि अजमेर दरगाह वाले ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती ने किस तरह इस्लाम कबूल ना करने पर पृथ्वीराज चौहान की पत्नी संयोगिता को मुस्लिम सैनिकों के बीच बलात्कार करने के लिए निर्वस्त्र करके फेँक दिया था ।

 

और फिर किस तरह पृथ्वीराज चौहान की वीर पुत्रियों ने आत्मघाती बनकर मोइनुद्दीन चिश्ती को 72 हूरों के पास भेजा था । तो शायद ही कोई हिँदू उस मुल्ले की कब्र पर माथा पटकने जाए .

 

“अजमेर के ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती को ९० लाख हिंदुओं को इस्लाम में लाने का गौरव प्राप्त है ।

मोइनुद्दीन चिश्ती ने ही मोहम्मद गोरी को भारत लूटने के लिए उकसाया और आमंत्रित किया था…

 

(सन्दर्भ – उर्दू अखबार “पाक एक्सप्रेस, न्यूयार्क १४ मई २०१२).

 

अधिकांश मुर्दा हिन्दू तो शेयर भी नहीं करेंगे . धिक्कार है ऐसे हिन्दुओ पर !!

 

 

 

From: Cdr Alok Mohan < >

Let us make all writers of 1947 partition make accountable

During 1947-1948, a tragedy had cast its gloom on this subcontinent. Hindu families were torn asunder, lives were shattered. the situation in Punjab and Bengal was heart wrenching.

 

To some people, freedom had been won during 1947, but millions of Hindus had cried as the short-sighted Gandhi and Nehru had caused a biggest human tragedy in this region.

The flurry of emotions consequent to uprooting and loosing nears and dears have always flowed among Punjabi Hindus till date.

 

Mohammad Ali Jinnah had wanted partition of India based on religion. Else why had he ordered to cut water and electricity supply from Hindu majority areas of Lahore just prior to 1947 partition. He became secular consequent to hearing reports of back lash from Hindu and Sikh majority areas He changed his colors and started speaking language of secularism i. e. the language of Mahatma Gandhi.

 

Those were the days when massive violence against Hindus had led to total ethnic cleansing of west Pakistan, and Gandhi was far-far away from Delhi, both physically and psychologically.

Let us make all writers of 1947 partition make accountable one by one.

 

Role of Congress:

 

Congress had committed several mistakes by granting concessions after concessions to Muslims i.e. it had adopted   a policy of Muslim appeasement. The Lucknow pact, separate electorates, the communal award all these were accepted by congress one by one. These moves of Congress strengthened the hands of Jinnah.

 

Another gross failure of Congress was its failure to project any Muslim congress leader as a counter of Jinnah thereby giving him an opportunity to become a self-proclaimed mass leader of Muslims. In other words, it was Congress that created Jinnah. By 1940s Jinnah and his coterie had become too strong, and congress leadship was responsible for this.

 

Congress had no choice to accept the partition as the party was keen to make Nehru prime minister of India by hook or by crook.

 

Role of Jinnah/ Muslim League:

 

As a former congress member, he had played a great role in shaping the Lucknow pact of 1916. European in life style and aristocratic in upbringing, Jinnah resigned from congress in 1920. When congress refused to incorporate Muslim League members in the governments in provinces after 1937 elections, he realized that he will never be able to enjoy political power in congress dominated united India where a Hindu majority will dominate. It was more about the political ambitions of Jinnah and those of his ilk which guided them to ask for a separate Pakistan. Muslim League afterwards kept on moving from one demand to the next one. British in a bid to divide the nation caused by driving a wedge between Hindu and Muslims and congress in desperate efforts to keep India united, kept on conceding those demands.

 

First came separate electorates and there after communal award then 14-point program to safeguard Muslim interests. By 1940 all legitimate and important demands of Muslim league had been fulfilled. From here on only a separate Muslim nation could have been next logical step for Jinnah and Muslim league.

 

In 1940, Muslim league embraced ‘two nation theory’ and passed Pakistan resolution in its Lahore session. By this time, Jinnah and Muslim league had decided that a separate Pakistan is their ultimate goal.

 

The knee jerk resistance from Nehru and Gandhi only hardened their resolve.

 

In their quest to achieve Pakistan, the evil genius of Jinnah became their most potent weapon as Muslim league leadership barring Jinnah was not as gifted and capable as that of congress. In the end, Muslim league resorted to outright blackmail by resorting to cold blooded massacres/ massive violence and rioting.

 

Role of Britishers:

 

Rattled by Hindu Muslim unity in the mutiny of 1857, the British found it detrimental for the continuation of Raj. A constituency of loyalist and careerist Muslim leaders was raised to counter the congress claim of being the representative of all Indians. They continued to raise the bogey of ‘interest of minorities’ to spread a notion that their security will be imperiled if the British left India. The covert motive was to weaken the Indian nationalism. Their policies such as partition of Bengal (1905), Minto-Morley reforms (1909) which provided for separate electorates for Muslims, inviting various communal and divisive organizations in the round table conferences, including the Muslim league, as a counter to congress, the communal award of 1932 were only instruments of this motive. Since 1940, in almost all arrangements of transfer of power (Shimla conference, Cripps mission, cabinet mission plan & Mountbatten plan, by acknowledging that Muslim league was the sole representative of Indian Muslims they eliminated any possibility of a united India.

 

The seed of communal division had been sown by the Britishers long ago. The Muslim League and Jinnah provided a constituency of politicians who were to benefit by the partition.

 

It was neither the congress nor Muslim league but the innocent Hindus of Muslim dominated areas of West Punjab who became the ultimate victim due British, due communal politics of Jinnah, and due to ultimate stupidities of Gandhi and Nehru.

 

 

From: Mohan Natarajan < >

Here’s why Muslims should give up claim on Ram temple land

By Sudhir Bisht

 

April 6, 2017

 

Give up claim on Ram Temple land

Give up claim on Ram Temple land

Give up the claims on Ram temple land.

 

As someone who was born in Delhi and lived in the Central government’s housing colonies in New Delhi area, I had no interaction at all with any member of Muslim community in my formative years.

 

The imagery of a Muslim man in my mind was that of Mohammad Rafi, the playback singer with a divine voice, Naushad Saab, the musician who was interviewed multiple times on TV by Tabassum in her famous Doordarshan program called ‘Phool Khiley Hain Gulshan Gulshan’, Nawab Mansur Ali Khan Pataudi, the Captain of the Indian cricket team, and of course the crème de la crème among the Indian hockey players- Aslam Sher Khan, Zafar Iqbal and Mohammad Shahid. And then there was this fabulous star of Bollywood who was fading fast and yet he commanded respect from one and all, the thespian Dilip Kumar or Yusuf Khan.

I was asked by an elderly Muslim shopkeeper to close down my free coffee stall. He gently told me that the mood of the people was not upbeat and free coffee distribution would appear offensive to them as India has won the match.

 

Since there was no Muslim boy or girl who was my classmate in school or in college and even when I went to pursue my Master’s degree, I had not shaken hands with a Muslim till I was about 21 years of age.

 

My first interaction with Muslim community was in 1985 in Rampur in central Uttar Pradesh. I was a Trainee Sales Promoter at Foods Specialties Limited (Now Nestle India) and was promoting coffee drinking habit among Indians living in smaller towns.

 

I had set up a small stall outside a Kirana store and was demonstrating to people the easy way of preparing a cup of hot coffee with condensed milk called ‘Milkmaid’. There was this usual hubbub in the market, perhaps the market was called Shadab bazaar, and there were many men and some women who had gathered around my tiny kiosk to learn the art of making instant coffee.

 

By coincidence, an India-Pakistan One day international match too was taking place on the same day. I think it was being played somewhere in Middle-east and Pakistan had bundled out India at a very paltry score. Pakistan’s number one bowler Imran Khan had picked up six wickets and Pakistan was expected to win the match with much ease. There was a sense of excitement in the air. The shopkeepers, nearly all of them Muslims and those loitering around seemed happy to hear the commentary on All India radio.

However, something gloriously unexpected happened in the cricket field and Pakistan batsmen squandered their chance of an easy win and lost to India rather dramatically. And when Kapil Dev clean bowled the last batsman of the Pakistan team, a pall of gloom descended at the Rampur bazaar.

 

I was asked by an elderly Muslim shopkeeper to close down my free coffee stall. He gently told me that the mood of the people was not upbeat and free coffee distribution would appear offensive to them.

 

I still remember feeling terrorized even though no one tried to intimidate me in any manner but the feeling of despondency among the locals of Rampur was very much evident and that made me very scared. This was the question that kept rankling in my mind for Was I in my own country or in an enemy territory? many days after the incidence. I was disappointed with the Muslims of Rampur in the year 1985.

 

Muslim leaders in various parts of Hindustan have made light of the claim that Ram indeed was born at a place where we think he was born. Some of them have even questioned the existence of Ram.

 

I had all along thought that they were my countrymen who believed in Allah instead of believing in Ram like I do. This view was reinforced when I made friends with Khan, my colleague in the PSU oil company at Allahabad. What I also learnt was that his father was a science teacher in Bhagalpur and my friend had four more siblings. Since I and Khan shared a room, I learnt that he, a first-class Engineering graduate, had fixed notions about society and religious practices. He believed that children were God’s gift to mankind and family planning was a funny, phony notion. This coming from a young graduate engineer whose father was a teacher seemed very strange to me. I thought that Khan was a fine, educated young man but with a very conservative mindset.

 

A year later, I got married and I invited Khan and my other colleagues for a meal at my new place. He accepted the offer with enthusiasm. Khan, however, refused to eat the goat meat or chicken that was cooked by my wife. Upon my prodding, Khan said that unless he was convinced that the poultry and the meat were cut in ‘Halal’ way, he would not eat them. He said it in a matter-of-fact manner, without any fuss or inhibition. This reinforced the image of Muslims being very orthodox in my mind, in my subconscious mind at least.

 

And then in 1993, I was posted in Jammu and Kashmir and in my three-year stint in J&K, I was unable to visit Kashmir, a part of my own country due to the terrorism of fundamentalist Muslims who had overtaken the valley. It was clear to me that even if these terrorists were limited to a few hundred, they had the support of the majority of the Muslims residing in the valley. Nearly all the Hindus have driven away from the valley.

 

I left J&K in 1995 and by then I was convinced that wherever Hindus were in minority and Muslims were in majority, Hindus had to live in a state of fear. Even outside India, there was a significant population of Hindus in Pakistan and Bangladesh but by and by the Hindus were reduced to a minuscule minority in Bangladesh and in Pakistan. On the other hand, the percentage of Muslims living in India hasn’t dwindled at all. And I thank God for that.

But what pains me that Hindus are actually living in a state of unease in many a district in West Bengal, Assam and in Kerala wherever Muslims are an overwhelming majority.

I look back in time and I find that a Hindu Prime Minister’s capitulation to the vote bank politics ensured that an old Muslim woman Shah Bano was denied a paltry alimony that she was entitled to receive from her husband, as the concept of alimony was not approved by the tenets of Islam. This after the Supreme Court of India had ruled that the old woman was well within her rights to claim and receive alimony from her ex-husband.

 

I travel back in recent time to find that our civil society torchbearers held rallies to save Afzal Guru, the enemy of the nation, from the hangman’s noose. They held demonstrations and freedom marches in favor of Umar Khalid, the man who raised slogans against our country.

I travel a few weeks back in time and find that Mayawati, a former CM of Uttar Pradesh was boasting that she would field at least one hundred Muslim candidates for the assembly elections, just to prove that she cared for their welfare. And that the poster boys of Congress and Samajwadi party were openly canvassing for the votes of Muslims.

 

As a Hindu and as an Indian, I belonging to the majority community felt that I was being ignored in the process. As if I, a part of the population that comprises 80% of India, didn’t exist.

I also find that the TV commentators keep deriding Yogi Aditya Nath, the newly elected Chief Minister of Uttar Pradesh. He is referred to as a ‘Hindu monk’ and a ‘Hindu sanyasi’ by the likes of Tavleen Singh. His choice of clothes and the color of his attire are ridiculed.

 

In the past, I had never advocated that a Ram temple should be built at the site where the mosque was razed to the ground in 2002. I had even sympathized with my Muslim brothers and sisters who felt aggrieved after the disputed structure was felled by overzealous Hindus. But a lot has changed since 2002.

 

The 9/11 happened in the United States and 26/11 happened in Mumbai. The Muslim terrorists have caused havoc in many places in Europe and in Turkey and in Nigeria and even in their own countries like Pakistan and many more.

 

Now my heart has started telling my mind that a temple had stood at that very site in Ayodhya and it was razed to the ground and a mosque built upon the foundation of the temple. So, the Hindus have the right to build a grand temple at the site where a mosque stood till 2002.

My heart yearns for a Ram temple in Ayodhya. I have joined the chorus that “If a Ram temple will not come up in Ayodhya, will it then be built in Azerbaijan?”

 

I am gripped with Islam-o-phobia and I appeal to my Muslim countrymen to help me get rid of it. I ask them to let me have (We the Hindus do not need permission from any anti-Vedic to build Rama temple, or do anything else in our own homeland Hindustan. – Skanda987) my Ram temple. This will assuage my broken heart somewhat.

 

The wounds of Kashmir will not heal until Hindus go back to their homes in the valley but the effect of assault that my mind suffered when the Lordships sat up at midnight to see if Yakub Menon could be saved, would abate.

 

Muslim leaders in various parts of Hindustan have made light of the claim that Ram indeed was born at a place where we think he was born. Some of them have even questioned the existence of Ram. However, in retaliation, no Hindu has ever questioned if Allah ever existed. This is because we have a deep sense of respect for Allah. (No, the characteristics and qualities and desires of Allah as provided in Koran, Hadith and Sura are not like as given in the Vedic scriptures of Supreme God. We just respect the freedom of thought—that we don’t mind if Muslims think that way about Allah or haven; but as long as they do not impose their will upon us. While Islam does not give freedom to address god with any other name than Allah, we have many names of god. – Skanda987) He is ours as well. In fact, he is as much ours as He is of Muslims.

 

It is the time that a majority of Muslims come out of the stranglehold of their clerics and start a Give It Up hashtag on twitter for giving up the land in Ayodhya.

 

Let this be the end of a controversy and the beginning of a new era.

Author and columnist Saba Naqvi agrees with me. That’s a good beginning.

 

Note:

 

  1. The views expressed here are those of the author and do not necessarily represent or reflect the views of P Gurus.

 

About Sudhir Bisht:

Sudhir Bisht, is an Independent columnist, and is an author and a prolific independent columnist. His articles are often among the ‘most emailed’ and ‘most commented upon’ articles.