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Archive for the ‘Articles’ Category

From: Vivek Arya < >

आप के सामने दो सीन रखता हूँ जरा गंभीरता से विचार करें !

सीन नंबर -1

RSS प्रमुख मोहन भागवत नागपुर में एलान करते हैं ”हिंदुओं को अब भारत की संविधान में विश्वास नहीं है अब RSS देश के हर जिले में अपनी समानांतर अदालतें खोलेगा जिसमें हिंदू धर्म के अनुसार न्याय दिया जाएगा”
पूरे देश में तहलका मच जाता है सागरिका घोष, निधि राजदान, बरखा दत्त सोनिया सिंह जैसी पत्रकार अपनी चूड़ियां तोड़कर माथे से सिंदूर पोछकर विधवा विलाप करने लगती हैं ! रवीश कुमार विटामिन की गोलियां खा खाकर चिल्ला रहे हैं ..अरे यह क्या हो गया देश बर्बाद हो जाएगा देश बिखर जाएगा.. अरविंद केजरीवाल राहुल गांधी सहित वामपंथी सूअर और कांग्रेसी कुत्ते छातियां पीट-पीटकर विलाप कर रहे हैं !

पूरे देश में अराजकता का माहौल हो गया जगह-जगह ट्रेन जलाए जा रहे हैं बस फुके जा रहे हैं सरकारी संपत्तियों का नुकसान किया जा रहा है जिग्नेश मेवानी हाथ में जलती हुई मशाल लेकर सरकारी ऑफिसों और बसों में आग लगा रहा है कन्हैया कुमार, शहला रशीद, जावेद अख्तर जैसे लोग सड़कों पर उतर कर दंगा मचा रहे हैं । स्थिति इतनी बेकाबू हो जाती है पूरे देश में सेना बुलानी पड़ती है ! फायरिंग में करीब 10 हजार लोग मारे जाते हैं और करीब 10 लाख से ज्यादा लोग घायल हो जाते हैं !

सीन नम्बर -2

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड दिल्ली से ऐलान करता है कि ”मुसलमानों को भारत की संविधान पर यकीन नहीं है क्योंकि इस्लाम में क्योंकि कुरान में लिखा है कि हर मुस्लिम को शरीयत का पाबंद होना चाहिए इसलिए मुसलमान अब भारतीय न्याय व्यवस्था पर विश्वास नहीं करते हुए अपने मसाइल शरिया अदालतों में ले जाएंगे और इसके लिए देश के हर जिले में शरिया अदालतें खोली जाएंगी” !

एकदम सन्नाटा पूरे देश में कही कोई आवाज नही .एनडीटीवी पर कोई बहस नही.राहुल गांधी अरविंद केजरीवाल, राजदीप सरदेसाई, सागरिका घोष, अलका लांबा, रिफत जावेद, जावेद अख्तर जैसे हजारों बुद्धिजीवियों ने इस पर एक भी ट्वीट तक नहीं किया !

वैसे हर बात पर डॉ अम्बेडकर और उनके संविधान का नाम लेने वाले अम्बेडकरवादी इस मुद्दे पर बड़ी चुप्पी साधे बैठे हैं। जबकि डॉ आंबेडकर के बनाये संविधान को मुसलमान ठेंगा दिखाने की बात सरेआम कर रहे हैं।

बोलो जय मीम, क्यों नहीं किया इस पर विचार ?

#ShariaKills
#BanShariatCourt #BanShariaLaw

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From: Vinod Kumar < >

शरिया कोर्ट” … जिहादी सोच…

❔भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में शरिया कोर्ट के गठन का विचार एक और जिहादी सोच का परिचय करा रही है। यह अत्यंत दुःखद है कि भारत का इस्लामीकरण करने की कट्टरपंथी मुसलमानों की मानसिकता यथावत बनी हुई है। मुगलकालीन बर्बरतापूर्ण इतिहास को हम भूले नही है।जब सन 1947 में हिन्दू-मुस्लिम धार्मिक आधार पर देश का विभाजन हो गया और मुसलमानों की इच्छानुसार उन्हें भारतभूमि का एक तिहाई भाग काट कर पाकिस्तान के रूप में दे दिया गया तो फिर वे क्यों वर्षो से अपने लिए पृथक शरिया न्यायालय बनाने के लिए कुप्रयास कर रहे हैं ?
❔वे भूल गये है कि भारत विभाजन के पश्चात इनका नैतिक दायित्व था कि पाकिस्तान चलें जाए परंतु नही गये , क्यों ? क्या इनको उस समय भारत में रोक कर व बसा कर तत्कालीन हमारे नीतिनियन्ताओं से कोई भारी त्रुटि हो गयी थी ? क्या इस अदूरदर्शी निर्णय से भारतीय मानस निरंन्तर आहत नही हो रहा ? स्वतंत्रता के 70 वर्षो के उपरांत भी इन मुस्लिम कट्टरपंथियों में “भारत” को “दारुल-इस्लाम” बनाने की दूषित मानसिकता अभी भी क्यों जीवित है ?
❔ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा देश के प्रत्येक जिले में शरिया कानून के अनुसार न्यायालय बनाने के विचार के पीछे ऐसी ही घिनौनी मानसिकता सक्रिय हो गयी है। इसी जिहादी सोच को शरिया कोर्ट के बहाने भी बढ़ाया जा रहा है। आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की शरिया अदालत (दारुल – कजा) कमेटी के संयोजक काजी तबरेज आलम के अनुसार शरिया अदालत के गठन करने के पीछे मुख्य कारण मुस्लिम माहिलाओं को न्याय शीघ्र मिलना, देश की वर्तमान न्यायालयों पर बोझ कम होना और सरकार का धन भी कम व्यय होना बताया गया है। लेकिन क्या ऐसा सोचा जा सकता है कि इस्लामिक जगत कभी भी भारत सहित सम्पूर्ण विश्व को दारुल-इस्लाम बनाने के अतिरिक्त किसी अन्य योजना पर कार्य करेगा ?
❔क्या भारत में मुसलमानों को लाभान्वित करने वाली अनेक योजनाएं उनके कट्टरपन व साम्प्रदायिक आक्रामकता को कम कर पायी ? क्या कश्मीर व वहां के अलगाववादियों पर भारी राजकोष लुटा कर उनमें कभी भारत भक्ति का भाव उत्पन्न करने में कोई सफलता मिली ? क्या धर्म के नाम पर जिहाद करने वाले आतंकवादियों के विरुद्ध कभी कोई मुस्लिम संगठन सक्रिय हुआ ? ऐसे अनेक प्रश्नों के सकारात्मक उत्तर की प्रतीक्षा में देशवासी बेचैन है। इनके तुष्टिकरण व सशक्तिकरण से  इनका जिहादी जनून कम नही हो रहा बल्कि भारतभूमि के भक्तों का अस्तित्व संकटमय हो रहा है।
❔निसंदेह मुगलकालीन व वर्तमान इतिहास साक्षी है कि भारत की एकता व अखंडता को ललकारने वाली मुस्लिम मानसिकता केवल इस्लामिक शिक्षाओं व उसके दर्शन का दुष्परिणाम है। “शरिया कोर्ट”  बनाने के बहाने आक्रांताओं की अरबी संस्कृति को हम पर थोंपने की यह एक षड्यंत्रकारी योजना है।
❔अतः धर्मनिरपेक्ष देश में संविधान के अनुसार चलने वाले न्यायालयों के अतिरिक्त धर्म आधारित न्यायालयों का कोई औचित्य नही है। हमें सावधान रहना होगा कि शरिया कोर्ट का विचार जिहादी सोच का ही परिणाम है। ऐसा कुप्रयास करने वाले मानवतावादी व उदारवादी विचारधारा के विरुद्ध वातावरण बना कर भारतीय संस्कृति व धार्मिक आस्थाओं को भी आहत करना चाहते है।

✍विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)
गाज़ियाबाद

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From: Chandar Kohli < >

Sects [[[the cast system]]] in Islam—–

:::::  Name of the Sects in Islam and their Basic Beliefs

1. Jarudiah:
Followers of Abu’l-Jarud. They believe Holy Prophet (pbuh) designated Al-Isa as the Imam by his characteristics but not by name.

2. Sulamania:
Followers of Sulaiman ibn-Jarir al-Zaidi. They believed Imamat was a matter of Jaririya conference and could be confirmed by two best Muslims.

3. Butriyah:
They did not dispute the Khilafat of Uthman (ra), neither they attack him nor Hurariyah praise him.

4. Yaqubiyya:
They accepted the Khilafat of Abu Bakr (ra) and Umar (ra), but did not reject those who rejected these Khulifaa. They also believed that Muslim commiters of Major sins will be in hell forever.

5. Hanafiyah:
Followers of the Imammate of Muhammad ibn-al-Hanifah. They believe that Allah might have had a beginning.

6. Karibiyah:
They believed that Imam Muhammad ibn-al-Hanifah is not dead and is the Imam Ghaib (in disappearance) and the expected Mahdi.

7. Kamiliyah:
Followers of Abu-Kamil. They believed companions to be heretic because they forsook their allegiance to Ali (ra) and condemn Ali (ra) for ceasing to fight them. They believed in the returning of the dead before the Day of Resurrection and that Satan is right in preferring fire to clay. 

8. Muhammadiyyah: 
Followers of Muhammad ibn-Abdullah ibn-al-Hassan. They do not believe/Mughairiyah that Imam Muhammad ibn-Abdullah died and that he is the Imam Ghaib and awaited Mahdi.

9. Baqiriyah:
Followers of Muhammad ibn-Ali al-Baqir. They believe him to be the Imam Ghaib and expected Mahdi.

10. Nadisiyah:
They believe that those who consider themselves better than anyone else are Kafirs (disbelievers).

11. Sha’iyah:
They believe that the one who has recited La Ilaha Il-Allah (there is none worthy of worship except Allah), whatever she or he does, will never be punished.

12. Ammaliyah:
They believe that faith for one is what he/she sincerely practices.

13. Ismailiyah:
They believe in the continuity of Imammate among the descendants of Ismail ibn-Ja’far.

14. Musawiyah:
They believe Musa ibn-Ja’far to be the Imam Ghaib and expected Mahdi / Mamturah.

15. Mubarakiyah:
They believe in the continuity of Imammate among the descendants of Muhammad ibn-Ismail ibn-Ja’far.

16. Kathiyah:
They believe that expected Mehdi will be twelveth Imam among the /Ithn Áshariya descendants of the Áli ibn-abi-Talib. (The Twelvers). 

17. Hashamiya:
They Predicate a body to Allah and also allege Prophet (pbuh) of disobedience/ Taraqibiyah to Allah 

18. Zarariyah:
They believe that Allah did not live nor had any attributes till He created for Himself life and His attributes.

19. Younasiyah:
Followers of Younas ibn-Ábd-al-Rahman al-Kummi. They believe that Allah is borne by the bearers of His Throne, though He is stronger than they are.

20. Shaitaniyah/Shireekiyah:
They believed in the view that deeds of servants of Allah are substances; and a servant of Allah can really produce a substance.

21. Azraqaih:
Followers of Nafi ibn-al-Azraq. They do not believe in the good dreams and visions and claim that all forms of revelations have ended.

22. Najadat: 
Followers of Najdah ibn-Ámir al-Hanafi. They abolished the punishment of drinking wine also they believed that sinners of this sect would not be treated in hellfire but some other place before allowed in Paradise.

23. Sufriyah:
Followers of Ziyad ibn-al-Asfar. They believed that sinners are in fact polytheists.

24. Ajaridah:
Followers of Abd-al-Karim ibn-Ajrad. They believed that a child should be called to Islam after it has attained maturity. Also they believed booty of war to be unlawful till the owner is killed. 

25. Khazimiyah: 
They believe Allah loves men of all faiths even if one has been a disbeliever most of his life.

26. Shuaibiyah/Hujjatiyah: 
They believed that what Allah desires does happen no matter what and what does not happen it means Allah desires it not.

27. Khalafiyah:
Followers of Khalaf. They do not believe in fighting except under the leadership of an Imam.

28. Ma’lumiyah/Majhuliah: 
They believed that whoever did not recognise Allah by His names was ignorant of Him and anyone ignorant of Him was a disbeliever.

29. Saltiyah:
Followers of Salt ibn-Usman. They believed in the conversion of adults only and if father has converted to Islam children were considered disbelievers till they reach maturity.

30. Hamziyah:
Followers of Hamza ibn-Akrak. They believe that children of polytheists are condemned to hell.

31. Tha’libiyah:
Followers of Tha’labah ibn-Mashkan. They believe that parents remain guardians over their children of any age until children make it clear to parents that they are turning away from truth.

32. Ma’badiyah:
They did not believe in taking or giving alms from or to slaves.

33. Akhnasiyah:
They do not believe in waging a war except in defence or when the opponent is known personally.

34. Shaibaniyah/Mashbiyah: 
Followers of Shaiban ibn-Salamah al-Khariji. They believe that Allah resembles His creatures.

35. Rashidiyah:
They believe that land watered by springs, canals or flowing rivers should pay half the Zakat (tithe), while land watered by rain only should pay he full Zakat.

36. Mukarramiyah/tehmiyah: 
Followers of abu-Mukarram. They believe that ignorance constitutes as disbelief. Also that Allah enmity or friendship depends upon the state of a persons’ belief at his death.

37. Abadiyah/Afáliyah:
They consider Abdullah ibn-Ibad as their Imam. They believe in doing good deeds without the intention of pleasing Allah.

38. Hafsiyah: 
Consider Hafs ibn-abi-l-mikdam as their Imam. They believe that only knowing Allah frees one from polytheism.

39. Harithiya:
Followers of Harith ibn-Mazid al-Ibadi. They believe that the ability precedes the deeds.

40. Ashab Ta’áh:
They believe that Allah can send a prophet without giving him any sign to prove his prophecy.

41. Shabibiyah/Salihiyah: 
Followers of Shabib ibn-Yazid al-Shaibani. They believe in the Imamate of a woman named Ghazalah.

42. Wasiliyah:
Followers of Wasil ibn-‘Ata al-Ghazza. They believe that does who commit major sins will be punished in hell but still remain believers.

43. Ámriyah:
Followers of Amir ibn-Ubaid ibn-Bab. They reject the legal testimony of people from supporters of either side of the battle of Camel.

44. Hudhailiyah/Faniya:
Followers of abu-al-Hudhail Muhammad ibn-al-Hudhail. They believe that both Hell and Paradise will perish and that preordination of Allah can cease, at which time Allah will no longer be omnipotent.

45. Nazzamiyah:
Followers of abu-Ishaq Ibrahim ibn-Saiyar. They do not believe in the miraculous nature of the Holy Quran nor do they believe in the miracles of the Holy Prophet (pbuh) like splitting the moon.

46. Mu’ammariyah:
They believe that Allah neither creates life nor death but it is an act of the nature of living body.

47. Bashriyah:
Followers of Bashr ibn-al-Mu’tamir. They believe that Allah may forgive a man his sins and may change His mind about this forgiveness and punish him if he is disobedient again.

48. Hishamiyah:
Followers of Hisham ibn-ämr al-Futi. They believe that if a Muslim community come to consensus it needs an Imam and if it rebels and kills its Imam, no one should be chosen an Imam during a rebellion.

49. Murdariyah:
Followers of Isa ibn-Sabih. They believe that staying in close communication with the Sultan (ruler) makes one unbeliever.

50. Ja’friyah:
Followers of Ja’far ibn-Harb and Ja’far ibn-Mubashshir. They believe that drinking raw wine is not punishable and that punishment of hell could be inferred by a mental process. 

51. Iskafiyah:
Followers of Muhammad ibn-Abdallah al-Iskafi. They believe that Allah has power to oppress children and madman but not those who have their full senses.

52. Thamamiyah:
Followers of Thamamah ibn-Ashras al-Numairi. They believe that he whom Allah does not compel to know Him, is not compelled to know and is classed with animals who are not responsible.

53. Jahiziayh:
Followers of ‘Ámr ibn-Bahr al-Jahiz. They believe that Allah is able to create a thing but unable to annihilate it. 

54. Shahhamiyah/Sifatiyah:
Followers of abu-Yaqub al-Shahham. They believe that everything determined is determined by two determiners, one the creator and the other acquirer. 

55. Khaiyatiyah/Makhluqiyah:
Followers of abu-al-Husain al-Khaiyat. They believe that everything non-existent is a body before it appears, like man before it is born is a body in non-existence. Also that every attribute becomes existent when it makes its appearance. 

56. Ka’biyah:
Followers of abu-qasim Abdullah ibn-Ahmed ibn-Mahmud al-Banahi known as al-Ka’bi. They believe that Allah does not see Himself nor anyone else except in the sense that He knows himself and others. 

57. Jubbaiyah:
Followers of abu-‘Ali al-Jubbai. They believe that Allah obeys His servants when he fulfils their wish. 

58. Bahshamiyah:
Followers of abu-Hashim. They believe that one, who desires to do a bad deed, though may not do it, commit infidelity and deserve punishment.

59. Ibriyah:
They believe that Holy Prophet (pbuh) was a wise man but not a prophet.

60. Zanadiqiyah:
They believe that the incident Miraj was a vision of the Holy prophet (pbuh) and that we can see Allah in this world. 

61. Qabariyya:
They do not believe in the punishment of grave. 

62. Hujjatiya:
They do not believe in the punishment for deeds on the grounds. 

63. Fikriyya:
They believe that doing Dhikr and Fikr (Remembering and thinking about Allah) is better than worship. 

64. ‘Aliviyah/Ajariyah:
They believe that Hazrat Ali shared Prophethood with Mohammad (pbuh) 

65. Tanasikhiya:
They believe in the re-incarnation of soul.

66. Rajiýah:
They believe that Hazrat Ali ibn-abi-Talib will return to this world. 

67. Ahadiyah:
They believe in the Fardh (obligations) in faith but deny the Sunnah.

68. Radeediyah:
They believe that this world will live forever.

69. Satbiriyah:
They do not believe in the acceptance of repentance. 

70. Lafziyah:
They believe that Quran is not the word of God but only its meaning and essence is the word of God. Words of Quran are just the words of the narrator. 

71. Ashariyah:
They believe that Qiyas (taking a guess) is wrong and amounts to disbelief. 

72. Bada’iyah:
They believe that obedience to Ameer is obligatory no matter what he commands.

*Islamic Encyclopaedia published by Munshi Mehboob ‘Alim’ (editor Newspaper Paisa, Lahore, Pakistan). Page 570-572.
*Al-Farq Bain Al Firaq, by Abu Mansur ‘abd-al-Kahir ibn-Tahir al-Baghdadi, Translated into English by Kate Chambers Seelye, (AMS Press, NewYork 1996)
*Kitab Lajawaab Masmay ba-Mazhab al-Islam by Hakeem Maulvi Muhammad Najam al-Ghani Rampuri, 1st edition, (Munshi Nau Lakshoor Lakhnau 1924).

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From: Guvindra Singh < >

 

Alexander III of Macedonia, in his belief that it was his destiny to conquer and rule the world, caused much destruction and misery.

Its unfortunate that historians and many leaders glorify pillaging, death and destruction, even referring to him as ‘Alexander the Great’.

Aristotle the teacher and guide of Alexander had told him that, in India lived great mystical, intellectual and spiritual super beings called Yogis. He told Alexander if he ever got the opportunity, to go and meet a Yogi, and if possible to even bring one back to Greece for Aristotle to meet.

Upon enquiry, whilst in India, Alexander learnt about the great and wise sage, Yogi Dandini, who dwelled deep in a forest.

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Alexander sent numerous summons to Yogi Dandini, which he promptly ignored.
Alexander who could strike fear in the hearts and minds of great armies and kings was intrigued. He became desperate to meet this being who assigned no importance to Alexander.

Alexander next sent messengers with lavish gifts and an invitation to Yogi Dandini for a discourse and discussion on philosophy. Yogi Dandini, politely declined both the gifts and the invitation.

Though angry Alexander, a pupil of the great philosopher and teacher Aristotle, knew very well that, great beings could rarely be lured or coerced.

Finally Alexander sent his helmsman, Onesicritus, to invite Dandini, who lavished praise and gifts on Yogi Dandini. When Yogi Dandini declined his invitation and gifts, Onesicritus threatened the yogi. He said that Alexander had ordered the beheading of the yogi should the orders of the emperor be disobeyed.

Yogi Dandini remained unperturbed, stating, he had no fear of death. Onesicritus couldn’t muster the courage to kill the Yogi, and, instead, paid his respects to the Yogi and went back to report the incident to Alexander.

Livid at being rejected by a naked forest-dweller, Alexander decided to go to Dandini himself. With his Marshal and a large entourage, Alexander made his way deep into the forest.
Even though he experienced the powerful aura of Yogi Dandini, Alexander grew furious when the sage did not get up to welcome him.

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Sadhu with activated Anjana Chakra m2v

Yogi ji

“How dared you refuse my gifts?” Alexander demanded.
“They were smeared in blood.” replied the yogi.

The chilling truth, and fearless conviction in Dandini’s voice, rattled Alexander. Alexander could not let his men overhear the embarrassing exchange, so he ordered them to move some distance away.

Then, when he was alone with Yogi Dandini, Alexander dismounted from his horse, walked towards the sitting sage and menacingly stood over him.

“Do you know who I am?” Alexander roared.
“I don’t think even you know, who you are.” replied Yogi Dandini.

Alexander felt deeply insulted. He drew his sword and swung it at Yogi Dandini, stopping just before it struck the Yogi’s neck.

“I am Alexander, the world conqueror,” he shouted. “You are sitting on my land. Submit or I’ll kill y­ou … ”

“Your land?” Dandini chuckled as he cut him off. “The land belongs to no one, O King!”
“Before you, there were others who claimed it as theirs,” he continued. “After you, there’ll be others who will say it’s theirs.

All creation belongs to the Creator alone, Alexander. And no one has any right to destroy what they haven’t created. You have blood on your hands,

O Emperor! You may have a temporary claim on the land, but you have permanent scars on your soul.”

Clearing his throat, a flustered and uncomfortable Alexander lowered his sword and adjusted his posture.

“The whole world is mine, Dandini,” Alexander exclaimed. “History will remember me as the mightiest king! My men can die for me!”

“What good is your ambition or their remembrance, O King? You drown yourself in alcohol every evening so you may forget about your crimes and sins. These men who surround you, they are tired of you. You will see it, they’ll give up on you one day, in fact very soon.”

“Besides,” Dandini continued, “what will you do with the world? All you need is two yards. Two yards long and two yards deep. Ultimately that’s all that will belong to you.”

Confused, humbled and defeated, Alexander sheathed his sword, bobbed his head before Yogi Dandini and left.

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Barely a few months had passed when his army mutinied bringing an abrupt end to his campaign in India. Three years later, Alexander died at the age of thirty-three as he tried to return to Greece.

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Readers interested in getting full details of the conversation between the Sage Yogi Dandini and Alexander may refer to the historical account provided in the work, ‘The Legends of Alexander the Great’ by Richard Stoneman

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Written and posted : June 2018 by Gurvinder Singh

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How to Easily Remove Article 370

by Subramanian Swamy

 

(Please share with all the Hindus you know, request them that they demand from the Gov’t to remove Article 370. – Jaya sri Krishna!  – Skanda987)

So many people think that both assembly of J&K and Parliament need approval to abolish for Art370. I think we all are wrong.

 

Anyone who says Art 370 abolition needs Parliament approval is either ignorant of the Constitution or an illiterate. It just needs a Presidential Notification of a Cabinet Resolution.

 

I have sent a Note to PMO along with photocopies of the Constituent Assembly Debates and my legal arguments on why Art 370 can be deleted without Parliament concurrence, and by a Presidential Notification. I want it timed for mid-September.

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From: Vivek Arya < >

सहिष्णुता का कल्पनालोक

बलबीर पुंज, पूर्व राज्यसभा सदस्य

आखिर गत चार वर्षों में ऐसा क्या हुआ है जिसने चर्च को इतना बेचैन कर दिया है? क्या पर्दे के पीछे कुछ और ही खेल है?
पहले दिल्ली के प्रधान पादरी अनिल काउटो तो अब गोवा के आर्कबिशप फिलिप नेरी फेराओ द्वारा ईसाई समाज को लिखा पत्र चर्चा में है। इन चिट्ठियों के अनुसार देश में बहुलतावाद, लोकतंत्र और संविधान खतरे में है। दलितों- अल्पसंख्यकों पर अत्याचार निरंतर बढ़ रहे हैं। चर्च ने स्वयं को मानवाधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया है। आखिर गत चार वर्षों में ऐसा क्या हुआ है या क्या हो रहा है जिसने चर्च को बेचैन कर दिया है? क्या पर्दे के पीछे कुछ और ही खेल है या फिर अपने वास्तविक मंतव्य को लच्छेदार बातों के अनावरण में छिपाने का प्रयास हो रहा है? 2018 की शुरुआत में पुणे स्थित भीमा-कोरेगांव में हुई जातीय हिंसा को लेकर जो हालिया खुलासा हुआ है वह भारत में देशविरोधी ताकतों की कुंठा और बौखलाहट को दर्शाता है। प्रारंभ में इर्स हिंसा के लिए सीधे तौर पर्र हिंदुत्व से जुड़े संगठनों को जिम्मेदार ठहराया गया, फिर भाजपा- संघ को कलंकित करने का प्रयास हुआ। अब जांच में पता चला है कि नक्सलियों ने ही पूर्वनियोजित योजना के तहत हिंसा भड़काई थी और वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश भी रच रहे थे।

किसी भी संप्रभु देश में सख्त कानून व्यवस्था होने के बाद भी आपराधिक मामले सामने आते हैं और भारत भी इसका अपवाद नहीं है। अपने देश में जब ऐसी कोई आपराधिक घटना सामने आती है जिसमें दलित, ईसाई और मुस्लिम पीड़ित होते है तब उस पर कानूनी कार्रवाई की जाती है। आखिर इसके बावजूद चर्च आगामी चुनावों से पहले एक व्यक्ति/पार्टी विशेष को ध्यान में रखकर राजनीतिक रूप से सक्रिय हो क्यों हो गया? उसे इसके लिए किसने प्रेरित किया? भारत में प्रधान-पादरियों की नियुक्ति पोप करते है और उनकी जवाबदेही केवल वेटिकन सिटी के प्रति होती है। इटली के रोम में स्थित वेटिकन स्वयं को संप्रभु और स्वतंत्र इकाई मानता है। कैथोलिक चर्च का घोषित एजेंडा, ‘जिस प्रकार पहली सहस्नाब्दी में यूरोप और दूसरी में अमेरिका अफ्रीका को ईसाई बनाना था उसी तरह तीसरी सहस्नाब्दी में एशिया का ईसाइकरण करना है।’ इस पृष्ठभूमि में एशिया में ईसाइयों की स्थिति देखें : औपनिवेशिक-काल से चर्च को भारत में जैसी सुविधा प्राप्त है क्या वैसी ही चीन, पाकिस्तान, ईरान, इराक, बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसे एशियाई देशों में है, जहां ईसाई सहित अन्य अल्पसंख्यक दोयम दर्जे के नागरिक हैं? क्या वर्तमान विवाद तीसरी सहस्नाब्दी के निर्धारित लक्ष्यों को पाने से संबंधित तो नहीं? भारत की कालजयी सनातनी परंपरा सदियों से भय, लालच और छल की शिकार रही है। इस रूग्ण चिंतन का संज्ञान गांधीजी ने अपने जीवनकाल में अनेक बार लिया। स्वतंत्रता के बाद ईसाई मिशनरियों और चर्चों की अनैतिक गतिविधियों को लेकर अप्रैल 1955 में मध्य प्रदेश की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने पूर्व न्यायाधीश भवानी शंकर नियोगी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था जिसने मतांतरण पर कानूनी रूप से प्रतिबंध की अनुशंसा की थी।

अपनी चिट्ठियों में चर्च लोकतंत्र, पंथनिरपेक्षता और बहुलतावाद की दुहाई देकर भारत के संविधान को खतरे में बता रहे हैं। क्या 1947 में स्वतंत्रता और आपातकाल के समय संविधान में 42वें संशोधन के अंतर्गत ‘सेक्युलर’ शब्द जोड़ने से पहले-भारत पंथनिरपेक्ष नहीं था? भारत आज पंथनिरपेक्ष और सहिष्णु है तो वह अपनी कालजयी सनातन संस्कृति और बहुलतावादी दर्शन के कारण है जिसने ‘एक सत विप्रा: बहुधा वदंति’ की प्रेरणा दी और सारे संसार को एक परिवार (वसुधैव कुटुंबकम) माना।

भारत में चर्च का क्या इतिहास रहा है? प्राचीनकाल में अपने उद्गम स्थान पर प्रताड़ना के शिकार हुए जो लोग भारतीय तटों पर पहुंचे उनमें यहूदियों के बाद सीरियाई ईसाई भी शामिल थे जो कैथोलिक चर्च की प्रताड़ना के साक्षी थे। भारतीय परंपरा के अनुरूप इन सभी का तत्कालीन स्थानीय हिंदू शासकों और जनता ने न केवल स्वागत किया, बल्कि सारी सुविधाएं देते हुए उन्हें उनकी रीति-रिवाजों के अंतर्गत पूजा और जीवन-यापन का अवसर भी दिया। कई शताब्दियों की सुख-शांति के बाद स्थिति तब बिगड़ी जब रोमन कैथोलिक चर्च का पुर्तगाली साम्राज्यवाद के साथ भारत में प्रवेश हुआ। 16वीं-17वीं शताब्दी में जब उत्तर भारत क्रूर मुगल शासक औरंगजेब के आतंक का शिकार हो रहा था तब उसी समय दक्षिण में फ्रांसिस जेवियर ‘गोवा इंक्विजीशन’ की भयावह पटकथा तैयार कर रहे थे। ईसाइयत के प्रचार के लिए 1541-42 में भारत पहुंचे जेवियर ने पाया कि गैर-ईसाइयों की भांति मतांतरित ईसाई अपनी मूल परंपराओं और पूजा-पद्धति का अनुसरण कर रहे थे और ईसाइयत (रोमन कैथोलिक स्वरूप) के प्रति गंभीर नहीं थे। उन्होंने पुर्तगाली शासक किंग जॉन-तृतीय को पत्र लिखकर गोवा में ‘इंक्वीजीशन’ प्रारंभ करने का अनुरोध किया जिसके स्वीकृत होने पर हजारों गैर-ईसाइयों को अमानवीय यातनाएं सहनी पड़ी जिसमें लोगों की जीभ काटना और चमड़ी उतारना तक शामिल था। हिंदुओं के सभी रीति-रिवाजों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। फ्रांसिस जेवियर को 1662 में तत्कालीन पोप ग्रेगरी-15 ने ईसाइयत के प्रचार- प्रसार हेतु ‘संत’ की उपाधि प्रदान की।

यदि आज भारत में चर्चों को असुरक्षा और खतरे का अनुभव हो रहा है तो उसका मुख्य कारण वह विदेशी चंदा है जो मई 2014 से पहले उन्हें और उनके समर्थित गैर- सरकारी संगठनों को आसानी से पहुंच रहा था, जिसका अधिकांश उपयोग वे राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में करते थे। मोदी सरकार विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम का उल्लंघन करने वाले 18 हजार 868 स्वयंसेवी संगठनों का पंजीकरण रद कर चुकी है। इसके चलते वित्त वर्ष 2016- 17 में गैर-सरकारी संगठनों को विदेश से प्राप्त राशि 6,499 करोड़ रुपये रही, जबकि 2015-16 में 18 हजार करोड़ रुपये थी। ऐसे संगठनों का काला चेहरा समय-समय पर सामने आता रहा है। जब दुनिया दावोस के आर्थिक मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सुन रही थी तब ब्रिटिश गैर-सरकारी संगठन ऑक्सफैम ने घोषित एजेंडे के तहत देश में आर्थिक असमानता संबंधी एक रिपोर्ट सार्वजनिक की थी। लगभग उसी समय ऑक्सफैम के अधिकारियों द्वारा भूकंप प्रभावित हैती में आर्थिक सहायता के बदले महिलाओं से यौन-संबंध बनाने का खुलासा हुआ। यदि भारत की बहुलतावादी संस्कृति को किसी से खतरा है तो वह नक्सलवाद, इस्लामी कट्टरता, विदेशी हितों की पूर्ति करने वाले तथाकथित पर्यावरणविद् और वह रूग्ण विचारधारा है जिनका जन्म इस भूखंड से बाहर हुआ। चर्च का इन शक्तियों से कैसा संबंध है, यह जांच का विषय है।

साभार-दैनिक जागरण, दैनिक हिंदी समाचार पत्र

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From: Vishvapriya Vedanuragi < >

लघुकथा
एक माँ – एक बेटा 
गली में कुतिया ने नौ बच्चे दिए 
बेटा माँ से बोला :- माँ ! एक पिल्ले को मैं घर लेकर आऊं ?
माँ बोली :- नहीं बेटा ! 
बेटे ने पूछा :-क्यों?
माँ :- यदि तुमको कोई मेरे पास से अपने घर ले जाये तो मुझे कैसा लगेगा ?
बेटा :- हम्म ………ठीक है 
(थोड़ी देर बाद)
लेकिन माँ ! कुतिया के पास तो कई हैं 
माँ :- लेकिन मेरे पास तो एक ही है 
बेटा :- तो फिर हम “कई” क्यों नहीं ले आते 
माँ :- निरुत्तर , असहाय 
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(कथा-सार :- कृपया यदि अब भी अवसर है तो एक से अधिक सन्तान करें,
एक सेना में (शस्त्र) के लिए दें, एक धर्म कार्य में (शास्त्र) के लिए दें 
और  एक अपने पास रखें 
तब ही जा कर वेद मन्त्र यजुर्वेद 20/25 सफल होगा |)

यजुर्वेद 20/25 :-
यत्र ब्रह्म च क्षत्रं च सम्यञ्चौ चरतः सह |
तं लोकं पुण्यं प्रज्ञेषं यत्र देवा: सहाग्निना || 
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जिस राष्ट्र/समाज में ब्रह्म-शक्ति (ज्ञान/ब्राह्मण)और क्षत्र-शक्ति (बल/क्षत्रिय) दोनों समन्वित सुसंगठित हो, एक साथ चलती हों उसी राष्ट्र/समाज में पुण्यलोक = सुराष्ट्र व दर्शनीय जनसमाज निर्मित होता है | और जहाँ विद्वान अधिकारी शासकगण अपने नायक के साथ एकमत हो व्यवहार करते हैं |

सादर धन्यवाद
विदुषामनुचर 
विश्वप्रिय वेदानुरागी

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