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Religions and Religious Freedom V1

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Secularism of Congress

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From: Maj Gen Ashok Coomar < >

Many broken Jain Images found from a field in last few days @ Ishwaripura Village, Near Asai Village, District – Itawa, UP.

इटावा। धरती से निकली हजारों साल पुरानीऔर दुर्लभ मूर्तियां अब चर्चा का विषय बन गयी है। हालांकि ये सभी मूर्तियां खंडित हो चुकी हैं। क्योंकि ये मूर्तियां इकदिल थाना क्षेत्र के ईश्वरीपुरा गांव में एक खेत की जुताई के दौरान मिली है। एक साथ हजारों मूर्तियां निकलने से प्रशासन से लेकर पुरातत्व विभाग तक हैरान है। अब यह पता लगाने की कोशिश शुरू हो गयी है कि आखिर इन मूर्तियों का इतिहास क्या है।

उपजिलाधिकारी महेंद्र सिंह ने बताया कि उनको भी खेत से इतनी बड़ी तादात में खंडित मूर्तियों के निकलने की खबर मिली है। इसको लेकर जिलाधिकारी से चर्चा करके पुरातत्व विभाग को अवगत कराया जा रहा है। ताकि इस बावत कोई अध्ययन किया जा सके। कि यहां पर इस तरह की मूर्तियां कैसे निकल रही हैं। उन्होने बताया कि इसका अध्ययन इतिहास के छात्रों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण रहेगा। फिलहाल एसडीएम चकरनगर को इन मूर्तियों को संकलित करने की जिम्मेदारी दी गयी है।

दरअसल ईश्वरीपुरा गांव में खेत के मालिक वृजेश कुमार खेत में ट्रैक्टर से जुताई कर रहे थे। तभी उन्हें कुछ मूर्तियां खेत में दिखी। जिसके बाद आस पास के गांव वाले आना शुरू कर दिये। गांव वालों की मदद से खेत की खुदाई की गयी तो एक के बाद एक जैन धर्म की 1200 साल पुरानी खंडित मुर्तियां निकलती गयी। जिसके बाद गांव वालों ने जैन धर्म के लोगों को बुलाया। उन्होने बताया की ये मूर्तियां सैंकड़ों साल पुरानी हैं और इन्हें किसी राजा ने तोड़कर खेत में छुपा दिया था। जो आज ये मूर्तियां खुदाई में मिली हैं।

अनुमान है कि खेत में अभी और मूर्तियां हो सकती हैं। यह तो और खुदाई से ही पता चल सकेगा। देखने में मूर्तियां सैकड़ों वर्ष पुरानी हैं जो सफेद पत्थर, काले पत्थर व लाल पत्थर से निर्मित हैं। देखने वालों का कहना है कि जैन धर्म के अलावा भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं भी हैं। कुछ मूर्तियों पर लिखावट भी है, जिससे अनुमान है कि मूर्तियां हजारों वर्ष पुरानी हैं। ग्रामीणों ने बताया कि लगभग दो साल पहले उसी खेत दो मूर्तियां निकली थी। जिन्हें पेड़ के पास ही रख दिया गया था। उसके बाद दोबारा इतनी बड़ी संख्या में मूर्तियां मिली हैं। चर्चा है कि खजाना होने के संदेह में कई दिन पूर्व रात में किसी तांत्रिक ने उक्त स्थान पर खुदाई की थी। क्योंकि लोगों ने पूजा का सामान नारियल आदि पड़ा देखा था।

गौरतलब है कि इसी गांव के नजदीक है आसई गांव। जहां पर एक दशक से खंडित मूर्तियां निकलती रही हैं। सबसे खास बात तो यह है इस गांव के बासिंदे इन खंडित मूर्तियों की पूजा करके अपने आप को घन्य पाते हैं। यमुना नदी के किनारे बसा गांव आसई देश दुनिया का एक ऐसा गांव माना जा सकता है, जहां के वाशिंदे खंडित मूर्तियों की पूजा में विश्वास करते हैं। इस गांव के लोग किसी मंदिर में पूजा अर्चना नहीं करते हैं बल्कि हर घर में उनके आराध्य की मूर्तियां पाई जातीं हैं। घरों में प्रतिस्थापित यह मूर्तियां साधारण नहीं हैं। अपितु दसवीं से ग्यारहवीं सदी के मध्य की बताई जातीं हैं। दुर्लभ पत्थरों से बनी यह मूर्तियां देश के पुराने इतिहास एवं सभ्यता की पहचान कराती हैं। हिंदू धर्म की पौराणिक कथाओं में काशी के बाद धार्मिक आस्था का केंद्र माना जाने वाला एवं जैन दर्शन में काशी से भी श्रेष्ठ आसई क्षेत्र पूर्व की दस्यु गतिविधियों के बाद से श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पा रहा है।

जैन दर्शन के मुताबिक मुख्यालय से करीब पंद्रह किमी दूर स्थित आसई क्षेत्र में जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी ने दीक्षा ग्रहण करने के बाद इसी स्थान पर बर्षात का चातुर्मास व्यतीत किया था। तभी से यह स्थान जैन धर्मावलंबियों के लिए श्रद्धा का केंद्र बन गया था। इसके अलावा तकरीबन दसवीं शताब्दी में राजा जयचंद्र ने आसई को अपने कन्नौज राज्य की उपनगरी के रूप में विकसित किया था और जैन दर्शन से प्रभावित राजा जयचंद्र ने अपने शासन के दौरान जैन धर्म के तमाम तीर्थंकरों की प्रतिमाओं को दुर्लभ बलुआ पत्थर से निर्मित कराई।

औरंगजेब ने जब धार्मिक स्थलों पर हमले किए तो यह क्षेत्र भी उसके हमलों से अछूता नहीं रहा। तमाम धर्मों से जुड़ी दुर्लभ मूर्तियों को क्षतिग्रस्त कर दिया। जो समय-समय पर इन क्षेत्रों में मिलती रहीं। अफसोस यह है कि आसई क्षेत्र में मिली तकरीबन पांच सौ मूर्तियों में से महज दर्जन भर मूर्तियां ही शेष हैं। आसई गांव के प्रधान रवींद्र दीक्षित कहना है कि आदि काल से इस तरह की मूर्तियां निकल रही है और श्रद्धाभाव से लोगों ने अपने घरों मे लगा रखी है और पूजा करते है। उनका कहना है कि गांव पर कभी यमुना के बीहड़ों मे सक्रिय रहे कुख्यात डाकुओं का प्रभाव देखा जाता रहा है। तभी तो एक समय करीब करीब पूरा गांव खाली हो गया था। लेकिन जैसे जैसे पुलिस डाकुओं का खात्मा किया। गांव वाले अपनी जमीनों और घरों की ओर वापस लौट आये।

Source:
http://hindi.eenaduindia.com/ State/UttarPradesh/2016/04/ 01202848/All-were-stunned- when-the-earth-breathed-a- thousand.vpf

From: Pramod Agrawal < >

“What Is My Religion? I Feel Shame on My Self because am a Muslim.”

by Hakim Haider

https://www.gatestoneinstitute.org/8958/what-is-my-religion

◾ Mosques are a basic school where your children learn the Subject of Terrorism.

◾I ask again to Teacher (Mulla) in Mosque, “Sir, there are so many groups in Islam. One group orders to kill the other Group because he is a Non-Muslim. Why?”

He Replied: “Because he does not follow our Rules.” I am Surprised to hear it. This means one person who do not follow our (Islamic) Rules, we (Muslims) kill him.

◾I ask one more Question. “Sir, if am a Sunni or Wahhabi, (do) I kill the Person who belongs to another Sect like Shia?”

He replies, “Yes off Course.” I felt shocked and shouted, “No sir, I do not kill anybody whether he is a Muslim or Non-Muslim, or a Muslim belong to another Sect. I was just talking. He (Mullah) slapped me hardly. Next am sit on the corner of Mosque, Quietly.

◾Every group or Sect are telling, “We do this because our Prophet has ordered us to. So what is the Prophet teaching, to kill someone just because he does not follow Islam?

◾I open my eyes in Islamic Family in an Islamic Country, but in 23 years I do not know what is Islam. What is the purpose of Islam?

 

Once I ask a question to my Teacher (Mulla) in the Mosque, “What is the difference between Muslim and non-Muslim?”

 

He replied: “one who be leaves on Allah and prophet Muhammad p.b.u.h. is a Muslim, and one who does not believe on Allah and Muhammad p.b.u.h. is a non-Muslim.

 

I asked again, “So what we do? How we teach the Non-Muslim?”

He replied: “Just kill him.”

 

I asked: “Why we kill him, and when I kill him?”

He replied: “When you grow up then you Kill him.”

 

Am thinking from that day: Why this Teacher (Mullah) telling me this? On Next Day I asked again to Teacher (Mullah) in Mosque, “Sir there are so many groups in Islam. One group orders to kill the other group. Why?

 

He Replied: “Because he does not follow our Rules.”

 

I am surprised to hear this. This means one person who does not follow our rules we kill him. I ask one more question, “Sir if am a Sunni or Wahhabi, I kill the person who belongs to another sect like Shia?”

 

He replied: “Yes off course.”

 

Am shocked and reply shoutly, No Sir I do not Kill Any Body whether he is Muslim or Non-Muslim or Muslim belong to another Sect.

 

Am just talking. He (Mulla) Slapped me hardly. Next am sit on the corner of Mosque, Quietly.

 

Now so many Groups or Sects of Islam are killing one an Other and the most horrible thing is Muslim Countries support to these groups, Like Iran who is a Pure Shia Islamic State support to these groups who are fighting against the SUNNIS. And Saudia Arabia who is pure SUNNI or WAHABI State support to these groups who are fighting against the SHIA SECT. Even these Muslim Countries provide weapons and training to these groups.

 

There are more than 80 Sects in Islam now, every One trying to show he is Right and Other is Wrong. No Muslim group or Muslim country trying to keep concentration on Peace, doing welfare work for mankind. Every Muslim trying to kill an Other.

 

So I listen to killing lesson from the Mosque and watch this lesson practiced on the Ground. In every Terrorist Attack, Hidden Hand was a Muslim Hand. So I feel Shame on my Self that am belong to such a Religion who are running on just Terrorism Lesson, Nothing more. A Religion who are divided into more than 80 Groups or Sects then How somebody realize which Group or Sect is true? Every Group or Sect pray is differently.

 

And every group or Sect are telling, We do this because our Prophet order us to. So what is the Prophet teaching to kill someone for, just because he do not follow us? Muslim abusing a lot of Jew and Christian because not a follower of ALLAH and MUHAMMAD P.B.U.H. But on the Other side, these religions grow up because they all have a peace full mind, they are working on humanity. But on the Other hand, I do not see any humanity in Islam, and the few Humanity Work was done just for showment in front of world, nothing more.

 

Humanity is a only religion in the world who is the best Religion and am saying that Jews, Christians work on Humanity. So Now then What is the Credibility of mosques? What is the Credibility of Teachers (Mullas)? And which religion is true? On my view Muslim Religion is not True and Mosques or Madrasas are a root of terrorism. Am not a Jew or Christian am a Muslim and am saying all this being a Muslim and I feel Shame on My Self because am a Muslim.

 

I totally disagree with Islamic lesson, Islamic terrorist Sects, and Islamic groups. Mosques are a basic school where your children learn the Subject of Terrorism. Madrasas are a Lab where your Children practice terrorism, and the World are a place where your children do terrorism. Islam is nothing more, just simply, “One who is disagree with you, just Pick up a Gun and Shoot him.”

 

दलित समाज और ईसाई मिशनरी
डॉ विवेक आर्य
पिछले कुछ दिनों से समाचार पत्रों के माध्यम से भारत में दलित राजनीती की दिशा और दशा पर बहुत कुछ पढ़ने को मिला। रोहित वेमुला, गुजरात में ऊना की घटना, महिशासुर शहादत दिवस आदि घटनाओं को पढ़कर यह समझने का प्रयास किया कि इस खेल में कठपुतली के समान कौन नाच रहा है, कौन नचा रहा है, किसको लाभ मिल रहा है और किस की हानि हो रही हैं। विश्लेषण करने के पश्चात मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि भारत के दलित कठपुतली के समान नाच रहे है, विदेशी ताकतें विशेष रूप से ईसाई विचारक, अपने अरबों डॉलर के धन-सम्पदा, हज़ारों कार्यकर्ता, राजनीतिक शक्ति, अंतराष्ट्रीय स्तर की ताकत, दूरदृष्टि, NGO के बड़े तंत्र, विश्वविद्यालयों में बैठे शिक्षाविदों आदि के दम पर दलितों को नचा रहे हैं और इसका तात्कालिक लाभ भारत के कुछ राजनेताओं को मिल रहा है और इससे हानि हर उस देशवासी की की हो रही हैं जिसने भारत देश की पवित्र मिटटी में जन्म लिया है।
हम अपना विश्लेषण 1947 से आरम्भ करते है। अंग्रेजों द्वारा भारत छोड़ने पर अंग्रेज पादरियों ने अपना बिस्तर-बोरी समेटना आरम्भ ही कर दिया था क्योंकि उनका अनुमान था कि भारत अब एक हिन्दू देश घोषित होने वाला है। तभी भारत सरकार द्वारा घोषणा हुई कि भारत अब एक सेक्युलर देश कहलायेगा। मुरझायें हुए पादरियों के चेहरे पर ख़ुशी कि लहर दौड़ गई। क्योंकि सेक्युलर राज में उन्हें कोई रोकने वाला नहीं था। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात संसार में शक्ति का केंद्र यूरोप से हटकर अमेरिका में स्थापित हो गया। ऐसे में ईसाईयों ने भी अपने केंद्र अमेरिका में स्थापित कर लिए। उन्हीं केंद्रों में बैठकर यह विचार किया गया कि भारत में ईसाइयत का कार्य कैसे किया जाये। भारत में बसने वाले ईसाईयों में 90% ईसाई दलित समाज से धर्म परिवर्तन कर ईसाई बने थे। इसलिए भारत के दलित को ईसाई बनाने के लिए रणनीति बनाई गई। यह कार्य अनेक चरणों में आरम्भ किया गया।
1.   शोध के माध्यम से शैक्षिक प्रदुषण
ईसाई पादरियों ने सोचा कि सबसे पहले दलितों के मन से उनके इष्ट देवता विशेष रूप से श्री राम और रामायण को दूर किया जाये।  क्योंकि जब तक राम भारतियों के दिलों में जीवित रहेंगे तब तक ईसा मसीह अपना घर नहीं बना पाएंगे। इसके लिए उन्होंने सुनियोजित तरीके से शैक्षिक प्रदुषण का सहारा लिया। विदेश में अनेक विश्वविद्यालयों में शोध के नाम पर श्री राम और रामायण को दलित और नारी विरोधी सिद्ध करने का शोध आरम्भ किया गया। विदेशी विश्वविद्यालयों में उन भारतीय छात्रों को प्रवेश दिया गया जो इस कार्य में उनका साथ दे। रोमिला थापर, इरफ़ान हबीब, कांचा इलैयह आदि इसी रणनीति के पात्र हैं। कुछ उदहारण देकर हम सिद्ध करेंगे कि कैसे श्री राम जी को दलित विरोधी, नारी विरोधी, अत्याचारी आदि सिद्ध किया गया। शम्बूक वध की काल्पनिक और मिलावटी घटना को उछाला गया और श्री राम जी के शबरी भीलनी और निषाद राजा केवट से सम्बन्ध को अनदेखी जानकर करी गई। श्री राम को नारी विरोधी सिद्ध करने के लिए सीता की अग्निपरीक्षा और अहिल्या उद्धार जैसे काल्पनिक प्रसंगों को उछाला गया जबकि दासी मंथरा और महारानी कैकयी के साथ वनवास के पश्चात लौटने पर किये गए सदव्यवहार और प्रेम की अनदेखी करी गई। वीर हनुमान और जामवंत को बन्दर और भालू कहकर उनका उपहास किया गया जबकि वे दोनों महान विद्वान्, रणनीतिकार और मनुष्य थे। इन तथ्यों की अनदेखी करी गई। रावण को अपने बहन शूर्पनखा के लिए प्राण देने वाला भाई कहकर महिमामंडित किया गया श्री राम और उनके भाइयों को राजगद्दी से बढ़कर परस्पर प्रेम को वरीयता देने की अनदेखी करी गई। श्री कृष्ण जी के महान चरित्र के साथ भी इसी प्रकार से बेईमानी करी गई। उन्हें भी चरित्रहीन, कामुक आदि कहकर उपहास का पात्र बनाया गया। इस प्रकार से नकारात्मक खेल खेलकर भारतीय विशेष रूप से दलितों के मन से श्री राम की छवि को बिगाड़ा गया।
2. वेदों के सम्बन्ध में भ्रामक प्रचार
 इस चरण का आरम्भ तो बहुत पहले यूरोप में ही हो गया था। इस चरण में वेदों के प्रति भारतीयों के मन में बसी आस्था और विश्वास को भ्रान्ति में बदलकर उसके स्थान पर बाइबिल को बसाना था। इस चरण में मुख्य लक्ष्य दलितों को रखकर निर्धारित किया गया। ईसाई मिशनरी भली प्रकार से जानते है कि गोरक्षा एक ऐसा विषय है जिस से हर भारतीय एकमत है।  इस एक विषय को सम्पूर्ण भारत ने एक सूत्र में उग्र रूप से पिरोया हुआ हैं। इसलिए गोरक्षा को विशेष रूप से लक्ष्य बनाया गया। हर भारतीय गोरक्षा के लिए अपने आपको बलिदान तक करने के तैयार रहता है।  उसकी इसी भावना को मिटाने के लिए वेद मन्त्रों के भ्रामक अर्थ किये गए। वेदों में मनुष्य से लेकर हर प्राणिमात्र को मित्र के रूप में देखने का सन्देश मिलता है। इस महान सन्देश के विपरीत वेदों में पशुबलि, मांसाहार आदि जबरदस्ती शोध के नाम पर प्रचारित किये गए। इस प्रचार का नतीजा यह हुआ कि अनेक भारतीय आज गो के प्रति ऐसी भावना नहीं रखते जैसी पहले उनके पूर्वज रखते थे। दलितों के मन में भी यह जहर घोला गया। पुरुष सूक्त को लेकर भी इसी प्रकार से वेदों को जातिवादी घोषित किया गया। जिससे दलितों को यह प्रतीत हो की वेदों में शुद्र को नीचा दिखाया गया है।  इसी वेदों के प्रति अनास्था को बढ़ाने के लिए वेदों के उलटे सीधे अर्थ निकाले गए।  जिससे वेद धर्मग्रंथ न होकर जादू-टोने की पुस्तक, अन्धविश्वास को बढ़ावा देने वाली पुस्तक लगे। यह सब योजनाबद्ध रूप में किया गया। इसी सम्बन्ध में वेदों में आर्य-द्रविड़ युद्ध की कल्पना करी गई जिससे यह सिद्ध हो की आर्य लोग विदेशी थे।
3.  बुद्ध मत को बढ़ावा
 वेदों के विषय में भ्रान्ति फैलाने के पश्चात ईसाईयों ने सोचा कि दलित समाज से वेदों को तो छीनकर उनके हाथों में बाइबिल पकड़ाना इतना सरल नहीं है।  उनकी इस मान्यता का आधार उनके पिछले 400 वर्षों के इस देश में अनुभव था। इसलिए उन्होंने इतिहास के पुराने पाठ को स्मरण किया। 1200 वर्षों में इस्लामिक आक्रान्तों के समक्ष  धर्म परिवर्तन हिन्दू समाज में उतना नहीं हुआ जितना बोद्ध मतावली में हुआ। अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश इंडोनेशिया, जावा, सुमात्रा तक फैला बुद्ध मत तेजी से लोप होकर इस्लाम में परिवर्तित हो गया।  जबकि इस्लाम की चोट से बुद्ध मत भारत भूमि से भी लोप हुआ, मगर हिन्दू धर्म बलिदान देकर, अपमान सहकर किसी प्रकार से अपने आपको सुरक्षित रखा। ईसाई मिशनरी ने इस इतिहास से यह निष्कर्ष निकाला कि दलितों को पहले बुद्ध बनाया जाये और फिर ईसाई बनाना उनके लिए सरल होगा। इसी कड़ी में डॉ अम्बेडकर द्वारा बुद्ध धर्म ग्रहण करना ईसाईयों के लिए वरदान सिद्ध हुआ। डॉ अम्बेडकर के नाम के प्रभाव से दलितों को बुद्ध बनाने का कार्य आज ईसाई करते है। इस कार्य को सरल बनाने के लिए विदेशी विश्विद्यालयों में महात्मा बुद्ध और बुद्ध मत पर अनेक पीठ स्थापित किये गए। यह दिखाने का प्रयास किया गया कि भारत का गौरवशाली इतिहास महात्मा बुद्ध से आरम्भ होता है। उससे पहले भारतीय जंगली, असभ्य और बर्बर थे। पतंजलि योग के स्थान पर बुद्धिस्ट ध्यान अर्थात विपश्यना को प्रचलित किया गया। कुल मिलाकर ईसाई मिशनरियों का यह प्रयास दलितों को महात्मा बुद्ध के खूंटे से बांधने का था।
4 . सम्राट अशोक को बढ़ावा
इस चरण में ईसाई मिशनरियों द्वारा श्री राम चंद्र के स्थान पर सम्राट अशोक को बढ़ावा दिया गया। राजा अशोक को मौर्या वश का सिद्ध कर दलितों का राजा प्रदर्शित किया गया और राजा राम को आर्यों का राजा प्रदर्शित किया गया। इस प्रयास का उद्देश्य श्री राम आर्यों  के विदेशी राजा थे और अशोक मूलनिवासियों के राजा था। ऐसा भ्रामक प्रचार किया गया। इस प्रकार का मुख्य लक्ष्य श्री राम से दलितों को दूर कर सम्राट अशोक के खूंटे से जोड़ना था। इस कार्य के लिए अशोक द्वारा कलिंग युद्ध के पश्चात बुद्ध मत स्वीकार करने को इतिहास बड़ी घटना के रूप में दिखाना था। अशोक को महान समाज सुधारक, जनता का सेवक, कल्याणकारी प्रदर्शित किया गया। कुएं बनवाना, अतिथिशाला बनवाना, सड़कें बनवाना, रुग्णालय बनवाना जैसी बातों को अशोक राज में महान कार्य बताया गया। जबकि इससे बहुत काल पहले राम राज्य के सदियों पुराने न्यायप्रिय एवं चिरकाल से स्मरण किये जा रहे उच्च शासन की कसौटी को भुलाने का प्रयास किया गया। यह बहुत बड़ा छल था।  जबकि अशोक राज के इस तथ्य को छुपाया गया कि अशोक ने राज सेना को भंग करके सभी सैनिकों को बोद्ध भिक्षुक बना दिया गया और राजकोष को बोद्ध विहार बनाने के लिए खाली कर दिया था। अशोक की इस सनक से तंग आकर मंत्रिमंडल ने अशोक को राजगद्दी से हटा दिया था और अशोक के पौत्र को राजा बना दिया था। अशोक के छदम अहिंसावाद के कारण संसार का सबसे शक्तिशाली राज्य मगध कालांतर में कलिंग के राजा खारवेला से हार गया था। यह था क्षत्रियों के हथियार छीनकर उन्हें बुद्ध बनाने का नतीजा। इस प्रकार से ईसाईयों ने श्री राम की महिमा को दबाने के लिए अशोक को खड़ा किया।
5. आर्यों को विदेशी बनाना
 यह चरण सफ़ेद झूठ पर आधारित था। पहले आर्यों को विदेशी और स्थानीय मुलनिवासियों को स्वदेशी प्रचारित किया गया। फिर यह कहा गया कि विदेशी आर्यों ने मूलनिवासियों को युद्ध में परास्त कर उन्हें उत्तर से दक्षिण भारत में भगा दिया। उनकी कन्याओं के साथ जबरदस्ती विवाह किया। इससे उत्तर भारतीयों और दक्षिण भारतीयों में दरार डालने का प्रयास किया गया। इसके अतिरिक्त नाक के आधार पर और रंग के आधार पर भी तोड़ने का प्रयास किया। इससे दाल नहीं गली तो हिन्दू समाज से अलग प्रदर्शित करने के लिए सवर्णों को आर्य और शूद्रों को अनार्य सिद्ध करने का प्रयास किया गया। सत्य यह है कि इतिहास में एक भी प्रमाण आर्यों के विदेशी होने और हमलावर होने का नहीं मिलता। ईसाईयों की इस हरकत से भारत के राजनेताओं ने बहुत लाभ उठाया।  फुट डालों और राज करो कि यह नीति बेहद खतरनाक है।
6. ब्राह्मणवाद और मनुवाद का जुमला
 यह चरण बेहद आक्रोश भरा था। दलितों को यह दिखाया गया कि सभी सवर्ण जातिवादी है और दलितों पर हज़ारों वर्षों से अत्याचार करते आये है। जातिवाद को सबसे अधिक ब्राह्मणों ने बढ़ावा दिया है। जातिवाद कि इस विष लता को खाद देने के लिए ब्राह्मणवाद का जुमला प्रचलित किया गया। हमारे देश के इतिहास में मध्य काल का एक अंधकारमय युग भी था। जब वर्णव्यवस्था का स्थान जातिवाद ने ले लिया था। कोई व्यक्ति ब्राह्मण गुण,कर्म और स्वाभाव के स्थान पर नहीं अपितु जन्म के स्थान पर प्रचलित किया गया। इससे पूर्व वैदिक काल में किसी भी व्यक्ति का वर्ण, उसकी शिक्षा प्राप्ति के उपरांत उसके गुणों के आधार पर निर्धारित होता था। इस बिगाड़ व्यवस्था में एक ब्राह्मण का बेटा ब्राह्मण कहलाने लगा चाहे वह अनपढ़, मुर्ख, चरित्रहीन क्यों न हो और एक शुद्र का बेटा केवल इसलिए शुद्र कहलाने लगा क्योंकि उसका पिता शुद्र था। वह चाहे कितना भी गुणवान क्यों न हो। इसी काल में सृष्टि के आदि में प्रथम संविधानकर्ता मनु द्वारा निर्धारित मनुस्मृति में जातिवादी लोगों द्वारा जातिवाद के समर्थन में मिलावट कर दी गई। इस मिलावट का मुख्य उद्देश्य मनुस्मृति से जातिवाद को स्वीकृत करवाना था। इससे न केवल समाज में विध्वंश का दौर प्रारम्भ हो गया अपितु सामाजिक एकता भी भंग हो गई। स्वामी दयानंद द्वारा आधुनिक इतिहास में इस घोटाले को उजागर किया गया। ईसाई मिशनरी की तो जैसे मन की मुराद पूरी हो गई। दलितों को भड़काने के लिए उन्हें मसाला मिल गया। मनुवाद जैसी जुमले प्रचलित किये गए। मनु महर्षि को उस मिलावट के लिए गालियां दी गई जो उनकी रचना नहीं थी। इस वैचारिक प्रदुषण का उद्देश्य हर प्राचीन गौरवशाली इतिहास और उससे सम्बंधित तथ्यों के प्रति जहर भरना था। इस नकारात्मक प्रचार के प्रभाव से दलित समाज न केवल हिन्दू समाज से चिढ़ने लगे अपितु उनका बड़े पैमाने पर ईसाई धर्मान्तरण करने में सफल भी रहे। हालांकि जिस बराबरी के हक के लिए दलितों ने ईसाईयों का पल्लू थामा था।  वह हक उन्हें वहां भी नहीं मिला। यहाँ वे हिन्दू दलित कहलाते थे, वहां वे ईसाई दलित कहलाते हैं। अपने पूर्वजों का उच्च धर्म खोकर भी वे निम्न स्तर जीने को आज भी बाधित है और अंदर ही अंदर अपनी गलती पर पछताते है।
7. इतिहास के साथ खिलवाड़
 इस चरण में बुद्ध मत का नाम लेकर ईसाई मिशनरियों द्वारा दलितों को बरगलाया गया। भारतीय इतिहास में बुद्ध मत के अस्त काल में तीन व्यक्तियों का नाम बेहद प्रसिद्द रहा है। आदि शंकराचार्य, कुमारिल भट्ट और पुष्यमित्र शुंग। इन तीनों का कार्य उस काल में देश, धर्म और जाति की परिस्थिति के अनुसार महान तप वाला था। जहाँ एक ओर आदि शंकराचार्य ने पाखंड,अन्धविश्वास, तंत्र-मंत्र, व्यभिचार की दीमक से जर्जर हुए बुद्ध मत को प्राचीन शास्त्रार्थ शैली में परास्त कर वैदिक धर्म की स्थापना करी गई वहीँ दूसरी ओर कुमारिल भट्ट द्वारा माध्यम काल के घनघोर अँधेरे में वैदिक धर्म के पुनरुद्धार का संकल्प लिया गया। यह कार्य एक समाज सुधार के समान था। बुद्ध मत सदाचार, संयम, तप और संघ के सन्देश को छोड़कर मांसाहार, व्यभिचार, अन्धविश्वास का प्रायः बन चूका था।  ये दोनों प्रयास शास्त्रीय थे तो तीसरा प्रयास राजनीतिक था। पुष्यमित्र शुंग मगध राज्य का सेनापति था। वह महान राष्ट्रभक्त और दूरदृष्टि वाला सेनानी था। उस काल में सम्राट अशोक का नालायक वंशज बृहदरथ राजगद्दी पर बैठा था। पुष्यमित्र ने उसे अनेक बार आगाह किया था कि देश की सीमा पर बसे बुद्ध विहारों में विदेशी ग्रीक सैनिक बुद्ध भिक्षु बनकर जासूसी कर देश को तोड़ने की योजना बना रहे है। उस पर तुरंत कार्यवाही करे। मगर ऐशो आराम में मस्त बृहदरथ ने पुष्यमित्र की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। विवश होकर पुष्यमित्र ने सेना के निरीक्षण के समय बृहदरथ को मौत के घाट उतार दिया। इसके पश्चात पुष्यमित्र ने बुद्ध विहारों में छिपे उग्रवादियों को पकड़ने के लिए हमला बोल दिया। ईसाई मिशनरी पुष्यमित्र को एक खलनायक, एक हत्यारे के रूप में चित्रित करते हैं।  जबकि वह महान देशभक्त था।  अगर पुष्यमित्र बुद्धों से द्वेष करता तो उस काल का सबसे बड़ा बुद्ध स्तूप न बनवाता। ईसाई मिशनरियों द्वारा आदि शंकराचार्य, कुमारिल भट्ट और पुष्यमित्र को निशाना बनाने के कारण उनकी ब्राह्मणों के विरोध में दलितों को भड़काने की नीति थी। ईसाई मिशनरियों ने तीनों को ऐसा दर्शाया जैसे वे तीनों ब्राह्मण थे और बुद्धों को विरोधी थे। इसलिए दलितों को बुद्ध होने के नाते तीनों ब्राह्मणों का बहिष्कार करना चाहिए। इस प्रकार से इतिहास के साथ खेलते हुए सत्य तथ्यों को छुपाकर ईसाईयों ने कैसा पीछे से घात किया।  पाठक स्वयं निर्णय कर सकते है।
8.  हिन्दू त्योहारों और देवी -देवताओं के नाम पर भ्रामक प्रचार
  ईसाई  मिशनरी ने हिन्दू समाज से सम्बंधित त्योहारों को भी नकारात्मक प्रकार से प्रचारित करने का एक नया प्रपंच किया। इस खेल के पीछे का इतिहास भी जानिए। जो दलित ईसाई बन जाते थे।  वे अपने रीति-रिवाज, अपने त्योहार बनाना नहीं छोड़ते थे। उनके मन में प्राचीन धर्म के विषय में आस्था और श्रद्धा धर्म परिवर्तन करने के बाद भी जीवित रहती थी। अब उनको कट्टर बनाने के लिए उनको भड़काना आवश्यक था। इसलिए ईसाई मिशनरियों ने विश्वविद्यालयों में हिन्दू त्योहारों और उनसे सम्बंधित देवी देवतों के विषय में अनर्गल प्रलाप आरम्भ किया। इस पषड़यंत्र का एक उदहारण लीजिये। महिषुर दिवस का आयोजन दलितों के माध्यम से कुछ विश्विद्यालयों में ईसाईयों ने आरम्भ करवाया। इसमें शौध के नाम पर यह प्रसिद्द किया गया कि काली देवी द्वारा अपने से अधिक शक्तिशाली मूलनिवासी राजा के साथ नौ दिन तक पहले शयन किया गया। अंतिम दिन मदिरा के नशे में देवी ने शुद्र राजा महिषासुर का सर काट दिया। ऐसी बेहूदी, बचकाना बातों को शौध का नाम देने वाले ईसाईयों का उद्देश्य दशहरा, दीवाली, होली, ओणम, श्रावणी आदि पर्वों को पाखंड और ईस्टर, गुड फ्राइडे आदि को पवित्र और पावन सिद्ध करना था। दलित समाज के कुछ युवा भी ईसाईयों के बहकावें में आकर मूर्खता पूर्ण हरकते कर अपने आपको उनका मानसिक गुलाम सिद्ध कर देते है। पाठक अभी तक यह समझ गए होंगे की ईसाई मिशनरी कैसे भेड़ की खाल में भेड़िया जैसा बर्ताव करती है।
9. हिंदुत्व से अलग करने का प्रयास
ईसाई समाज की तेज खोपड़ी ने एक बड़ा सुनियोजित धीमा जहर खोला। उन्होंने इतिहास में जितने भी कार्य हिन्दू समाज द्वारा जातिवाद को मिटाने के लिए किये गए । उन सभी को छिपा दिया। जैसे भक्ति आंदोलन के सभी संत कबीर, गुरु नानक, नामदेव, दादूदयाल, बसवा लिंगायत, रविदास आदि ने उस काल में प्रचलित धार्मिक अंधविश्वासों पर निष्पक्ष होकर अपने विचार कहे थे। समग्र  रूप से पढ़े तो हर समाज सुधारक का उद्देश्य समाज सुधार करना था। जहाँ कबीर हिन्दू पंडितों के पाखंडों पर जमकर प्रहार करते है वहीं मुसलमानों के रोजे, नमाज़ और क़ुरबानी पर भी भारी भरकम प्रतिक्रिया करते है। गुरु नानक जहाँ हिन्दू में प्रचलित अंधविश्वासों की समीक्षा करते है वहीँ इस्लामिक आक्रांता बाबर को साक्षात शैतान की उपमा देते है। इतना ही नहीं सभी समाज सुधारक वेद, हिन्दू देवी-देवता, तीर्थ, ईश्वर आराधना, आस्तिकता, गोरक्षा सभी में अपना विश्वास और समर्थन प्रदर्शित करते हैं। ईसाई मिशनरियों ने भक्ति आंदोलन पर शोध के नाम पर सुनियोजित षड़यंत्र किया। एक ओर उन्होंने समाज सुधारकों द्वारा हिन्दू समाज में प्रचलित अंधविश्वासों को तो बढ़ा चढ़ा कर प्रचारित किया वहीँ दूसरी ओर इस्लाम आदि पर उनके द्वारा कहे गए विचारों को छुपा दिया। इससे दलितों को यह दिखाया गया कि जैसे भक्ति काल में संत समाज ब्राह्मणों का विरोध करता था और दलितों के हित की बात करता था वैसे ही आज ईसाई मिशनरी भी ब्राह्मणों के पाखंड का विरोध करती है और दलितों के हक की बात करती है। कुल मिलकर यह सारी कवायद छवि निर्माण की है। स्वयं को अच्छा एवं अन्य को बुरा दिखाने के पीछे ईसा मसीह के लिए भेड़ों को एकत्र करना एकमात्र उद्देश्य है। ईसाई मिशनरी के इन प्रयासों में भक्ति काल में संतों के प्रयासों में एक बहुत महत्वपूर्ण अंतर है। भक्ति काल के सभी हिन्दू समाज के महत्वपूर्ण अंग बनकर समाज में आई हुई बुराइयों को ठीक करने के लिए श्रम करते थे। उनका हिंदुत्व की मुख्य विचारधारा से अलग होने का कोई उद्देश्य नहीं था। जबकि वर्तमान में दलितों के लिए कल्याण कि बात करने वाली ईसाई मिशनरी उनके भड़का कर हिन्दू समाज से अलग करने के लिए सारा श्रम कर रही है।  उनका उद्देश्य जोड़ना नहीं तोड़ना है। पाठक आसानी से इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते है।
10. सवर्ण हिन्दू समाज द्वारा दलित उत्थान का कार्य
पिछले 100 वर्षों से हिन्दू समाज ने दलितों के उत्थान के लिए अनेक प्रयास किये। सर्वप्रथम प्रयास आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद द्वारा किया गया। आधुनिक भारत में दलितों को गायत्री मंत्र की दीक्षा देने वाले, सवर्ण होते हुए उनके हाथ से भोजन-जल ग्रहण करने वाले, उन्हें वेद मंत्र पढ़ने, सुनने और सुनाने का प्रावधान करने वाले, उन्हें बिना भेदभाव के आध्यात्मिक शिक्षा ग्रहण करने का विधान देने वाले, उन्हें वापिस से शुद्ध होकर वैदिक धर्मी बनने का विधान देने वाले अगर कोई है तो स्वामी दयानंद है। स्वामी दयानंद के चिंतन का अनुसरण करते हुए आर्यसमाज ने अनेक गुरुकुल और विद्यालय खोले जिनमें बिना जाति भेदभाव के समान रूप से सभी को शिक्षा दी गई।  अनेक सामूहिक भोज कार्यक्रम हुए जिससे सामाजिक दूरियां दूर हुए। अनेक मंदिरों में दलितों को न केवल प्रवेश मिला अपितु जनेऊ धारण करने और अग्निहोत्र करने का भी अधिकार मिला। इस महान कार्य के लिए आर्यसमाज के अनेकों कार्यकर्ताओं ने जैसे स्वामी श्रद्धानंद, लाला लाजपत राय, भाई परमानन्द आदि ने अपना जीवन लगा दिया। यह अपने आप में बड़ा इतिहास है।
     इसी प्रकार से वीर सावरकर द्वारा रत्नागिरी में पतितपावन मंदिर की स्थापना करने से लेकर दलितों के मंदिरों में प्रवेश और छुआछूत उनर्मुलन के लिए भारी प्रयास किये गए। इसके अतिरिक्त वनवासी कल्याण आश्रम, रामकृष्ण मिशन आदि द्वारा वनवासी क्षेत्रों में भी अनेक कार्य किये जा रहे हैं। ईसाई मिशनरी अपने मीडिया में प्रभावों से इन सभी कार्यों को कभी उजागर नहीं होने देती। वह यह दिखाती है कि केवल वही कार्य कर रहे है। बाकि कोई दलितों के उत्थान का कार्य नहीं कर रहा है। यह भी एक प्रकार का वैचारिक आतंकवाद है। इससे दलित समाज में यह भ्रम फैलता है कि केवल ईसाई ही दलितों के शुभचिंतक है। हिन्दू सवर्ण समाज तो स्वार्थी और उनसे द्वेष करने वाला है।
11. मीडिया का प्रयोग
  ईसाई मिशनरी ने अपने अथाह साधनों के दम पर सम्पूर्ण विश्व के सभी प्रकार के मीडिया में अपने आपको शक्तिशाली रूप में स्थापित कर लिया है। उन्हें मालूम है कि लोग वह सोचते हैं, जो मीडिया सोचने को प्रेरित करता है। इसलिए किसी भी राष्ट्र में कभी भी आपको ईसाई मिशनरी द्वारा धर्म परिवर्तन के लिए चलाये जा रहे गोरखधंधों पर कभी कोई समाचार नहीं मिलेगा। जबकि भारत जैसे देश में दलितों के साथ हुई कोई साधारण घटना को भी इतना विस्तृत रूप दे दिया जायेगा। मानों सारा हिन्दू समाज दलितों का सबसे बड़ा शत्रु है। हम दो उदहारणों के माध्यम से इस खेल को समझेंगे। पूर्वोत्तर राज्यों में ईसाई चर्च का बोलबाला है। रियांग आदिवासी त्रिपुरा राज्य में पीढ़ियों से रहते आये है। वे हिन्दू वैष्णव मान्यता को मानने वाले है।  ईसाईयों ने भरपूर जोर लगाया परंतु उन्होंने ईसाई बनने से इनकार कर दिया।  चर्च ने अपना असली चेहरा दिखाते हुए रियांग आदिवासियों की बस्तियों पर अपने ईसाई गुंडों से हमला करना आरम्भ कर दिया। वे उनके घर जला देते, उनकी लड़कियों से बलात्कार करते, उनकी फसल बर्बाद कर देते। अंत में कई रियांग ईसाई बन गए, कई त्रिपुरा छोड़कर आसाम में निर्वासित जीवन जीने लग गए। पाठकों ने कभी चर्च के इस अत्याचार के विषय में नहीं सुना होगा। क्योंकि सभी मानवाधिकार संगठन, NGOs, प्रिंट मीडिया, अंतराष्ट्रीय संस्थाएं  ईसाईयों के द्वारा प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से संचालित हैं। इसके ठीक उल्ट गुजरात के ऊना में कुछ दलितों को गोहत्या के आरोप में हुई पिटाई को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे उठाया गया जैसे इससे बड़ा अत्याचार तो दलितों के साथ कभी हुआ ही नहीं है। रियांग आदिवासी भी दलित हैं। उनके ऊपर जो अत्याचार हुआ उसका शब्दों में बखान करना असंभव है। मगर गुजरात की घटना का राजनीतीकरण कर उसे उछाला गया। जिससे दलितों के मन में हिन्दू समाज के लिए द्वेष भरे। इस प्रकार से चर्च अपने सभी काले कारनामों पर सदा पर्दा डालता है और अन्यों की छोटी छोटी घटनाओं को सुनियोजित तरीके से मीडिया के द्वारा प्रयोग कर अपना ईसाईकरण का कार्यक्रम चलाता है। इसके लिए विदेशों से चर्च को अरबों रूपया हर वर्ष मिलता है।
12. डॉ अम्बेडकर और दलित समाज
ईसाई मिशनरी ने अगर किसी के चिंतन का सबसे अधिक दुरूपयोग किया तो वह संभवत डॉ अम्बेडकर ही थे। जब तक डॉ डॉ अम्बेडकर जीवित थे, ईसाई मिशनरी उन्हें बड़े से बड़ा प्रलोभन देती रही कि किसी प्रकार से ईसाई मत ग्रहण कर ले क्योंकि डॉ अम्बेडकर के ईसाई बनते ही करोड़ों दलितों के ईसाई बनने का रास्ता सदा के लिए खुल जाता।  उनका प्रलोभन तो क्या ही स्वीकार करना था। डॉ अम्बेडकर ने खुले शब्दों के ईसाइयों द्वारा साम,दाम, दंड और भेद की नीति से धर्मान्तरण करने को अनुचित कहा।  डॉ अम्बेडकर ने ईसाई धर्मान्तरण को राष्ट्र के लिए घातक बताया था। उन्हें ज्ञात था कि इसे धर्मान्तरण करने के बाद भी दलितों के साथ भेदभाव होगा। उन्हें ज्ञात था कि ईसाई समाज में भी अंग्रेज ईसाई, गैर अंग्रेज ईसाई, सवर्ण ईसाई,दलित ईसाई जैसे भेदभाव हैं। यहाँ तक कि इन सभी गुटों में आपस में विवाह आदि के सम्बन्ध नहीं होते है। यहाँ तक इनके गिरिजाघर, पादरी से लेकर कब्रिस्तान भी अलग होते हैं। अगर स्थानीय स्तर पर (विशेष रूप से दक्षिण भारत) दलित ईसाईयों के साथ दूसरे ईसाई भेदभाव करते है। तो विश्व स्तर पर गोरे ईसाई (यूरोप) काले ईसाईयों (अफ्रीका) के साथ भेदभाव करते हैं। इसलिए केवल नाम से ईसाई बनने से डॉ अम्बेडकर ने स्पष्ट इंकार कर दिया। जबकि उनके ऊपर अंग्रेजों का भारी दबाव भी था। डॉ अम्बेडकर के अनुसार ईसाई बनते ही हर भारतीय भारतीय नहीं रहता। वह विदेशियों का आर्थिक, मानसिक और धार्मिक रूप से गुलाम बन जाता है। इतने स्पष्ट रूप से निर्देश देने के बाद भी भारत में दलितों के उत्थान के लिए चलने वाली सभी संस्थाएं ईसाईयों के हाथों में है। उनका संचालन चर्च द्वारा होता है और उन्हें दिशा निर्देश विदेशों से मिलते है।
इस लेख के माध्यम से हमने यह सिद्ध किया है कि कैसे ईसाई मिशनरी दलितों को हिंदुओं के अलग करने के लिए पुरजोर प्रयास कर रही हैं। इनका प्रयास इतना सुनियोजित है कि साधारण भारतीयों को इनके षड़यंत्र का आभास तक नहीं होता। अपने आपको ईसाई समाज मधुर भाषी, गरीबों के लिए दया एवं सेवा की भावना रखने वाला, विद्यालय, अनाथालय, चिकित्सालय आदि के माध्यम से गरीबों की सहायता करने वाला दिखाता है।  मगर सत्य यह है कि ईसाई यह सब कार्य मानवता कि सेवा के लिए नहीं अपितु इसे बनाने के लिए करता है। विश्व इतिहास से लेकर वर्तमान में देख लीजिये पूरे विश्व में कोई भी ईसाई मिशन मानव सेवा के लिए केवल धर्मान्तरण के लिए कार्य कर रहा हैं। यही खेल उन्होंने दलितों के साथ खेला है। दलितों को ईसाईयों की कठपुतली बनने के स्थान पर उन हिंदुओं का साथ देना चाहिए जो जातिवाद का समर्थन नहीं करते है। डॉ अम्बेडकर ईसाईयों के कारनामों से भली भांति परिचित थे। इसीलिए उन्होंने ईसाई बनना स्वीकार नहीं किया था। भारत के दलितों का कल्याण हिन्दू समाज के साथ मिलकर रहने में ही है। इसके लिए हिन्दू समाज को जातिवाद रूपी सांप का फन कुचलकर अपने ही भाइयों को बिना भेद भाव के स्वीकार करना होगा।
(इस लेख को पढ़कर हर हिन्दू जातिवाद का नाश करने का संकल्प अवश्य ले)

From: Pramod Agrawal < >

“What Is My Religion? I Feel Shame on My Self because am a Muslim.”

by Hakim Haider

https://www.gatestoneinstitute.org/8958/what-is-my-religion

◾ Mosques are a basic school where your children learn the Subject of Terrorism.

◾I ask again to Teacher (Mulla) in Mosque, “Sir, there are so many groups in Islam. One group orders to kill the other Group because he is a Non-Muslim. Why?”

He Replied: “Because he does not follow our Rules.” I am Surprised to hear it. This means one person who do not follow our (Islamic) Rules, we (Muslims) kill him.

◾I ask one more Question. “Sir, if am a Sunni or Wahhabi, (do) I kill the Person who belongs to another Sect like Shia?”

He replies, “Yes off Course.” I felt shocked and shouted, “No sir, I do not kill anybody whether he is a Muslim or Non-Muslim, or a Muslim belong to another Sect. I was just talking. He (Mullah) slapped me hardly. Next am sit on the corner of Mosque, Quietly.

◾Every group or Sect are telling, “We do this because our Prophet has ordered us to. So what is the Prophet teaching, to kill someone just because he does not follow Islam?

◾I open my eyes in Islamic Family in a Islamic Country, but in 23 years I do not know what is Islam. What is the purpose of Islam?

 

Once I ask a question to my Teacher (Mulla) in the Mosque, “What is the difference between Muslim and non-Muslim?”

 

He replied: “one who be leaves on Allah and prophet Muhammad p.b.u.h. is a Muslim, and one who does not believe on Allah and Muhammad p.b.u.h. is a non-Muslim.

 

I asked again, “So what we do? How we teach the Non-Muslim?”

He replied: “Just kill him.”

 

I asked: “Why we kill him, and when I kill him?”

He replied: “When you grow up then you Kill him.”

 

Am thinking from that day: Why this Teacher (Mullah) telling me this? On Next Day I asked again to Teacher (Mullah) in Mosque, “Sir there are so many groups in Islam. One group orders to kill the other group. Why?

 

He Replied: “Because he do not follow our Rules.”

 

I am surprised to hear this. This means one person who does not follow our rules we kill him. I ask one more question, “Sir if am a Sunni or Wahhabi, I kill the person who belongs to another sect like Shia?”

 

He replied: “Yes off course.”

From: SB Tyagi < >

इजराइल की कुछ रोचक जानकारी-

→ इजराइल का कुल क्षेत्रफल इतना है कि तीन इजराइल मिल कर भी राजस्थान जितना नहीं हो सकते ।

→ इजराइल की कुल जनसंख्या लगभग २५ –३० लाख है, चारो तरफ से कट्टर इस्लामिक मुस्लिम देशो से घिरा हुआ है।

→ एक बार तो 7 देशो ने मिलकर अकेले इजराइल पर हमला किया था।

→ अब जरा इजराइल की सेन्य और विदेश नित्ति भी जान लीजिये ←

इजराइल कभी किसी देश या संघटन को यह नहीं कहता कि हमारे देश में आंतकवादी घटनाये या हमला मत कीजिये….

बल्कि इजराइल कहता है अगर किसी ने हमारे देश के एक नागरिक को मारा तो हम उस देश में घुस कर के उसके 1000 नागरिकों को मार देंगे ।

→ हाल ही में फिलिस्तीन ने यह गलती की तो इजराइल ने फिलिस्तीन के ५ स्कुलों पर बमबारी कर दी।

→ अगर आप इजराइल के दुश्मन हो और आप मुस्लिम हो तो आपका इस दुनिया में कही भी जिन्दा रह पाना मुश्किल ही नहीं नामुनकिन है ।

→ इजराइल की ख़ुफ़िया एजेंसी “मोसाद” आपको और आपके परिवार को हर पल मरने के लिए मजबूर कर देगी और अंत में आपको और आपके परिवार को आपके के ही घर में बम से उड़ा दिया जायेगा ।

→ युद्ध में इजराइल का कोई मुकाबला नहीं है जैसे हमने बताया एक बार 7 देश एक साथ मिलकर कोशिश कर चुके हैं लेकिन उन्हें मुंह की खानी पड़ी और बचा-कूचा विवादित क्षेत्र भी इजराइल ने हथिया लिया था l

हमें इजराइल बनने के लिए मजबूत इच्छाशक्ति, संकल्प और नेर्तत्व करने की भारी क्षमता और बड़े फेसले लेने की ताकत चाहिए। और यही कारण है की दुनियाभर के ज्यादातर मुसलमान इसराइल से नफरत करते हैं.

क्योंकि वह उनकी आतंकवादी हरकतों को बर्दाश्त ना करके हर बारी उनकी ईंट से ईंट बजा डालता है!!!!
ऐसा…. हम कब सीखेंगे ..???

जब फिलिस्तीनी आतंकवादियो ने 1972 के म्यूनिख ओलंपिक गेम्स विलेज में घुसकर 12 इस्राइली खिलाडियों की हत्या कर दी थी, तब तत्कालीन इस्राइली प्रधानमंत्री श्रीमती गोल्डा मायर ने कोई भी बयान नहीं दिया…..

उन्होंने सारे मृत खिलाडियो के घरवालो को खुद फोन करके कहा की हम बदला लेकर रहेंगे. उन्होंने अपनी गुप्तचर एजेंसी मोसाद को पूरी छुट दे दी और कहा “इस घटना में जितने लोग भी शामिल है, वो चाहे दुनिया के किसी भी देश में हो , उनको जिन्दा नहीं रहने देना है…..

मोसाद ने पता लगा लिया की इस हत्याकांड में 14 आतंकवादी शामिल थे .

1. एक आतंकवादी सलाह खलिफ जेदाह में अपने परिवार के साथ रहता था, मोसाद ने उसके घर में रखे टेबलजिस पर फ़ोन रखा था, ठीक वैसा ही टेबल रख दिया और टेबल के अन्दर बम फिट करके उसका कनेक्शन फोन से जोड़ दिया। फिर उसके फोन की घंटी बजी, उसने जैसे ही फोन उठाया उसके चीथड़े उड़ गए……

2. एक आतंकवादी अबू दयुद बेरुत में छुपा था। मोसाद ने उसकी पूरी दिनचर्या पर नज़र रखी। वो एक क्लब में रोज जाता था। इजराइल ने अपने खतरनाक कमांडो को बेरुत भेजा, जिसमे सिर्फ 3 लोग थे, एक कमांडो बेंजामिन नेतान्याहू [जो बाद में इसराइल के राष्ट्रपति बने ] एक ख़ूबसूरत लड़की का भेष रखकर उस क्लब में नाच रहे थे ,जैसे ही वो आतंकवादी उनके करीब नाचने के लिए आया।

बेंजामिन ने अपनी फुल्ली औटोमटिक गन से गोलियों की बौछार कर दी 15 लोग मरे गए और बेंजामिन और उनका साथी जो उनको कवर कर रहा था, लेबनानी पुलिस के नकली गाड़ी में फरार हो गए…..

3. एक आतंकवादी अमिन अल हिंदी को मोसाद ने अम्मान में उसके बिल्डिंग के नीचे गोलियों से भुन दिया…..

4. अब बाक़ी बचे आतंकवादियो ने डरकर आत्मसमर्पण करने का प्रस्ताव भेजा।लेकिन गोल्डा मायर ने कुछ नहीं बोला।

चौथे आतंकवादी अबू फयाज, जो छुप कर हेलसिंकी में रहता था,उसे कार से कुचल कर मार दिया गया….

5. पाचवे आतंकवादी अली हसन सलामेहजो पेरिस में छुपा था, वही उसको साइनाइड जहर देकर मार दिया गया…..

6. महमूद हम्शारी को दमिस्क में गोली मारी गयी ….

इस तरह गोल्डा मायर ने एक एक को चुन चुन कर पूरी दुनिया में मारा…..

मैं सलाम करता हूँ, ऐसे देश के जज्बे को, जहाँ के नागरिक हमेशा अपना सर उठा के चलते है……..

आप भी भारत को ऐसा मजबूत देश के रूप में देखना चाहते है तो इसे आगे भेजें.

*चाहे आतंकवादी हो या कोई अन्य देश, जो भी भारत माँ पर आँख उठाये उसे करारा जवाब ज़रुर मिले।*