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Archive for the ‘Articles’ Category

From: Pramod Agrawal < >

मुगलों के हरम की औलाद को हरामजादा कहा जाता है।

 

शाहजहाँ के हरम में ८००० रखैलें थीं जो उसे उसके पिता जहाँगीर से विरासत में मिली थी। उसने बाप की सम्पत्ति को और बढ़ाया। उसने हरम की महिलाओं की व्यापक छाँट की तथा बुढ़ियाओं को भगा कर और अन्य हिन्दू परिवारों से बलात लाकर हरम को बढ़ाता ही रहा।” (अकबर दी ग्रेट मुगल : वी स्मिथ, पृष्ठ ३५९)

 

कहते हैं कि उन्हीं भगायी गयी महिलाओं से दिल्ली का रेडलाइट एरिया जी.बी. रोड गुलजार हुआ था और वहाँ इस धंधे की शुरूआत हुई थी। जबरन अगवा की हुई हिन्दू महिलाओं की यौन-गुलामी और यौन व्यापार को शाहजहाँ प्रश्रय देता था, और अक्सर अपने मंत्रियों और सम्बन्धियों को पुरस्कार स्वरूप अनेकों हिन्दू महिलाओं को उपहार में दिया करता था।

यह नर पशु,यौनाचार के प्रति इतना आकर्षित और उत्साही था,कि हिन्दू महिलाओं का मीना बाजार लगाया करता था, यहाँ तक कि अपने महल में भी।

 

सुप्रसिद्ध यूरोपीय यात्री फ्रांकोइस बर्नियर ने इस विषय में टिप्पणी की थी कि, ”महल में बार-बार लगने वाले मीना बाजार,

जहाँ अगवा कर लाई हुई सैकड़ों हिन्दू महिलाओं का, क्रय-विक्रय हुआ करता था,राज्य द्वारा बड़ी संख्या में नाचने वाली लड़कियों की व्यवस्था,और नपुसंक बनाये गये सैकड़ों लड़कों की हरमों में उपस्थिती, शाहजहाँ की अनंत वासना के समाधान के लिए ही थी। (टे्रविल्स इन दी मुगल ऐम्पायर-फ्रान्कोइसबर्नियर :पुनः लिखित वी. स्मिथ, औक्सफोर्ड १९३४)

 

**शाहजहाँ को प्रेम की मिसाल के रूप पेश किया जाता रहा है और किया भी क्यों न जाए।

 

८००० औरतों को अपने हरम में रखने वाला अगर किसी एक में ज्यादा रुचि दिखाए तो वो उसका प्यार ही कहा जाएगा।आप यह जानकर हैरान हो जायेंगे कि मुमताज का नाम मुमताज महल था ही नहीं बल्कि उसका असली नाम “अर्जुमंद-बानो-बेगम” था। और तो और जिस शाहजहाँ और मुमताज के प्यार की इतनी डींगे हांकी जाती है वो शाहजहाँ की ना तो पहली पत्नी थी ना ही आखिरी । मुमताज शाहजहाँ की सात बीबियों में चौथी थी। इसका मतलब है कि शाहजहाँ ने मुमताज से पहले 3 शादियाँ कर रखी थी और,मुमताज से शादी करने के बाद भी उसका मन नहीं भरा तथा उसके बाद भी उस ने 3 शादियाँ और की यहाँ तक कि मुमताज के मरने के एक हफ्ते के अन्दर ही उसकी बहन फरजाना से शादी कर ली थी। जिसे उसने रखैल बना कर रखा हुआ था जिससे शादी करने से पहले ही शाहजहाँ को एक बेटा भी था।

अगर शाहजहाँ को मुमताज से इतना ही प्यार था तो मुमताज से शादी के बाद भी शाहजहाँ ने 3 और शादियाँ क्यों की….?????

अब आप यह भी जान लो कि शाहजहाँ की सातों बीबियों में सबसे सुन्दर मुमताज नहीं बल्कि इशरत बानो थी जो कि उसकी पहली पत्नी थी । उस से भी घिनौना तथ्य यह है कि शाहजहाँ से शादी करते समय मुमताज कोई कुंवारी लड़की

नहीं थी बल्कि वो शादीशुदा थी और,उसका पति शाहजहाँ की सेना में सूबेदार था जिसका नाम “शेर अफगान खान” था।शाहजहाँ ने शेर अफगान खान की हत्या कर मुमताज से शादी की थी। गौर करने लायक बात यह भी है कि ३८ वर्षीय

मुमताज की मौत कोई बीमारी या एक्सीडेंट से नहीं बल्कि चौदहवें बच्चे को जन्म देने के दौरान अत्यधिक कमजोरी के कारण हुई थी। यानी शाहजहाँ ने उसे बच्चे पैदा करने की मशीन ही नहीं बल्कि फैक्ट्री बनाकर मार डाला। **शाहजहाँ कामुकता के लिए इतना कुख्यात था कि कई इतिहासकारों ने उसे उसकी अपनी सगी बेटी जहाँआरा के साथ स्वयं सम्भोग करने का दोषी कहा है।

 

शाहजहाँ और मुमताज महल की बड़ी बेटी जहाँआरा बिल्कुल अपनी माँ की तरह लगती थी। इसीलिए मुमताज की मृत्यु के बाद उसकी याद में लम्पट शाहजहाँ ने अपनी ही बेटी जहाँआरा को फंसाकर भोगना शुरू कर दिया था। जहाँआरा को शाहजहाँ इतना प्यार करता था कि उसने उसका निकाह तक होने न दिया। बाप-बेटी के इस प्यार को देखकर जब महल में

चर्चा शुरू हुई,तो मुल्ला-मौलवियों की एक बैठक बुलाई गयी और उन्होंने इस पाप को जायज ठहराने के लिए एक हदीस का उद्धरण दिया और कहा कि – “माली को अपने द्वारा लगाये पेड़ का फल खाने का हक़ है”।

(Francois Bernier wrote, ” Shah Jahan used to have regular sex with his eldest daughter Jahan Ara. To defend himself,Shah Jahan used to say that, it was the privilege of a planter to taste the fruit of the tree he had planted.”)

 

**इतना ही नहीं जहाँआरा के किसी भी आशिक को वह उसके पास फटकने नहीं देता था। कहा जाता है की एकबार जहाँआरा जब अपने एक आशिक के साथ इश्क लड़ा रही थी तो शाहजहाँ आ गया जिससे डरकर वह हरम के तंदूर में छिप गया, शाहजहाँ नेतंदूर में आग लगवा दी और उसे जिन्दा जला दिया।

 

**दरअसल अकबर ने यह नियम बना दिया था कि मुगलिया खानदान की बेटियों की शादी नहीं होगी।

इतिहासकार इसके लिए कई कारण बताते हैं। इसका परिणाम यह होता था कि मुग़लखानदान की लड़कियां अपने जिस्मानी भूख मिटाने के लिए अवैध तरीके से दरबारी,नौकर के साथ साथ, रिश्तेदार यहाँ तक की सगे सम्बन्धियों का भी सहारा लेती थी।

 

**जहाँआरा अपने लम्पट बाप के लिए लड़कियाँ भी फंसाकर लाती थी। जहाँआरा की मदद से शाहजहाँ ने मुमताज के भाई शाइस्ता खान की बीबी से कई बार बलात्कार किया था।

**शाहजहाँ के राजज्योतिष की 13 वर्षीय ब्राह्मण लडकी को जहाँआरा ने अपने महल में बुलाकर धोखे से नशा करा बाप के हवाले कर दिया था जिससे शाहजहाँ ने 58 वें वर्ष में उस 13 बर्ष की ब्राह्मण कन्या से निकाह किया था। बाद में इसी ब्राहम्ण कन्या ने शाहजहाँ के कैद होने के बाद औरंगजेब से बचने और एक बार फिर से हवस की सामग्री बनने से खुद को बचाने के लिए अपने ही हाथों अपने चेहरे पर तेजाब डाल लिया था। **शाहजहाँ शेखी मारा करता था कि ‘ ‘वह तिमूर

(तैमूरलंग)का वंशज है जो भारत में तलवार और अग्नि लाया था। उस उजबेकिस्तान के जंगली जानवर तिमूर से और

उसकी हिन्दुओं के रक्तपात की उपलब्धि से इतना प्रभावित था कि उसने अपना नाम तिमूरद्वितीय रख लिया

(दी लीगेसी ऑफ मुस्लिम रूल इन इण्डिया-डॉ. के.एस. लाल, १९९२ पृष्ठ- १३२).

 

**बहुत प्रारम्भिक अवस्था से ही शाहजहाँ ने काफिरों (हिन्दुओं) के प्रति युद्ध के लिए साहस व रुचि दिखाई थी।

अलग-अलग इतिहासकारों ने लिखा था कि, ”शहजादे के रूप में ही शाहजहाँ ने फतेहपुर सीकरी पर अधिकार करलिया था और आगरा शहर में हिन्दुओं का भीषण नरसंहार किया था ।

 

**भारत यात्रा पर आये देला वैले,इटली के एक धनी व्यक्ति के अुनसार -शाहजहाँ की सेना ने भयानक बर्बरता का परिचय कराया था। हिन्दू नागरिकों को घोर यातनाओं द्वारा अपने संचित धन को दे देने के लिए विवश किया गया,और अनेकों

उच्च कुल की कुलीन हिन्दू महिलाओं का शील भंग किया गया।” (कीन्स हैण्ड बुक फौर विजिटर्स टू आगरा एण्ड

इट्सनेबरहुड, पृष्ठ २५)

 

**हमारे वामपंथी इतिहासकारों ने शाहजहाँ को एक महान निर्माता के रूप में चित्रित किया है। किन्तु इस मुजाहिद ने अनेकों कला के प्रतीक सुन्दर हिन्दू मन्दिरों और अनेकों हिन्दू भवन निर्माण कला के केन्द्रों का बड़ी लगन और जोश से विध्वंस किया था अब्दुल हमीद ने अपने इतिहास अभिलेख, ‘बादशाहनामामें लिखा था-महामहिम शहंशाह महोदय की सूचना में लाया गया कि हिन्दुओं के एक प्रमुख केन्द्र,बनारस में उनके अब्बा हुजूर के शासनकाल में अनेकों मन्दिरों के

पुनः निर्माण का काम प्रारम्भ हुआ था और काफिर हिन्दू अब उन्हें पूर्ण कर देने के निकट आ पहुँचे हैं।

इस्लाम पंथ के रक्षक,शहंशाह ने आदेश दिया कि बनारस में और उनके सारे राज्य में अन्यत्र सभी

स्थानों पर जिन मन्दिरों का निर्माण कार्य आरम्भ है, उन सभी का विध्वंस कर दिया जाए।

 

**इलाहाबाद प्रदेश से सूचना प्राप्त हो गई कि जिला बनारस के छिहत्तर मन्दिरों का ध्वंस कर दिया गया था।

(बादशाहनामा : अब्दुल हमीद लाहौरी, अनुवाद एलियट और डाउसन, खण्ड VII, पृष्ठ ३६)

 

**हिन्दू मंदिरों को अपवित्र करने और उन्हें ध्वस्त करनेकी प्रथा ने शाहजहाँ के काल में एक व्यवस्थित विकराल रूप धारण कर लिया था। (मध्यकालीन भारत – हरीश्चंद्र वर्मा – पेज-१४१)

 

*”कश्मीर से लौटते समय १६३२ में शाहजहाँ को बताया गया कि अनेकों मुस्लिम बनायी गयी महिलायें फिर से हिन्दू हो गईं हैं और उन्होंने हिन्दू परिवारों में शादी कर ली है। शहंशाह के आदेश पर इन सभी हिन्दुओं को बन्दी बना लिया गया।

प्रथम उन सभी पर इतना आर्थिक दण्ड थोपा गया कि उनमें से कोई भुगतान नहीं कर सका। तब इस्लाम स्वीकार कर लेने और मृत्यु में से एक को चुन लेने का विकल्प दिया गया। जिन्होनें धर्मान्तरण स्वीकार नहीं किया, उन सभी पुरूषों का सर काट दिया गया। लगभग चार हजार पाँच सौं महिलाओं को बलात् मुसलमान बना लिया गया और उन्हें सिपहसालारों, अफसरों और शहंशाह के नजदीकी लोगों और रिश्तेदारों के हरम में भेज दिया गया।” (हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ दी इण्डियन पीपुल : आर.सी. मजूमदार, भारतीय विद्या भवन,पृष्ठ३१२)

 

* १६५७ में शाहजहाँ बीमार पड़ा और उसी के बेटे औरंगजेब ने उसे उसकी रखैल जहाँआरा के साथ आगरा के किले में बंद कर दिया। परन्तु औरंगजेब मे एक आदर्श बेटे का भी फर्ज निभाया और अपने बाप की कामुकता को समझते हुए उसे अपने

साथ ४० रखैलें (शाही वेश्याएँ) रखने की इजाजत दे दी। दिल्ली आकर उसने बाप के हजारों रखैलों में से कुछ गिनी चुनी औरतों को अपने हरम में डालकर बाकी सभी को उसने किले से बाहर निकाल दिया। उन हजारों महिलाओं को भी दिल्ली के उसी हिस्से में पनाह मिली जिसे आज दिल्ली का रेड लाईट एरिया जीबी रोड कहा जाता है। जो उसके अब्बा शाहजहाँ की मेहरबानी से ही बसा और गुलजार हुआ था ।

 

***शाहजहाँ की मृत्यु आगरे के किले में ही २२ जनवरी १६६६ ईस्वी में ७४ साल की उम्र में द हिस्ट्री चैन शाहजहाँ की मृत्यु आगरे के किले में ही २२ जनवरी १६६६ ईस्वी में ७४ साल की उम्र में द हिस्ट्री चैनल के अनुसार अत्यधिक कमोत्तेजक दवाएँ खा लेने का कारण हुई थी। यानी जिन्दगी के आखिरी वक्त तक वो अय्याशी ही करता रहा था।

** अब आप खुद ही सोचें कि क्यों ऐसे बदचलन और दुश्चरित्र इंसान को प्यार की निशानी समझा कर महानबताया जाता है…… ????? क्या ऐसा बदचलन इंसान कभी किसी से प्यार कर सकता है….?????

क्या ऐसे वहशी और क्रूर व्यक्ति की अय्याशी की कसमेंखाकर लोग अपने प्यार को बे-इज्जत नही करते हैं ??

 

दरअसल ताजमहल और प्यार की कहानी इसीलिए गढ़ी गयी है कि लोगों को गुमराह किया जा सके और लोगों खास कर हिन्दुओं से छुपायी जा सके कि ताजमहल कोई प्यार की निशानी नहीं बल्कि महाराज जय सिंह द्वारा बनवाया गया भगवान् शिव का मंदिर””तेजो महालय”” है….! और जिसे प्रमाणित करने के लिए डा० सुब्रहमण्यम स्वामी आज भी सुप्रीम कोर्ट में सत्य की लड़ाई लड़ रहे हैं।

 

** असलियत में मुगल इस देश में धर्मान्तरण, लूट-खसोट और अय्याशी ही करते रहे परन्तु नेहरू के आदेश पर हमारे इतिहासकारों नें इन्हें जबरदस्ती महान बनाया। और ये सब हुआ झूठी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर। #साभार_समाधान blogspot, ना जाने किस मुंह से सेकुलर कहते हैं कि हिन्दू मुस्लिम भाई भाई या ईश्वर अल्ला तेरो नाम?

 

सदा सर्वदा सुमंगल,

हर हर महादेव,

जय भवानी,

जय श्री राम.

 

 

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From: Pramod Agrawal < >

शुर्णपंखा और इस्लाम ।

 

रामायण में सभी राक्षसों का वध हुआ था। लेकिन शूर्पनखा का वध नहीं हुआ था .उसकी नाक और कान काट कर छोड़ दिया गया था । वह कपडे से अपने चेहरे को छुपा कर रहती थी ।

 

रावण के मर जाने के बाद वह अपने पति के साथ शुक्राचार्य के पास गयी और जंगल में उनके आश्रम में रहने लगी ।

राक्षसों का वंश ख़त्म न हो इसलिए, शुक्राचार्य ने शिव जी की आराधना की ।

 

शिव जी ने अपना स्वरुप शिवलिंग शुक्राचार्य को दे कर कहा की जिस दिन कोई “वैष्णव” इस पर गंगा जल चढ़ा देगा उस दिन राक्षसों का नाश हो जायेगा । उस आत्म लिंग को शुक्राचार्य ने वैष्णव मतलब हिन्दुओं से दूर रेगिस्तान में स्थापित किया जो आज अरब में “मक्का मदीना” में है । शूर्पनखा जो उस समय चेहरा ढक कर रखती थी वो परंपरा को उसके बच्चो ने पूरा निभाया ओर आज भी मुस्लिम औरतें चेहरा ढकी रहती हैं।

 

शूर्पनखा के वंशज आज मुसलमान कहलाते हैं । क्यूँकी शुक्राचार्य ने इनको जीवन दान दिया , इस लिए ये शुक्रवार को विशेष महत्त्व देते हैं ।

 

पूरी जानकारी तथ्यों पर आधारित सच है।⛳

 

जानिए इस्लाम कैसे पैदा हुआ..

 

असल में इस्लाम कोई धर्म नहीं है .एक मजहब है.. दिनचर्या है.. मजहब का मतलब अपने कबीलों के गिरोह को बढ़ाना..

यह बात सब जानते है की मोहम्मदी मूलरूप से अरब वासी है ।

 

अरब देशो में सिर्फ रेगिस्तान पाया जाता है.वहां जंगल नहीं है, पेड़ नहीं है. इसीलिए वहां मरने के बाद जलाने के लिए लकड़ी न होने के कारण ज़मीन में दफ़न कर दिया जाता था.

 

रेगिस्तान में हरीयाली नहीं होती.. ऐसे में रेगिस्तान में हरा चटक रंग देखकर इंसान चला आता की यहाँ जीवन है ओर ये हरा रंग सूचक का काम करता था.

 

अरब देशो में लोग रेगिस्तान में तेज़ धुप में सफ़र करते थे, इसीलिए वहां के लोग सिर को ढकने के लिए टोपी पहनते थे।

जिससे की लोग बीमार न पड़े.

 

अब रेगिस्तान में खेत तो नहीं थे, न फल, तो खाने के लिए वहा अनाज नहीं होता था. इसीलिए वहा के लोग जानवरों को काट कर खाते थे. और अपनी भूख मिटाने के लिए इसे क़ुर्बानी का नाम दिया गया।

 

रेगिस्तान में पानी की बहुत कमी रहती थी, इसीलिए मुत्रमार्ग साफ करने में पानी बर्बाद न हो जाये इसीलिए लोग खतना कराते थे।

 

सब लोग एक ही कबिले के खानाबदोश होते थे इसलिए आपस में भाई बहन ही निकाह कर लेते थे।

 

रेगिस्तान में मिट्टी मिलती नहीं थी मुर्ती बनाने को इसलिए मुर्ती पुजा नहीं करते थे| खानाबदोश थे , एक जगह से दुसरी जगह जाना पड़ता था इसलिए कम बर्तन रखते थे और एक थाली नें पांच लोग खाते थे|

 

कबीले की अधिक से अधिक संख्या बढ़े इसलिए हर एक को चार बीवी रखने की इज़ाजत दी जाती थी

..

अब समझे इस्लाम कोई धर्म नहीं मात्र एक कबीला है.. और इसके नियम असल में इनकी दिनचर्या है ।

 

नोट : पोस्ट पढ़के इसके बारे में सोचो।

 

#इस्लाम_की_सच्चाई

 

अगर हर हिँदू माँ-बाप अपने बच्चों को बताए कि अजमेर दरगाह वाले ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती ने किस तरह इस्लाम कबूल ना करने पर पृथ्वीराज चौहान की पत्नी संयोगिता को मुस्लिम सैनिकों के बीच बलात्कार करने के लिए निर्वस्त्र करके फेँक दिया था ।

 

और फिर किस तरह पृथ्वीराज चौहान की वीर पुत्रियों ने आत्मघाती बनकर मोइनुद्दीन चिश्ती को 72 हूरों के पास भेजा था।

तो शायद ही कोई हिँदू उस मुल्ले की कब्र पर माथा पटकने जाए .

 

“अजमेर के ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती को ९० लाख हिंदुओं को इस्लाम में लाने का गौरव प्राप्त है ।

मोइनुद्दीन चिश्ती ने ही मोहम्मद गोरी को भारत लूटने के लिए उकसाया और आमंत्रित किया था…

 

(सन्दर्भ – उर्दू अखबार “पाक एक्सप्रेस, न्यूयार्क १४ मई २०१२).

 

 

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From: Srinandan < >

Namaste,

In this edition of the Vedic Friends Association Monthly Journal I have included the article by our VFA member Subhash Kak on “How I Discovered Vedic Science.” This is one of the chapters in our VFA book called “Vedic Culture: The Difference it can Make in Your Life.” I always found this article very interesting since I’m always fascinated by how people became influenced by the Vedic tradition. However, Subhash Kak’s story is quite deep and scientific, which makes it even more intriguing.

So, I hope you find this interesting as I do, and until next time,

All the best and Hari Om,

Stephen Knapp

= = =

How I Discovered Vedic Science

Subhash Kak

My father was a serious yogic apprentice for several years before he married, so as a boy I heard many inspiring stories about the spiritual side of life. Our home was a magnet to swamis and householders on their spiritual path of devotion to Vishnu, Shiva, or Shakti. We would question the visitors, who would provide explanations for the more difficult passages in the Bhagavad Gita and the Upanishads. I was impressed but I don’t think I fully understood all that I was told.

After school and college in various places in Jammu and Kashmir, I went to the Indian Institute of Technology (IIT) in Delhi for further studies in science and engineering. It was not before long that I became acutely aware of the limitations of the mainstream paradigm of science. For example, in the physical sciences, the past determines the future completely, but on the other hand, freedom of action is taken for granted at the level of the individual. Our lives are strung, so to speak, between these two extreme views. We make private adjustments to this situation, acknowledging that there are larger forces that define history at the personal level, and somehow our freedom matters.

I had also started studying mystical experience, and this led me to meetings with Gopi Krishna, who had become internationally famous for his yogic autobiography, Kundalini. Subsequently, I got to know many leading mystics and scientists. Meanwhile, I had begun teaching at IIT Delhi, where I continued with my meditations on science and self. It was clear that science must confront the mystery of awareness. Why is it to be found in the brain-machine but not in the computer? In what sense is the consciousness of animals different from that of humans? Although our bodies change with time, why do we feel that our personhood remains unchanged? Many more such questions may be asked.

After I came to the United States in 1979, I decided to go beyond information and look at the problem of self and consciousness from the points of view of physics and neuroscience. Meanwhile, my work on the history of Indian science led me to study Vedic texts in the original and not just depend on old commentaries, which I soon realized were not reliable.

My objective was to go beyond philosophy, in which there has been an unbroken tradition and for which one can find reasonable expositions in English and other languages, and explore the heart of Vedic knowledge. I began with an examination of the Vedic altar ritual, especially Agnichayana and Ashvamedha which were the grandest sacrifices. My discoveries were serendipitous. Perhaps they emerged out of my own spiritual advancement.

I don’t wish to go into the arcane details of my findings, for which I would recommend my books such as the Astronomical Code of the Rgveda and the Architecture of Knowledge to the reader. Suffice it to say that Vedic ritual represented the astronomical knowledge of its times in the altar constructions and by virtue of the equation that the macrocosm is mirrored in the microcosm, this also was a representation of the spiritual self.

This explains why the number 108, which is the average distance the sun and the moon are away from the earth in terms of their respective diameters (the diameter of the sun is also 108 times the earth’s diameter), shows up in unexpected situations in the Vedic lore. For example, the Natya Shastra claims that there exist 108 basic dance poses, the Hindu rosary has 108 beads, and God and Goddess have 108 names.

The Vedas recognize that the outer reality follows laws. They assert that there are two sciences: the lower, concerning the outer reality; and the higher, concerning the experiencing self. Since the self cannot be associated with any object, therefore one cannot have a multiplicity of it. But to speak of a self that is single invites the postulation of other selves, hence it is claimed that this self is non-dual. It transcends physical extension and time.

Ordinary language cannot describe the mystery, which is why formal descriptions are contradictory or paradoxical. The skeptic might say that all this sounds good and it may even be considered inspirational, but why should one take it to be the truth and not just an arbitrary belief system? The Vedas claim the proof of this science is the reality that one can obtain knowledge of the outer reality (a projection of the transcendent Brahman or Krishna or Shiva or Devi) by means of meditation.

There are at least three numerical values in the Vedic texts that support the view that knowledge is an uncovering of the potential within. They are:

  • The age of the universe: 8.64 billion years in the current cycle, that is of the same order of magnitude as current estimates. This should be contrasted with the biblical view that the universe was created in 4004 BC.
  • The speed of light: 4,404 yojanas in a nimesha found in manuscripts that are over 600 years old. This figure is almost exactly the correct value of 186,000 miles per second. Note that the modern value was found only over a hundred years ago, and even Newton thought its speed was infinite.
  • The number of Species on earth: Vedic thought conceives of 8.4 million species, which is impressive, considering that modern authorities (such as Graur and Li in their Fundamentals of Molecular Evolution, page 436) estimate the number of extant species to be 4.5 to 10 million.

One may look at these numbers as coincidences, but one is boggled by the odds against that view. On the other hand, the Vedas speak of rishis whose insight is so extraordinary that they can obtain knowledge from meditation alone. Of course, this intuition can only be expressed in terms of known linguistic associations, that is, in terms of concepts already known.

 

SURPRISING IDEAS IN THE VEDIC TEXTS

It was Herodotus who first spoke of the idea of the wonders of the ancient world. He was, of course, talking only of monumental art. There is a list of the wonders from the Greek world that was compiled in the Middle Ages. This list has the great pyramid of Giza, the hanging gardens of Babylon, the statue of Zeus at Olympia, the temple of Artemis at Ephesus, the mausoleum at Halicarnassus, the colossus of Rhodes, and the lighthouse of Alexandria. Only one of these seven survives.

There are other lists too that are not Greek-centric. We have marvels of art and architecture from China, Mexico, Europe, Peru, Iran, India, Indonesia, Cambodia, Sri Lanka, and other countries. Not all of these marvels are in a good state of repair. Some are under the threat of destruction. Three of the most magnificent creations were lost in Afghanistan just recently.

But here I don’t wish to speak of wonders of stone and metal. Rather, I wish to propose a list of the ‘Seven Wonders of the Ancient Mind’. These are revolutionary and astonishing ideas that have had a lasting influence on the world. Not surprisingly, it is hard for us to place these ideas in context. For most of them, we cannot name the originator.

Such lists are subjective, and mine is no exception. I had to leave out many obviously impressive ideas, such as airplanes, space travel, weapons that can destroy the world, embryo transplantation, multiple babies from the same embryo, space travel, and so on–from just the Mahabharata and the Puranas. (Lest I be misunderstood, we are not speaking of real planes, bombs, and biotechnology, but rather of the conception of their possibility.)

The ideas that I chose are perhaps more fundamental than those above that I left out. Ultimately, I used the criterion of not just originality, but continuing relevance and sheer improbability of the thought of it in the ancient world.

Here’s my list of the seven most astonishing ideas:

  1. An Extremely Old Universe:

The idea that the universe is very old is quite startling, when one notes that humanity’s collective memory doesn’t go further than a few thousand years. The universe is taken to go through cycles of creation and destruction. This conception also assumes infinite number of solar systems.

  1. An Atomic World and the Subject/Object Dichotomy:

According to the atomic doctrine of Kanada, there are nine classes of substances: ether, space, and time that are continuous; four elementary substances (or particles) called earth, air, water, and fire that are atomic; and two kinds of mind, one omnipresent and another which is the individual. This system also postulates a subject/object dichotomy, which is a part of the systems of Sankhya and Vedanta as well. In these systems, the conscious subject is separate from the material reality but he is, nevertheless, able to direct its evolution. The atomic doctrine of Kanada is much more interesting than that of Democritus. It is the recognition of the subject/object dichotomy that led to the creation of modern physics.

  1. Relativity of Time and Space:

That space and time need not flow at the same rate for different observers is a pretty revolutionary notion. We encounter it in Puranic stories and in the Yoga Vasishtha. Obviously, we are not speaking here of the mathematical theory of relativity related to an upper limit to the speed of light, yet the consideration of time acting different to different observers is quite remarkable. To see the significance of this idea a couple of thousand years ago, note that modern relativity theory was forced upon scientists a hundred years ago by certain equations related to the transmission of electromagnetic waves. Here’s a passage on anomalous flow of time from the Bhagavata Purana: “Taking his own daughter, Revati, Kakudmi went to Lord Brahma in Brahmaloka, and inquired about a husband for her. When Kakudmi arrived there, Lord Brahma was engaged in hearing musical performances by the Gandharvas and had not a moment to talk with him. Therefore Kakudmi waited, and at the end of the performance he saluted Lord Brahma and made his desire known. After hearing his words, Lord Brahma laughed loudly and said to Kakudmi, ‘O King, all those whom you may have decided within the core of your heart to accept as your son-in-law have passed away in the course of time. Twenty-seven chaturyugas have already passed. Those upon whom you may have decided are now gone, and so are their sons, grandsons and other descendants. You cannot even hear about their names.’”

There are other stories, less dramatic, where an observer returns from a journey to another loka, and finds that people he loves have aged many more decades than he has.

  1. Evolution of Life:

The Puranas have a chapter on creation and the rise of mankind. It is said that man arose at the end of a chain where the beginning was with plants and various kind of animals. Here’s the quote from the Yoga Vasishtha: “I remember that once upon a time there was nothing on this earth, neither trees and plants, nor even mountains. For a period of eleven thousand years the earth was covered by lava. In those days there was neither day nor night below the polar region: for in the rest of the earth neither the sun nor the moon shone. Only one half of the polar region was illumined. Apart from the polar region the rest of the earth was covered with water. And then for a very long time the whole earth was covered with forests, except the polar region. Then there arose great mountains, but without any human inhabitants. For a period of ten thousand years the earth was covered with the corpses of the asuras who roamed the world.”

Vedic evolution is not at variance with Darwinian evolution but it has a different focus. The urge to evolve into higher forms is taken to be inherent in nature. A system of an evolution from inanimate to progressively higher life is clearly spelled out in the system of Sankhya. At the traditional level this is represented by an ascent of Vishnu through the forms of fish, tortoise, boar, man-lion, the dwarf, finally into man. Aurobindo has argued that this evolution of intelligence is still at work.

  1. A Science of Mind, Yoga:

Yoga psychology, described in the Vedic books and systematized by Patanjali in his Yoga-sutras is a very sophisticated description of the nature of the human mind and its capacity. It makes a distinction between memory, states of awareness, and the fundamental entity of consciousness. It puts the analytical searchlight on mind processes, and it does so with such clarity and originality that it continues to influence people all over the world. Several kinds of yoga are described. They provide a means of mastering the body-mind connection. Indian music and dance also has an underlying yogic basis.

  1. Binary Number System, Zero:

A Binary number system was used by Pingala (450 BC, if we accept the tradition that he was Panini’s brother) to represent meters of songs. The structure of this number system may have helped in the invention of the sign for Zero that, I believe, took place around 50 BC – 50 AD. Without the binary system, the development of computers would be much harder; and without a sign for zero, mathematics would have languished. It is of course true that the binary number system was independently invented by Leibnitz in 1678, but the fact that the rediscovery had to wait almost 2,000 years only emphasizes the originality of Pingala’s idea.

  1. A Complete Grammar, Limitation of Language:

The Ashtadhyayi is a grammar of the Sanskrit language by Dakshiputra Panini (450 BC) that describes the entire language in 4,000 algebraic rules. The structure of this grammar contains a meta-language, meta-rules, and other technical devices that make this system effectively equivalent to the most powerful computing machine. No grammar of similar power has yet been constructed for any other language since. The famous American scholar Leonard Bloomfield called Panini’s achievement as “one of the greatest monuments of human intelligence.”

The other side to the discovery of this grammar is the idea that language (as a formal system) cannot describe reality completely. This limitation of language, the rishis tell us, is why the Truth can only be experienced and never described fully!

 

 

 

 

 

VEDANTA AND PHYSICS

Let me now talk of a savant who followed Vedic ideas and was inspired enough to create a modern theory that has transformed the world. I have in mind the Austrian physicist Erwin Schrödinger, who was arguably one of the two greatest scientists of the 20th century. If Albert Einstein is celebrated for his creation of the theory of relativity, Erwin Schrödinger is equally famous for his creation of Quantum mechanics, the deepest theory at the basis of outer reality. Quantum mechanics went so far beyond the already radical framework of relativity that Einstein refused to accept it to his last day. Without quantum theory, advances in chemistry and electronics that are the foundation of modern technology would have been impossible.

It is a fact that the great European scientists have searched for truth by first abandoning the narrow theologies of the religion into which they were born. But for Schrödinger, Vedic ideas provided the very foundation for his uncompromising search for meaning.

It is not generally known that before he created quantum mechanics he expressed his intention to give form to central ideas of Vedanta which, therefore, has had a role in the birth of quantum mechanics. In 1925, before his revolutionary theory was complete, Erwin Schrödinger wrote:

This life of yours which you are living is not merely a piece of this entire existence, but in a certain sense the “whole”; only this whole is not so constituted that it can be surveyed in one single glance. This, as we know, is what the Brahmins express in that sacred, mystic formula which is yet really so simple and so clear: tat tvam asi, this is you. Or, again, in such words as “I am in the east and the west, I am above and below, I am this entire world.”

Schrödinger’s influential What is Life? (1944) also used Vedic ideas. The book became instantly famous although it was criticized by some for its emphasis on Indian ideas. Francis Crick, the co-discoverer of the DNA code, credited this book for key insights that led him to his revolutionary discovery. According to his biographer Walter Moore, there is a clear continuity between Schrödinger’s understanding of Vedanta and his research:

The unity and continuity of Vedanta are reflected in the unity and continuity of wave mechanics. In 1925, the world view of physics was a model of a great machine composed of separable interacting material particles. During the next few years, Schrödinger and Heisenberg and their followers created a universe based on superimposed inseparable waves of probability amplitudes. This new view would be entirely consistent with the Vedantic concept of All in One.

Schrödinger was born on August 12, 1887. He became a Vedantist, a Hindu, as a result of his studies in his search for truth. He kept a copy of the Hindu scriptures at his bedside. He read books on Vedas, yoga, and Sankhya philosophy, and he reworked them into his own words, and ultimately came to believe them. The Upanishads and the Bhagavad-gita were his favorite scriptures.

According to his biographer Moore, “His system–or that of the Upanishads–is delightful and consistent: the self and the world are one and they are all. He rejected traditional western religious beliefs (Jewish, Christian, and Islamic) not on the basis of any reasoned argument, nor even with an expression of emotional antipathy, for he loved to use religious expressions and metaphors, but simply by saying that they are naive.”

Schrödinger was a professor at several universities in Europe. He was awarded the Nobel Prize in 1933. During the Hitler era he was dismissed from his position for his opposition to the Nazi ideas and he fled to England. For some years he was in Ireland, but after the conclusion of World War II he returned to Vienna where he died in 1961.

Quantum mechanics goes beyond ordinary logic. According to it reality is a superposition of all possibilities which restates Vedic ideas. It is quantum mechanics which explains the mysteries of chemical reactions and of life. In recent years, it has been suggested that the secrets of consciousness have a quantum basis.

In a famous essay on determinism and free will, he expressed very clearly the sense that consciousness is a unity, arguing that this “insight is not new… From the early great Upanishads the recognition Atman = Brahman (the personal self equals the omnipresent, all-comprehending eternal self) was in Indian thought considered, far from being blasphemous, to represent the quintessence of deepest insight into the happenings of the world. The striving of all the scholars of Vedanta was, after having learnt to pronounce with their lips, really to assimilate in their minds this grandest of all thoughts.”

He considered the idea of pluralization of consciousness and the notion of many souls to be naive. He considered the notion of plurality to be a result of deception (maya): “the same illusion is produced by a gallery of mirrors, and in the same way Gaurisankar and Mt. Everest turned out to be the same peak seen from different valleys.”

Schrödinger’s ideas continue to be fundamental in a variety of new fields. The wonders of modern science, such as electronics, biology, chemistry, wouldn’t have been possible without the insights of quantum theory. The possibilities inherent in quantum theory have not all been realized. Schrödinger remains one of the most discussed figures in modern scientific thought. His ideas will continue to inspire science.

Schrödinger was a very complex person. But he had a sense of humor and paradox. He called his dog Atman. Perhaps he did this to honour Yudhishthira whose own dog, an incarnation of cosmic justice (Dharma), accompanied him on his last march to the Himalayas. More likely, he was calling attention to the unity that pervades the web of life.

 

EVOLUTION AND RELIGION

The West has seen a Cold War between science and religion going back to Charles Darwin. His subversive thought that man evolved out of apes had a chilling effect on religion; it freed science from the meddling by church, giving birth to the modern age. Western religion has retreated from one defensive position to another. After a few decades it conceded that animals may have evolved, insisting man was special. By now that the idea of the Garden of Eden with Adam and Eve has been discarded, the fight has shifted from the creation of man to whether God created the first life. The church is certain that life couldn’t have arisen without an intelligent designer.

In the West, evolution theory has led to a loss of the traditional religious belief. If nature could be explained naturalistically, then there is no place for an anthropomorphic God. The church having retired from the academic debate, the main fight in the academy is between those who believe that biology can determine human behavior to a great degree and others who claim that for man biology stands superseded by the world of culture, with its own laws of interaction and evolution.

Western and Indian thought are divided on the argument for design. In the West, thinkers from Aquinas to Newton maintain that nature manifests the design of a preexistent mind or the Creator. This idea helps to define the Westerner’s personal sense of purpose and meaning.

In Indian thought, there is no separation between the Creator (the preexistent mind) and the universe. Consciousness is taken to be the fundamental characteristic of reality out of which material nature and individual minds emerge. Laws govern physical processes, but individuals remain free.

Evolution is basic to this view. Life is seen to have evolved over millions of years in a manner that makes the cell mirror the cosmos. This is expressed in the famous sentence: yat pinde tad brahmande, ‘as in the cell so in the universe’.

From Consciousness arises matter (prakriti), and matter evolves as the balance between its three attributes (gunas) called sattva, rajas and tamas changes. This is the principle of Vedic evolution as given in Kapila’s Sankhya darshan. Even mind evolves out of matter. The evolutionary sequence goes through many levels. There exist tattvas (principles) that lead to the emergence of life out of inert matter. These tattvas, which include the various sensory and motor capacities, are latent in matter. The chain of sensory organ adaptations may be seen amongst the animals.

The gunas are not to be taken as abstract principles alone. Indian thought believes that structure in nature is recursive, and the gunas show up in various forms at different levels of expression. For example, at the cellular level, the genetic informational flow is sattva, the metabolic activity is rajas, and the membrane that provides identity to the cell is tamas.

Texts such as the Mahabharata and the Puranas speak of evolution of life at many places. Earth is not considered unique regarding life. We are told that there exist countless planetary worlds, which go through cycles of evolution and decline. Hindu cosmology speaks of recursive cycles of creation and destruction.

The texts imply that ingredients for the growth of life are available throughout the universe. Infinite numbers of universes are conceived, so as a new one is created like a bubble in an ocean of bubbles, life elements from other existing universes migrate and at a suitable time lead to larger life forms. This idea supports the notion of an extra-terrestrial source of life on Earth. (On September 28, 1969, a meteorite fell over Murchison, Australia. Analysis of the meteorite revealed that it was rich with amino acids. The Murchison meteorite shows that the Earth may have acquired some of its amino acids and other organic compounds from outer space.)

The story of Vishnu’s avataras is seen by some to represent evolution through the stages of fish, tortoise, boar, man-lion, dwarf, Rama the axe-man, Rama (the ethical man), Krishna (the spiritual man).

The Indic idea of structure showing up at different levels may be seen in the parallels between biological and linguistic evolution. Their analogies may be divided into four principal types. In historical and comparative linguistics, species with individuals capable of interbreeding are compared to the mutually comprehensible speakers of a language. In the study of animal behaviour, genes coding for physical and behavioral traits are compared to fragments of culture capable of transmission and expression. In evolutionary epistemology or history of ideas, competing scientific concepts are compared to interacting organisms in an environment in an intellectual ecology. Finally, there is an analogy between the processes in living cells and processes in the brains of persons. Each cell listens to and comprehends its own DNA speech stream; likewise, the human language helps to generate and maintain a stable network of mental reactions (mental metabolism) by means of the ongoing inner dialogue.

 

DRIVING FORCES IN EVOLUTION

The idea of evolution was originally taken to be a linear, ladder-climbing ascent from simple life to humans. Darwin assumed blended inheritance, in which if an organism inherits certain factors, A and B, from its parents, it passes a factor which is a blending of A and B to its offspring. But evolution cannot proceed with such a theory: the variation needed for evolution disappears rapidly as it is blended out of existence.

The next advance was provided by the Mendelian theory of heredity where the organism preserves the inheritance from the father and the mother, without blending it. The idea of such non-blending genetic inheritance is also in the Garbha Upanishad.

Mendelian ideas combined with Darwinian ideas provide a synthetic theory of evolution that has been called neo-Darwinism. In this theory, although mutation is recognized as the ultimate source of genetic variation, natural selection is given the dominant role in shaping the genetic make-up of populations and in the process of gene substitution.

In the 1960s, Mitoo Kimura proposed that molecular evolution was mainly driven not by natural selection but by random drift among equally well-adapted sequence variants. This theory (neutral theory of molecular evolution) contends that a neutral drift is the cause of most of the evolutionary change at the molecular level; also, much of the variability within species is caused not by positive selection of advantageous alleles, or by balancing selection, but by random genetic drift of mutant alleles that are selectively neutral.

Evidence supporting the neutral theory includes the discovery that synonymous base substitutions, which do not cause amino acid changes, almost always occur at much higher rate than nonsynonymous (amino acid altering) substitutions. Evolutionary base substitutions at introns also occur at a comparatively high rate. This is because the changes that are subjected to natural selection will include many that are deleterious and so unlikely to survive in later generations.

In contrast to phenotypic evolution, molecular evolution is characterized by two outstanding features. First is the constancy of the rate, so that for each protein or gene region, the rate of amino acid or nucleotide substitution is approximately constant per site per year (giving rise to the molecular clock). The second is that functionally less important molecules, or portions of molecules, evolve faster than more important ones.

Molecular evolution is like language change where grammatical markers and basic vocabulary changes much more slowly than the less basic vocabulary. It is providing new insights in biological evolution, and the molecular clock has been critical in helping reconstruct the history of life. Similarly, language evolution has helped in the understanding of ancient history.

Vedic evolution theory is like the neutral theory. If the gene function is seen through the agency of the three gunas, then evolution has a net genetic drift towards higher intelligence.

The tattvas are not discrete and their varying expression creates the diversity of life in and across leading different species. Each sensory and motor tattva is mapped into a corresponding organ.

Schrödinger, in his (book) “What is Life?” was the one to suggest that an “aperiodic crystal forms the hereditary substance,” inspiring Watson and Crick to search for this molecule (DNA). He also thought that the Sankhyan tattvas were the most plausible model for the evolution of the sensory organs.

 

ALIENATION AND HEALTH

The world is in a crisis, not only because of religious conflict, but also due to the corrosive effect of materialism on the human psyche. There is violence in the schools, despair and depression amongst the young, and the fear that globalization will be destructive to social well-being.

In the midst of this, modern medicine is failing: not only because of the side-effects of drugs, but also because of the manner it creates drug dependency, so that most people are on one medication or other for stress, heart disease, cholesterol reduction, or pain. This has driven up the cost of health care so high that American companies are no longer competitive in the international marketplace, placing American prosperity at risk.

Perhaps this is because modern medicine seeks to look only at the body, without thought for the mind. The linkages between the mind and body are becoming apparent to science as a result of new research. For example, it is now known that stress caused reduction in the immune function. But, in itself, this knowledge is not helpful in creating new therapies. One needs a paradigmatic shift that takes as the starting point the Vedic conception of mind and body as a single entity.

Vedic science offers a vision of the world that is richer than that of materialist science, which it subsumes as a lower kind of knowledge. Unlike the Bible or the Koran, the Vedas are not in conflict with secular knowledge. They offer a way to obtain knowledge of the self that is essential for self-transformation, a knowledge that complements secular knowledge.

The challenge is to translate the categories that describe the nature of consciousness in the Vedas and the later books into a contemporary idiom that makes them accessible to a wider audience. Meanwhile, personal sadhana on the Vedic path is a way to obtain wisdom and insight needed to navigate through the present times.

 

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From: Vinod Kumar Gupta < >

धार्मिक आस्था पर आघात की घृणित राजनीति ⁉

 

⭕भारतीय संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट करके भूमि पुत्र बहुसंख्यक हिंदुओं की आस्थाओं पर निरंतर प्रहार करते रहने की मुगलकालीन परंपरा अभी जीवित है। आज केंद्र में राष्ट्रवादी भाजपानीत राजग सरकार के सशक्त शासन में भी देशद्रोहियों व भारतविरोधियों के षड्यंत्रो पर अंकुश नहीं लग पा रहा है।

⭕यह कितना विचित्र है कि जिस “कांग्रेस” ने आरंभ में गौवंश “दो बैलो की जोड़ी” व “गाय-बछड़े” के चुनाव चिन्ह के आधार पर भी भारतीय संस्कृति का भरपूर लाभ उठाते हुए बहुसंख्यक हिंदुओं को लुभाकर दशकों देश पर शासन किया वहीँ आज सत्ता से बाहर होने पर उन मान बिंदुओं के प्रति भी निरंकुश हो रही है ।

⭕सत्ताहीनता की पीड़ा में कांग्रेसजनों के निरन्तर असन्तुलित व्यवहार से होने वाली छटपटाहट अनेक अवसरों पर उनकी अराष्ट्रीय भावनाओं व अपरिपक्वता के दुखद संकेत कराती है।

⭕ जिसके परिणामस्वरुप केरल में काग्रेसियों के दुःसाहस ने गाय के बछड़े को सार्वजनिक रुप से काट कर उसका वितरण करके समस्त भारतवासियों को आक्रोशित कर दिया है।

⭕क्या खाते है यह व्यक्तिगत है परंतु क्या खा रहें है इसका प्रदर्शन करने का क्या हेतू है? क्या राष्ट्रवादियों की भावनाओं को भडका कर सामाजिक व साम्प्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ कर अराजकता फैलाना और साम्प्रदायिक दंगे करवाकर निर्दोष लोगों के जान-माल के साथ साथ राष्ट्रीय सम्पत्तियों हो हानि पहुँचाना उचित है? इस नृशस घटना ने बहुसंख्यक हिन्दुओं के मान-बिंदुओं पर प्रहार करके जिहादी संस्कृति के दुःसाहस को और बढ़ाया है।

⭕हमारा केंद्र व केरल की सरकार से विनम्र अनुरोध है कि इस दुर्दान्त घटना में सम्मलित सभी आरोपियों को अविलम्ब कठोर वैधानिक कार्यवाही करके उचित दंड दिया जाय। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाये कि इस प्रकार से केवल हिंदुओं को अपमानित करने और उनको ठेस पहुँचाने के लिये उनकी संस्कृति व आस्थाओं पर प्रहार करने वालों पर भविष्य में भी कठोर कार्यवाही की जायेगी।

⭕ध्यान रहें केंद्र सरकार ने 23 मई को “पशु क्रूरता निवारण कानून” के अंतर्गत गौवंश, भैस, ऊंट आदि पशुओं के अनावश्यक वध को रोकने और बाज़ार में इन पशुओं की क्रय-विक्रय को नियमित करने की अधिसूचना जारी की थी। परंतु धर्मद्रोहियों ने हम हिन्दू धर्मावलंबियों को पीड़ा पहुँचाने के लिये विशेषरुप से गौवंश काटने और उसके मांस के भक्षण का खुला प्रदर्शन किया है।

⭕अतः इस मानसिकता का पोषण करके उसका सशक्तिकरण करने वाली अमानवीय प्रवृतियों को जब तक कुचला नही जायेगा तब तक माँ भारती पर हो रहें ऐसे आघातो को नियंत्रित नही किया जा सकता।

⭕यह ठीक है कि हमारे संविधान का अनुच्छेद 19 (1 जी) के अनुसार सभी नागरिकों को कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने का अधिकार दिया गया है। परंतु इसको नियंत्रित करने की व्यवस्था भी अनुच्छेद 19 (6) में स्पष्ट कर दी गई है ।जिसके अनुसार यह स्पष्ट है कि अनुच्छेद 19 (1जी) में दिये गये अधिकारों का दुरुपयोग न हो सके इसके लिये केंद्र व राज्य सरकार को उचित क़ानून बनाने का अधिकार प्राप्त है । अतः जिसप्रकार नागरिकों को व्यापार चुनना मौलिक अधिकार है तो उसी प्रकार सरकार का यह दायित्व व अधिकार है कि सभी बाजारो को विनियमित करें और रखें।

⭕यहां यह उल्लेख भी आवश्यक है कि पशु मेले में पशुओं के क्रय-विक्रय में अधिकाँश पशुओ को कत्लगाह, बूचड़खाने व स्लाटर हाउस में कटने के लिये ही भेजा जाता है । जबकि इन मेलों में कृषि कार्यो के लिये पशुओं के क्रय-विक्रय की मान्यता होती है । इसके अतिरिक्त यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि भारत बंग्ला देश की सीमाओं पर गौवंश की तस्करी का वर्षो पुराने आपराधिक कृत्यों में अनेक अपराधी व आतंकवादी निरन्तर सक्रिय रहते है।

⭕एक समाचार के अनुसार भारतीय सीमा सुरक्षा बलों ने भारत-बंग्ला देश सीमा से केवल वर्ष 2015 में ही लगभग एक लाख पशु मुक्त कराये थे जिसमें अधिकांश गाय, बैल व बछड़े थे। उस समय भारत व बंग्लादेश के 400 तस्कर भी पकडे गये थे। परिणामस्वरुप बंग्ला देश में गाय के मूल्यों में 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई जिससे उनके चमड़ा उद्योग में 15 प्रतिशत व गौमांस के अंतर्राष्ट्रीय बाजार में 75 प्रतिशत की गिरावट हुई थी।

⭕देश में प्रतिवर्ष 14 जनवरी से 29 जनवरी तक पशु कल्याण पखवाड़ा मनाया जाता है, परंतु संभवतः अधिकांश लोगों को यह ज्ञात ही न होगा और न ही उन्होंने कभी सुना व देखा होगा? बहुत से समाजसेवी समय समय पर यह मांग भी करते रहें है कि मानवाधिकारों की तरह पशु अधिकारों को भी नियोजित किया जाये।

⭕भारतीय सेना ने भी अपने डॉग-स्क्वॉयड के डॉग सदस्यों को अवकाश देने के बाद न मारने का कुछ वर्ष पूर्व निश्चय किया था। इस संबंध में अक्टूबर 2015 में राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित एक लेख के अनुसार एक चौकाने वाला प्रसंग है कि स्पेन के एक क्षेत्र / कस्बे ‘टिग्योरास डि वैले’ में एक विचित्र घटना हुई जिसमें उस क्षेत्र में वोटिंग करवा कर बहुमत से वहां के लोगों ने निश्चय किया कि कुत्तो व बिल्लियों आदि पालतु पशुओं को भी “गैर इंसानी नागरिक” का स्टेटस दिया जाय। फिर वहां पशु अधिकार क़ानून में यह स्पष्ट किया गया कि ‘गैर इंसानी नागरिकों’ को अपनी मौज़-मस्ती के लिए तंग करना व तड़पाने का ‘इंसानी नागरिकों’ को कोई अधिकार नही है और उस इंसान को दंडित भी किया जायेगा जो इन पशुओं को यातना देगा।

⭕यहां यह उल्लेख इसलिए आवश्यक है कि जब पालतू पशुओं के प्रति इतनी उदारता व सहिष्णुता मनुष्य में है तो फिर हिन्दुओं की धार्मिक आस्था से जुड़े गौवंश के प्रति सम्मान तो सभी को रखना ही चाहिये।

⭕वर्षो से गौवध को प्रतिबंधित करने के अनेक छोटे-बड़े आंदोलन किये जाते आ रहें है और कुछ राज्यों में इसके लिये कानून बने भी है, परंतु राजनैतिक विमर्श बार बार असफल होता रहा है ।

⭕केंद्र सरकार के इस निर्णय का तमिलनाडु, केरल व पश्चिम बंगाल की सरकारों के साथ साथ देशविरोधी तत्वों ने भी विरोध किया है, जबकि राज्य सरकारें इस पर अपने विधि-विधान में आवश्यक संशोधन करने के लिए स्वतंत्र है। लेकिन गऊ माता को ईश्वर तुल्य मानने वाले हिन्दू बहुल समाज की मर्यादाओं को अपमानित करके उनके उत्पीडन से एक विशेष वर्ग (मुसलमानों) को प्रसन्न करने की ओछी राजनीति ने सेक्युलर कहें जाने वाले समाज को जकड़ लिया है।जिससे राष्ट्रहित सर्वोपरि की भावना का सर्वथा अभाव होता जा रहा है ।

⭕इन समस्त आग्रहों, दुराग्रहों व पूर्वाग्रहों के बीच यह सुखद है कि अनेक मुस्लिम नेताओं ने गाय को “राष्ट्रीय पशु” घोषित करने व गौवध को प्रतिबंधित करने की मांग उठायी है और उसका समर्थन करने का भी निश्चय किया है।

 

✍🏻विनोद कुमार सर्वोदय

(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)

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Remarkably humanitarian work!

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From: Gajanan Nerkar < >

 

Reasons why most Indians are against beef

& why most of them love to worship Cow.

 

The very first thing that we should know is that there are 3600 butcher houses in India that carries a license to kill cows. Other than that, there are almost 36,000 butcher houses in India that are running illegally. Almost 2, 50, 00,000 cows are killed annually. Apart from that 1.25 crore buffaloes, 2 – 3 crore pigs and countless other smaller animals like goat, poultry, etc. are killed, making India as butchering capital of the world.

 

Looking at this, in 1998, few of the think alike people grouped with Rajiv Bhai and filed a case in Supreme Court. There are two institutions named – ‘Akhil Bhartiye Gou Sevak Sangh’, with which Rajiv Bhai was associated (headquarter located in Vardha, hometown of Rajiv Bhai) and other is ‘Ahimsa Army Thrust’; together filed the case. Eventually Gujarat Government also joined them.

 

Now the case that was filed said that the cow and other cattle should not be butchered. The butchers were the other party and asked – ‘why should the cattle not killed?’

Rajiv Bhai requested that this matter is far serious matter and a bigger bench, and not just 2 judges, should address this issue. It took almost 3-4 years for Supreme Court to agree to this condition and it finally created a constitutional bench. A seven-judge constitutional bench was created under the chairmanship of ex-Chief Justice of India, Shri R. C. Lahoti. The hearing was carried on from 2004 to September 2005.

 

The butchers appointed some of most prestigious lawyers, with fees as high as 50 lakhs, as their advocate. Some of such lawyers are – Soli Sorabji (Fees – 20 lakh), Kapil Sibbal (Fees – 22 Lakh), and Mahesh Jeth Malani, son of Ram Jeth Malani (Fees – 32 to 35 Lack), all on the butchers’ side!

 

Rajiv Bhai couldn’t get a lawyer as he did not have enough money to hire one. So, he told the court about this. The court suggested – ‘what if we assign you a lawyer?’ Rajiv Bhai responded by saying – ‘That would really help, but if you would allow us to argue for our own case then that it would be really great’. The court agreed and assigned him an M E Eskuri and thereafter they started fighting their case.

 

So, the butchers put forward the same arguments that people like Sharad Pawar, Nehru or similar people with a Miraculized education system had been vocalizing for long.

First sophistry (ill argument) given by butchers was –

 

  1. There is no use in saving an old cow. We are strengthening the Indian Economy as the meat is exported.

 

Second ill argument –

 

  1. There is lack of proper fodder for cows and cattle. It is better to kill them than letting them die of hunger.

 

Third ill argument was –

 

  1. There is no place for people to live in India, then where will be the cattle reared?

 

Fourth Argument –

 

  1. We get precious foreign currency with its export.

 

And the most dangerous of all arguments given by the butchers were –

 

  1. Butchering cattle is their religious right.

 

Do you know who the butchers were who gave this argument? Among the Muslim community there is a subcategory known as ‘Qhureshis’ who out of all Muslims kill most. It was them who presented this argument.

 

Without expressing any anger and with immense patience, Rajiv Bhai presented the facts and figures for the ill arguments given by the butchers.

 

For the first ill argument Rajiv Bhai presented evidences to the court, i.e. if a cow is butchered then country earns money as well as precious foreign currency through export. He started by presenting facts and figures on the scenario – if a cow is killed then how much meat, blood and bones are collected.

A healthy cow weigh around 3 to 3.5 quintal and when it is butchered then about 70 kilo meat is extracted. One kilo meat is exported at the rate of about Rs. 50, so that means 70 kilo will give around Rs. 3,500 (70×50)!

 

Now, about 25 liters of blood is extracted out of the same healthy cow, which fetch about Rs. 1500 to 2000.

 

About 30-35 kilo bones are also extracted that is sold for about Rs. 1,000 to 1,200.

So ultimately when a cow is butchered and sold as parts, then no more than Rs. 7,000 is earned.

 

Thereafter, Rajiv Bhai presented the exact opposite argument. What if a cow is not killed? What if it is reared, then how much can be earned out of it? Its calculation is as follows –

 

A healthy cow gives around 10 kilos of gobar or cow dung and about 3 liters of gau mutra or urine. Out of 1 kilo gobar/cow dung about 33 kilos manure is made, which is also known as organic manure. At this point the judge asked – ‘how is it possible?’

 

Rajiv Bhai asked for some time and a place to prove his point. Court acknowledged and Rajiv Bhai proved his point by actually producing 33 kilos organic manure by using 1 kilo gobar or cow dung. He asked the court to call the IRC scientists to get it tested. After test, it was proved that this manure contains all essential 18 micronutrients that soil of a cultivated field needs, like manganese, phosphate, potassium, calcium, iron, cobalt, silicon, etc. Artificial fertilizers rarely contain more than 3 minerals. Therefore, cow dung manure is ten times better that the artificial one. This court acknowledged.

 

Then Rajiv Bhai suggested that if it is not against the court protocol then the judge can come and see how we make 33 kilo organic manure from 1 kilo cow dung in our own village. He said that his parents are working on this from last 15 years.

 

Furthermore, 1 kilo organic manure is sold in international market for about Rs.6. Therefore, on daily basis 10 kilo cow dung fetch around Rs. 1,800 to 2,000

(330 kilo manure from 10 kilo cow dung @ of Rs.6).

 

And then there are no Sundays or weekly off in getting cow dung. Therefore in 365 days/ years we can earn about –

1,800 x 365 = Rs. 6,57,000/year out of cow dung

 

On an average, a cow’s age is about 20 years and it keep giving cow dung till its last day. It may not be beyond imagination that how much one can earn just by cow’s cow dung. It goes in millions.

1,800 x 365 x 20 = Rs. 1,31,40,000

 

Thousands of years back it was already written in our sacred books that goddess Laxmi reside in Cow’s cow dung. How true could it be now!!!

 

This argument is a slap in the face of that elite generation who went through the Macaulized education system, and who consider our religion, culture and teachings as mere hypocrisy, and who laugh at the thought of Goddess Laxmi residing in cow’s cow dung!

 

Now let’s talk about gau mutra or urine.

 

A cow gives around 2 to 2.25 liters of urine per day. Urine is useful in making medicine for diabetes, arthritis, bronchitis, bronchial asthma, tuberculosis, osteomyelitis etc. and some 48 various other diseases!

 

1 liter urine is sold in market for about Rs. 500 and that also in Indian market. In international market a liter of urine can fetch far more. Did you know that in America gau mutra or urine is patented? There is not just one patent but three different patents. And, that the American government import cow’s urine every year from India and make medicine for cancer, diabetes etc. So if we calculate according to the American market then a liter of cow’s urine can get about Rs. 1,200 to 1,300. That means just out of cows urine we can earn about Rs. 3,000 daily. Therefore

 

in a years we can earn – 3,000 x 365 = 10,95,000

in 20 years we can earn – 3000 x 365 x 20 = 2,19,00,000

millions again by just selling urine!!!

 

The same cow’s cow dung can also produce methane gas, which can be used as an alternate to LPG in our kitchen to cook food and also to run a vehicle – yes even a four-wheel vehicle! Exactly the way a vehicle can run on LPG gas, a vehicle can also run on methane gas.

 

The Judge could not believe it. Thus, Rajiv Bhai said that if you allow then we will fit a methane gas cylinder in your car. You can test drive it yourself. Judge gave his permission. Judge used this for three full months!!! He said that the expense is also way less – just 50 to 60 paisa per kilometer and in diesel it comes around Rs. 4 per kilometer! And unlike diesel, there is no smoke generated from the burning of methane. Plus, there is rarely any sound pollution in vehicle running on methane gas. Judge was impressed.

 

Now Rajiv bhai extended his argument. If we get 10 kilo cow dung/day then how much methane gas can be produced out of it per year and in 20 years? There are 17 crore cows in our country then if we collect cow dung of all these cows and use it to make methane then we can get about 1 lakh 32 thousand crore! We can run our whole transportation without diesel, without petrol. Then we won’t have to beg the Arabs for crude oil and America for it currency to buy the crude oil. In this way, our Rupee will also get strengthen.

 

Supreme Court was shaken and stormed after listening to Rajiv Bhai’s calculations. Finally judge had to agree that it far more economical to save cow than to kill it.

 

When the court’s opinion came then the Muslim butchers were furious. They thought that the case is getting out of their hand. They already told the court that a cow can fetch about Rs. 7,000. But here Rajiv Bhai proved that a single cow could in fact earn millions and even billions of Rupees.

 

Thereafter, the frustrated butchers finally played their trump card. They said that killing or butchering cows is their religious right.

 

Rajiv Bhai counter argued that if it is their religious right then why don’t we go into history and find out how many Muslim rulers used this religious right. The court agreed and asked to make a commission to find, by making in-depth analysis of all the historic documents, whether or not the Muslim rulers in India ever utilized this right?

 

Old historical documents were researched and it was discovered that none of the Muslim rulers in India ever supported killing of cow. In fact, against that some of them made laws to stop butchering of cows under their rule! One out of them was Babar. He had written in his book ‘Babarnama’ that cows should not be killed even after his death and that this law should be continued. His son Humayun continued this law and many others who came after him including Aurangzeb.

 

Other than that, in south India there was a king known as Hyder Ali, Tipu Sultan’s father, who made a law that if someone, is caught killing a cow then his head will be cut off. Many were punished under this law. Tipu Sultan, when he became the king then he also continued this law except that instead of cutting head he would cut hands of those who killed cows.

 

When these facts were shown to the court then Rajiv Bhai argued that if it was a religious right of a Muslim to kill cows then Babar and Humayun were staunch Muslims, Aurangzeb was even stauncher. Then why did they not killed cows and made laws against it?

 

Afterward, Rajiv Bhai asked court to allow him to get the Koran Sharif, Hadid and other religious books and asked to point out where it was written that it is ok to kill cows or cattle. It was found that none of the religious books ask to kill cows. Hadid in fact asks to save cows as it says it saves you. Pegambar Mohammad Sahib states that cow is an innocent animal therefore one should take mercy on it. At one place it is written that if you kill cow then you will not even get a place in hell.

 

So Rajiv Bhai questioned – ‘If Koran, Mohammad Sahib and Hadid say so, then how is it possible that killing cattle or cows is a religious right? Please ask the butchers. If there is any book in mecca medina, unknown to him, then the butchers can get that too.’ On hearing this butcher got mad.

 

Then court gave the butchers a last chance. It asked them to get any document, religious book that suggest and support killing of cows. But the butchers could not get any.

 

So, the court gave its ruling on 26 October 2005. A copy of Judgment can be downloaded from –

www. supremecourtcaselaw.com

 

In its 66-page Judgment, Supreme Court created history. It says that to kill cow is a constitutional and religious sin. And it also says that it is the constitutional duty of every citizen as well as the government to protect cow. As you may know some of the constitutional duties are – to abide by the constitution, respect national flag, respect freedom fighters, to uphold and protect the sovereignty, unity and integrity of India etc. And now it will also include protecting cows!

 

Supreme Court said that it is the responsibility of all 34 States and Union Territories government that they should stop the killing of cows in their territory. It will be the constitutional responsibility of the Governor, Chief Minister and Chief Secretary as well.

 

And finally, how can we forget Mangal Pandey who sacrificed his life just to avoid cow’s meat coated cartridge to get in his mouth. He killed the English officer who forced him to do so. In fact, our freedom struggle started with saving of cows. Therefore, we should consider it as important as our freedom.

 

Thanks for your patience to read the whole post.

 

Regards.

Gajanan Nerkar

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From: Vivek Arya < >

दलित मुस्लिम एकता की जमीनी हकीकत
डॉ विवेक आर्य
आजकल देश में सहारनपुर दंगों को लेकर चर्चा जोरों पर है। दैनिक जागरण 23 मई 2017 के दिल्ली संस्करण में सहारनपुर दंगों के कारणों के पीछे पुलिस द्वारा दर्ज करवाई गई खुफिया रिपोर्ट छपी है।  इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दलित-मुस्लिम गठजोड़ को स्थापित करने के लिए यह दंगा फसाद करवाया गया हैं। दलित समाज से सम्बंधित कुछ लोग दंगा करवाकर दलितों को भड़काना चाहते है। उनका मुख्य प्रयोजन दलित-मुस्लिम गठजोड़ बनाकर अपना वोट बैंक स्थापित करना है।  यह येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करने की कवायद है। इन नेताओं ने यह सोचा कि दलितों और मुस्लिमों के वोट बैंक को संयुक्त कर दे दे तो 35% से 50% वोट बैंक आसानी से बन जायेगा और उनकी जीत सुनिश्चित हो जाएगी। जबकि सत्य विपरीत है। दलितों और मुस्लिमों का वोट बैंक बनना असंभव हैं। क्योंकि जमीनी स्तर पर दलित हिन्दू समाज सदियों से मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा प्रताड़ित होता आया हैं।
1. मुसलमानों ने दलितों को मैला ढोने के लिए बाध्य किया
भारत देश में मैला ढोने की कुप्रथा कभी नहीं थी। मुस्लिम समाज में बुर्के का प्रचलन था। इसलिए घरों से शौच उठाने के लिए हिंदुओं विशेष रूप से दलितों को मैला ढोने के लिए बाधित किया गया। जो इस्लाम स्वीकार कर लेता था। वह इस अत्याचार से छूट जाता था। धर्म स्वाभिमानी दलित हिंदुओं ने अमानवीय अत्याचार के रूप में मैला ढोना स्वीकार किया। मगर अपने पूर्वजों का धर्म नहीं छोड़ा। फिर भी अनेक दलित प्रलोभन और दबाव के चलते मुसलमान बन गए।
2. इस्लाम स्वीकार करने के बाद भी दलितों को बराबरी का दर्जा नहीं मिला।
दलितों को  इस्लाम स्वीकार करने के बाद भी बराबरी का दर्जा नहीं मिला। इसका मुख्य कारण इस्लामिक भेदभाव था।  डॉ अम्बेडकर इस्लाम में प्रचलित जातिवाद से भली प्रकार से परिचित थे। वे जानते थे कि मुस्लिम समाज में अरब में पैदा हुए मुस्लिम (शुद्ध रक्त वाले)अपने आपको उच्च समझते है और धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम बने भारतीय दूसरे दर्जे के माने जाते हैं। अपनी पुस्तक पाकिस्तान और भारत के विभाजन, अम्बेडकर वांग्मय खंड 15 में उन्होंने स्पष्ट लिखा है-
१. ‘अशरफ’ अथवा उच्च वर्ग के मुसलमान (प) सैयद, (पप) शेख, (पपप) पठान, (पअ) मुगल, (अ) मलिक और (अप) मिर्ज़ा।
२. ‘अज़लफ’ अथवा निम्न वर्ग के मुसलमान
इसलिए जो दलित मुस्लिम बन गए वे दूसरे दर्जे के ‘अज़लफ’ मुस्लिम कहलाये। उच्च जाति वाले  ‘अशरफ’ मुस्लिम नीच जाति वाले  ‘अज़लफ’ मुसलमानों से रोटी-बेटी का रिश्ता नहीं रखते। ऊपर से शिया-सुन्नी, देवबंदी-बरेलवी के झगड़ों का मतभेद। सत्य यह है कि इस्लाम में समानता और सदभाव की बात करने और जमीनी सच्चाई एक दूसरे के विपरीत थी। इसे हम हिंदी की प्रसिद्द कहावत चौबे जी गए थे छबे जी बनने दुबे जी बन कर रह गए से भली भांति समझ सकते है।
3. दलित समाज में मुसलमानों के विरुद्ध प्रतिक्रिया
दलितों ने देखा कि इस्लाम के प्रचार के नाम पर मुस्लिम मौलवी दलित बस्तियों में प्रचार के बहाने आते और दलित हिन्दू युवक-युवतियों को बहकाने का कार्य करते। दलित युवकों को बहकाकर उन्हें गोमांस खिला कर अपभ्रष्ट कर देते थे और दलित लड़कियों को भगाकर उन्हें किसी की तीसरी या चौथी बीवी बना डालते थे।  दलित समाज के होशियार चौधरियों ने इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए एक व्यावहारिक युक्ति निकाली।  उन्होंने प्रतिक्रिया रूप से दलितों ने सूअरों को पालना शुरू कर दिया था। एक सुअरी के अनेक बच्चे एक बार में जन्मते। थोड़े समय में [पूरी दलित बस्ती में सूअर ही सूअर दिखने लगे।  सूअरों से मुस्लिम मौलवियों को विशेष चिढ़ थी। सूअर देखकर मुस्लिम मौलवी दलितों की बस्तियों में इस्लाम के प्रचार करने से हिचकते थे। यह एक प्रकार का सामाजिक बहिष्कार रूपी प्रतिरोध था। पाठक समझ सकते है कैसे सूअरों के माध्यम से दलितों ने अपनी धर्मरक्षा की थी। उनके इस कदम से उनकी बस्तियां मलिन और बिमारियों का घर बन गई। मगर उन्हें मौलवियों से छुटकारा मिल गया।
4. दलित हिंदुओं का सवर्ण हिंदुओं के साथ मिलकर संघर्ष
जैसे सवर्ण हिन्दू समाज मुसलमानों के अत्याचारों से आतंकित था वैसे ही हिन्दू दलित भी उनके अत्याचारों से पूरी तरह आतंकित था। यही कारण था जब जब हिंदुओं ने किसी मुस्लिम हमलावर के विरोध में सेना को एकत्र किया। तब तब सवर्ण एवं दलित दोनों हिंदुओं ने बिना किसी भेदभाव के एक साथ मिलकर उनका प्रतिवाद किया। मैं यहाँ पर एक प्रेरणादायक घटना कोउदहारण देना चाहता हूँ। तैमूर लंग ने जब भारत देश पर हमला किया तो उसने क्रूरता और अत्याचार की कोई सीमा नहीं थी। तैमूर लंग के अत्याचारों से पीड़ित हिन्दू जनता ने संगठित होकर उसका सामना करने का निश्चय किया। खाप नेता धर्मपालदेव के नेतृत्व में पंचायती सेना को एकत्र किया गया। इस सेना के दो उपप्रधान सेनापति थे। इस सेना के सेनापति जोगराजसिंह नियुक्त हुए थे जबकि उपप्रधान सेनापति – (1) धूला भंगी (बालमीकी) (2) हरबीर गुलिया जाट चुने गये। धूला भंगी जि० हिसार के हांसी गांव (हिसार के निकट) का निवासी था। यह महाबलवान्, निर्भय योद्धा, गोरीला (छापामार) युद्ध का महान् विजयी धाड़ी  था। जिसका वजन 53 धड़ी था। उपप्रधान सेनापति चुना जाने पर इसने भाषण दिया कि – “मैंने अपनी सारी आयु में अनेक धाड़े मारे हैं। आपके सम्मान देने से मेरा खूब उबल उठा है। मैं वीरों के सम्मुख प्रण करता हूं कि देश की रक्षा के लिए अपना खून बहा दूंगा तथा सर्वखाप के पवित्र झण्डे को नीचे नहीं होने दूंगा। मैंने अनेक युद्धों में भाग लिया है तथा इस युद्ध में अपने प्राणों का बलिदान दे दूंगा।” यह कहकर उसने अपनी जांघ से खून निकालकर प्रधान सेनापति के चरणों में उसने खून के छींटे दिये। उसने म्यान से बाहर अपनी तलवार निकालकर कहा “यह शत्रु का खून पीयेगी और म्यान में नहीं जायेगी।” इस वीर योद्धा धूला के भाषण से पंचायती सेना दल में जोश एवं साहस की लहर दौड़ गई और सबने जोर-जोर से मातृभूमि के नारे लगाये। (सन्दर्भ-जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-380)
दूसरा उपप्रधान सेनापति हरबीरसिंह जाट था । यह हरयाणा के जि० रोहतक गांव बादली का रहने वाला था। इसकी आयु 22 वर्ष की थी और इसका वजन 56 धड़ी (7 मन) था। यह निडर एवं शक्तिशाली वीर योद्धा था।उप-प्रधानसेनापति हरबीरसिंह गुलिया ने अपने पंचायती सेना के 25,000 वीर योद्धा सैनिकों के साथ तैमूर के घुड़सवारों के बड़े दल पर भयंकर धावा बोल दिया जहां पर तीरों तथा भालों से घमासान युद्ध हुआ। इसी घुड़सवार सेना में तैमूर भी था। हरबीरसिंह गुलिया ने आगे बढ़कर शेर की तरह दहाड़ कर तैमूर की छाती में भाला मारा जिससे वह घोड़े से नीचे गिरने ही वाला था कि उसके एक सरदार खिज़र ने उसे सम्भालकर घोड़े से अलग कर लिया। तैमूर इसी भाले के घाव से ही अपने देश समरकन्द में पहुंचकर मर गया। वीर योद्धा हरबीरसिंह गुलिया पर शत्रु के 60 भाले तथा तलवारें एकदम टूट पड़ीं जिनकी मार से यह योद्धा अचेत होकर भूमि पर गिर पड़ा। उसी समय प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर ने अपने 22000 मल्ल योद्धाओं के साथ शत्रु की सेना पर धावा बोलकर उनके 5000 घुड़सवारों को काट डाला। जोगराजसिंह ने स्वयं अपने हाथों से अचेत हरबीर सिंह को उठाकर यथास्थान पहुंचाया। परन्तु कुछ घण्टे बाद यह वीर योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गया। हरद्वार के जंगलों में तैमूरी सेना के 2805 सैनिकों के रक्षादल पर भंगी कुल के उपप्रधान सेनापति धूला धाड़ी वीर योद्धा ने अपने 190 सैनिकों के साथ धावा बोल दिया। शत्रु के काफी सैनिकों को मारकर ये सभी 190 सैनिक एवं धूला धाड़ी अपने देश की रक्षा हेतु वीरगति को प्राप्त हो गये।
हमारे महान इतिहास की इस लुप्त प्रायः घटना को यहाँ देने के दो प्रयोजन है।  पहला तो यह सिद्ध करना कि हिन्दू समाज को अगर अपनी रक्षा करनी है तो उसे जातिवाद के भेद को भूलकर संगठित होकर विधर्मियों का सामना करना होगा। दूसरा इससे यह भी सिद्ध होता है कि उस काल में जातिवाद का प्रचलन नहीं था। धूला भंगी (बालमीकी) अपनी योग्यता, अपने क्षत्रिय गुण,कर्म और स्वभाव के कारण सवर्ण और दलित सभी की मिश्रित धर्मसेना का नेतृत्व किया।
जातिवाद रूपी विषबेल हमारे देश में पिछली कुछ शताब्दियों में ही पोषित हुई।  वर्तमान में भारतीय राजनीति ने इसे अधिक से अधिक गहरा करने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया।
5. भक्ति काल के दलित संतों जैसे रविदास, कबीरदास द्वारा इस्लाम की मान्यताओं की कटु आलोचना
अगर इस्लाम दलितों के लिए हितकर होता तो हिन्दू समाज में उस काल में धर्म के नाम पर प्रचलित अन्धविश्वास और अंधपरंपराओं पर तीखा प्रहार करने वाले दलित संत इस्लाम की भरपेट प्रशंसा करते। इसके विपरीत भक्ति काल के दलित संतों जैसे रविदास, कबीरदास द्वारा इस्लाम की मान्यताओं की कटु आलोचना करते मिलते है।
संत रविदास का चिंतन
मुस्लिम सुल्तान सिकंदर लोधी अन्य किसी भी सामान्य मुस्लिम शासक की तरह भारत के हिन्दुओं को मुसलमान बनाने की उधेड़बुन में लगा रहता था। इन सभी आक्रमणकारियों की दृष्टि ग़ाज़ी उपाधि पर रहती थी। सुल्तान सिकंदर लोधी ने संत रविदास जी महाराज मुसलमान बनाने की जुगत में अपने मुल्लाओं को लगाया। जनश्रुति है कि वो मुल्ला संत रविदास जी महाराज से प्रभावित हो कर स्वयं उनके शिष्य बन गए और एक तो रामदास नाम रख कर हिन्दू हो गया। सिकंदर लोदी अपने षड्यंत्रा की यह दुर्गति होने पर चिढ़ गया और उसने संत रविदास जी को बंदी बना लिया और उनके अनुयायियों को हिन्दुओं में सदैव से निषिद्ध खाल उतारने, चमड़ा कमाने, जूते बनाने के काम में लगाया। इसी दुष्ट ने चंवर वंश के क्षत्रियों को अपमानित करने के लिये नाम बिगाड़ कर चमार सम्बोधित किया। चमार शब्द का पहला प्रयोग यहीं से शुरू हुआ। संत रविदास जी महाराज की ये पंक्तियाँ सिकंदर लोधी के अत्याचार का वर्णन करती हैं।
वेद धर्म सबसे बड़ा, अनुपम सच्चा ज्ञान
फिर मैं क्यों छोड़ूँ इसे पढ़ लूँ झूट क़ुरान
वेद धर्म छोड़ूँ नहीं कोसिस करो हजार
तिल-तिल काटो चाही गोदो अंग कटार
चंवर वंश के क्षत्रिय संत रविदास जी के बंदी बनाने का समाचार मिलने पर दिल्ली पर चढ़ दौड़े और दिल्लीं की नाकाबंदी कर ली। विवश हो कर सुल्तान सिकंदर लोदी को संत रविदास जी को छोड़ना पड़ा । इस झपट का ज़िक्र इतिहास की पुस्तकों में नहीं है मगर संत रविदास जी के ग्रन्थ रविदास रामायण की यह पंक्तियाँ सत्य उद्घाटित करती हैं
बादशाह ने वचन उचारा । मत प्यादरा इसलाम हमारा ।।
खंडन करै उसे रविदासा । उसे करौ प्राण कौ नाशा ।।
जब तक राम नाम रट लावे । दाना पानी यह नहीं पावे ।।
जब इसलाम धर्म स्वीरकारे । मुख से कलमा आप उचारै ।।
पढे नमाज जभी चितलाई । दाना पानी तब यह पाई ।।
जैसे उस काल में इस्लामिक शासक हिंदुओं को मुसलमान बनाने के लिए हर संभव प्रयास करते रहते थे वैसे ही आज भी कर रहे हैं। उस काल में दलितों के प्रेरणास्रोत्र संत रविदास सरीखे महान चिंतक थे। जिन्हें अपने प्रान न्योछावर करना स्वीकार था मगर वेदों को त्याग कर क़ुरान पढ़ना स्वीकार नहीं था।
इस्लाम की आलोचना करने वाले संत रविदास श्री राम का गुणगान करते मिलते है। प्रमाण देखिये-
1. हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरि
    हरि सिमरत जन गए निस्तरि तरे।१। रहाउ।।
    हरि के नाम कबीर उजागर ।। जनम जनम के काटे कागर ।।१।।
    निमत नामदेउ दूधु पिआइआ।। तउ जग जनम संकट नहीं आइआ ।।२।।
    जन रविदास राम रंगि राता ।। इउ गुर परसादी नरक नहीं जाता ।।३।।
– आसा बाणी स्त्री रविदास जिउ की, पृष्ठ 487
 सन्देश- इस चौपाई में संत रविदास जी कह रहे है कि जो राम के रंग में (भक्ति में) रंग जायेगा वह कभी नरक नहीं जायेगा।
 2. जल की भीति पवन का थंभा रकत बुंद का गारा।
हाड मारा नाड़ी को पिंजरु पंखी बसै बिचारा ।।१।।
प्रानी किआ मेरा किआ तेरा।।  जेसे तरवर पंखि बसेरा ।।१।। रहाउ।।
राखउ कंध उसारहु नीवां ।। साढे तीनि हाथ तेरी सीवां ।।२।।
बंके वाल पाग सिरि डेरी ।।इहु तनु होइगो भसम की ढेरी ।।३।।
ऊचे मंदर सुंदर नारी ।। राम नाम बिनु बाजी हारी ।।४।।
मेरी जाति कमीनी पांति कमीनी ओछा जनमु हमारा ।।
तुम सरनागति राजा राम चंद कहि रविदास चमारा ।।५।।
– सोरठी बाणी रविदास जी की, पृष्ठ 659
सन्देश- रविदास जी कह रहे है कि राम नाम बिना सब व्यर्थ है।
कबीर दास का चिंतन
कबीर दास इस्लामिक सुन्नत, रोजा, नमाज़, कलमा, काबा, बांग और ईद पर क़ुरबानी का स्पष्ट खंडन करते थे। सिखों के प्रसिद्द ग्रन्थ गुरु ग्रन्थ साहिब में कबीर साहिब के इस्लाम संबंधी चिंतन को यहाँ पर प्रस्तुत किया जा रहा है।
1. सुन्नत का खंडन
 काजी तै कवन कतेब बखानी ॥
पदत गुनत ऐसे सभ मारे किनहूं खबरि न जानी ॥१॥ रहाउ ॥
सकति सनेहु करि सुंनति करीऐ मै न बदउगा भाई ॥
जउ रे खुदाइ मोहि तुरकु करैगा आपन ही कटि जाई ॥२॥
सुंनति कीए तुरकु जे होइगा अउरत का किआ करीऐ ॥
अरध सरीरी नारि न छोडै ता ते हिंदू ही रहीऐ ॥३॥
छाडि कतेब रामु भजु बउरे जुलम करत है भारी ॥
कबीरै पकरी टेक राम की तुरक रहे पचिहारी ॥४॥८॥
                                                       सन्दर्भ- राग आसा कबीर पृष्ठ 477
अर्थात कबीर जी कहते हैं ओ काजी तो कौनसी किताब का बखान करता है। पढ़ते हुऐ, विचरते हुऐ सब को ऐसे मार दिया जिनको पता ही नहीं चला। जो धर्म के प्रेम में सख्ती के साथ मेरी सुन्नत करेगा सो मैं नहीं कराऊँगा। यदि खुदा सुन्नत करने ही से ही मुसलमान करेगा तो अपने आप लिंग नहीं कट जायेगा। यदि सुन्नत करने से ही मुस्लमान होगा तो औरत का क्या करोगे? अर्थात कुछ नहीं और अर्धांगि नारी को छोड़ते नहीं इसलिए हिन्दू ही रहना अच्छा है। ओ काजी! क़ुरान को छोड़! राम भज१ तू बड़ा भारी अत्याचार कर रहा है, मैंने तो राम की टेक पकड़ ली हैं, मुस्लमान सभी हार कर पछता रहे है।
2. रोजा, नमाज़, कलमा, काबा का खंडन
रोजा धरै निवाज गुजारै कलमा भिसति न होई ॥
सतरि काबा घट ही भीतरि जे करि जानै कोई ॥२॥
सन्दर्भ- राग आसा कबीर पृष्ठ 480
अर्थात मुसलमान रोजा रखते हैं और नमाज़ गुजारते है। कलमा पढ़ते है।  और कबीर जी कहते  हैं  इन किसी से बहिश्त न होगी। इस घट (शरीर) के अंदर ही 70 काबा के अगर कोई विचार कर देखे तो।
कबीर हज काबे हउ जाइ था आगै मिलिआ खुदाइ ॥
सांई मुझ सिउ लरि परिआ तुझै किन्हि फुरमाई गाइ ॥१९७॥
सन्दर्भ- राग आसा कबीर पृष्ठ 1375
अर्थात कबीर जी कहते हैं मैं हज करने काबे जा रहा था आगे खुदा मिल गया , वह खुदा मुझसे लड़ पड़ा और बोला ओ कबीर तुझे किसने बहका दिया।
3. बांग का खंडन
कबीर मुलां मुनारे किआ चढहि सांई न बहरा होइ ॥
जा कारनि तूं बांग देहि दिल ही भीतरि जोइ ॥१८४॥
सन्दर्भ- राग आसा कबीर पृष्ठ 1374
अर्थात कबीर जी कहते हैं की ओ मुल्ला। खुदा बहरा नहीं जो ऊपर चढ़ कर बांग दे रहा है। जिस कारण तू बांग दे रहा हैं उसको दिल ही में तलाश कर।
4. हिंसा (क़ुरबानी) का खंडन
जउ सभ महि एकु खुदाइ कहत हउ तउ किउ मुरगी मारै ॥१॥
मुलां कहहु निआउ खुदाई ॥ तेरे मन का भरमु न जाई ॥१॥ रहाउ ॥
पकरि जीउ आनिआ देह बिनासी माटी कउ बिसमिलि कीआ ॥
जोति सरूप अनाहत लागी कहु हलालु किआ कीआ ॥२॥
किआ उजू पाकु कीआ मुहु धोइआ किआ मसीति सिरु लाइआ ॥
जउ दिल महि कपटु निवाज गुजारहु किआ हज काबै जाइआ ॥३॥
सन्दर्भ विलास प्रभाती कबीर पृष्ठ 1350
अर्थात कबीर जी कहते है ओ मुसलमानों। जब तुम सब में एक ही खुद बताते हो तो तुम मुर्गी को क्यों मारते हो। ओ मुल्ला! खुदा का न्याय विचार कर कह। तेरे मन का भ्रम नहीं गया है। पकड़ करके जीव ले आया, उसकी देह को नाश कर दिया, कहो मिटटी को ही तो बिस्मिल किया।  तेरा ऐसा करने से तेरा पाक उजू क्या, मुह धोना क्या, मस्जिद में सिजदा करने से क्या, अर्थात  हिंसा करने से तेरे सभी काम बेकार हैं।
कबीर भांग माछुली सुरा पानि जो जो प्रानी खांहि ॥
तीरथ बरत नेम कीए ते सभै रसातलि जांहि ॥२३३॥
सन्दर्भ विलास प्रभाती कबीर पृष्ठ 1377
अर्थात कबीर जी कहते हैं जो प्राणी भांग, मछली और शराब पीते हैं, उनके तीर्थ व्रत नेम करने पर भी सभी रसातल को जायेंगे।
 रोजा धरै मनावै अलहु सुआदति जीअ संघारै ॥
आपा देखि अवर नही देखै काहे कउ झख मारै ॥१॥
काजी साहिबु एकु तोही महि तेरा सोचि बिचारि न देखै ॥
खबरि न करहि दीन के बउरे ता ते जनमु अलेखै ॥१॥ रहाउ ॥
सन्दर्भ रास आगा कबीर पृष्ठ 483
अर्थात ओ काजी साहिब तू रोजा रखता हैं अल्लाह को याद करता है, स्वाद के कारण जीवों को मारता है। अपना देखता हैं दूसरों को नहीं देखता हैं। क्यों समय बर्बाद कर रहा हैं। तेरे ही अंदर तेरा एक खुदा हैं। सोच विचार के नहीं देखता हैं। ओ दिन के पागल खबर नहीं करता हैं इसलिए तेरा यह जन्म व्यर्थ है।
इसके ठीक विपरीत कबीर साहिब श्री राम के गुणगान करते और गौसेवा के लिए प्रेरणा देते मिलते है। प्रमाण देखिये-
कबीर कूता राम का, मुतिया मेरा नाऊँ।गले राम की जेवडी ज़ित खैंचे तित जाऊँ।।”
कबीर निरभै राम जपि, जब लग दीवै बाती।तेल घटया बाती बुझी, सोवेगा दिन राति।।”
” जाति पांति पूछै नहिं कोई। हरि को भजै सो हरि का होई।।”
साधो देखो जग बौराना,सांची कहौं तो मारन धावै,झूठे जग पतियाना।
अब मोहि राम भरोसा तेरा,
जाके राम सरीखा साहिब भाई, सों क्यूँ अनत पुकारन जाई॥
जा सिरि तीनि लोक कौ भारा, सो क्यूँ न करै जन को प्रतिपारा॥
कहै कबीर सेवौ बनवारी, सींची पेड़ पीवै सब डारी॥114॥
कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढत बन माहि !!
!! ज्यो घट घट राम है, दुनिया देखे नाही !!
श्री राम जी के गुणगान के अनेक प्रमाण कबीर रचनावली में मिलते है। बहुत कम लोग जानते है कि कबीर दास ने गौरक्षा के लिए अपना विवाह करवाने से मना कर दिया था। उनके वधुपक्ष वाले उनके विवाह में गोमांस परोसने की योजना बना रहे थे। कबीर दास गौप्रेमी थे। उन्होंने स्पष्ट कह दिया। अगर गौमाता कटी तो वह विवाह नहीं करेंगे। अंत में कबीर दास ने वह गौ एक ब्राह्मण को दे दी। तब जाकर उनका विवाह संपन्न हुआ।
इन सभी प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि दलित संत वेद, तीर्थ, जप, राम-कृष्ण,यज्ञपवीत, गौरक्षा आदि वैदिक परम्पराओं में अटूट विश्वास रखते थे एवं इस्लाम की मान्यताओं के कटु आलोचक थे।
6. डॉ अम्बेडकर का इस्लाम सम्बंधित चिंतन
डॉ अम्बेडकर को इस्लाम स्वीकार करने के अनेक प्रलोभन दिए गए। स्वयं उस काल में विश्व का सबसे धनी व्यक्ति हैदराबाद का निज़ाम इस्लाम स्वीकार करने के लिए बड़ी धनराशि का प्रलोभन देने आया। मगर जातिवाद का कटु विष पीने का अनुभव कर चुके डॉ अम्बेडकर ने न ईसाई मत को स्वीकार किया और न इस्लाम मत को स्वीकार किया। क्योंकि वह जानते थे कि इस्लाम मत स्वीकार करने से दलितों का किसी भी प्रकार से हित नहीं हो सकता। अपनी पुस्तक भारत और पाकिस्तान के विभाजन में उन्होंने इस्लाम मत पर अपने विचार खुल कर प्रकट किये है ,इसीलिए उन्होंने 1947 में पाकिस्तान और बांग्लादेश में रहने वाले सभी हिन्दू दलितों को भारत आने का निमंत्रण दिया था।
  डॉ अम्बेडकर के इस्लाम के विषय में विचार
१. हिन्दू काफ़िर सम्मान के योग्य नहीं-”मुसलमानों के लिए हिन्दू काफ़िर हैं, और एक काफ़िर सम्मान के योग्य नहीं है। वह निम्न कुल में जन्मा होता है, और उसकी कोई सामाजिक स्थिति नहीं होती। इसलिए जिस देश में क़ाफिरों का शासनहो, वह मुसलमानों के लिए दार-उल-हर्ब है ऐसी सति में यह साबित करने के लिए और सबूत देने की आवश्यकता नहीं है कि मुसलमान हिन्दू सरकार के शासन को स्वीकार नहीं करेंगे।” (पृ. ३०४)
२. मुस्लिम भ्रातृभाव केवल मुसलमानों के लिए-”इस्लाम एक बंद निकाय की तरह है, जो मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच जो भेद यह करता है, वह बिल्कुल मूर्त और स्पष्ट है। इस्लाम का भ्रातृभाव मानवता का भ्रातृत्व नहीं है, मुसलमानों का मुसलमानों से ही भ्रातृभाव मानवता का भ्रातृत्व नहीं है, मुसलमानों का मुसलमानों से ही भ्रातृत्व है। यह बंधुत्व है, परन्तु इसका लाभ अपने ही निकाय के लोगों तक सीमित है और जो इस निकाय से बाहर हैं, उनके लिए इसमें सिर्फ घृणा ओर शत्रुता ही है। इस्लाम का दूसरा अवगुण यह है कि यह सामाजिक स्वशासन की एक पद्धति है और स्थानीय स्वशासन से मेल नहीं खाता, क्योंकि मुसलमानों की निष्ठा, जिस देश में वे रहते हैं, उसके प्रति नहीं होती, बल्कि वह उस धार्मिक विश्वास पर निर्भर करती है, जिसका कि वे एक हिस्सा है। एक मुसलमान के लिए इसके विपरीत या उल्टे सोचना अत्यन्त दुष्कर है। जहाँ कहीं इस्लाम का शासन हैं, वहीं उसका अपना विश्वासहै। दूसरे शब्दों में, इस्लाम एक सच्चे मुसलमानों को भारत को अपनी मातृभूमि और हिन्दुओं को अपना निकट सम्बन्धी मानने की इज़ाजत नहीं देता। सम्भवतः यही वजह थी कि मौलाना मुहम्मद अली जैसे एक महान भारतीय, परन्तु सच्चे मुसलमान ने, अपने, शरीर को हिन्दुस्तान की बजाए येरूसलम में दफनाया जाना अधिक पसंद किया।”
३. एक साम्प्रदायिक और राष्ट्रीय मुसलमान में अन्तर देख पाना मुश्किल-”लीग को बनाने वाले साम्प्रदायिक मुसलमानों और राष्ट्रवादी मुसलमानों के अन्तर को समझना कठिन है। यह अत्यन्त संदिग्ध है कि राष्ट्रवादी मुसलमान किसी वास्तविक जातीय भावना, लक्ष्य तथा नीति से कांग्रेस के साथ रहते हैं, जिसके फलस्वरूप वे मुस्लिम लीग् से पृथक पहचाने जाते हैं। यह कहा जाता है कि वास्तव में अधिकांश कांग्रेसजनों की धारण है कि इन दोनों में कोई अन्तर नहीं है, और कांग्रेस के अन्दर राष्ट्रवादी मुसलमानों की स्थिति साम्प्रदायिक मुसलमानों की सेना की एक चौकी की तरह है। यह धारणा असत्य प्रतीत नहीं होती। जब कोई व्यक्ति इस बात को याद करता है कि राष्ट्रवादी मुसलमानों के नेता स्वर्गीय डॉ. अंसारी ने साम्प्रदायिक निर्णय का विरोध करने से इंकार किया था, यद्यपिकांग्रेस और राष्ट्रवादी मुसलमानों द्वारा पारित प्रस्ताव का घोर विरोध होने पर भी मुसलमानों को पृथक निर्वाचन उपलब्ध हुआ।” (पृ. ४१४-४१५)
४. भारत में इस्लाम के बीज मुस्लिम आक्रांताओं ने बोए-”मुस्लिम आक्रांता निस्संदेह हिन्दुओं के विरुद्ध घृणा के गीत गाते हुए आए थे। परन्तु वे घृणा का वह गीत गाकर और मार्ग में कुछ मंदिरों को आग लगा कर ही वापस नहीं लौटे। ऐसा होता तो यह वरदान माना जाता। वे ऐसे नकारात्मक परिणाम मात्र से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने इस्लाम का पौधा लगाते हुए एक सकारात्मक कार्य भी किया। इस पौधे का विकास भी उल्लेखनीय है। यह ग्रीष्म में रोपा गया कोई पौधा नहीं है। यह तो ओक (बांज) वृक्ष की तरह विशाल और सुदृढ़ है। उत्तरी भारत में इसका सर्वाधिक सघन विकास हुआ है। एक के बाद हुए दूसरे हमले ने इसे अन्यत्र कहीं को भी अपेक्षा अपनी ‘गाद’ से अधिक भरा है और उन्होंने निष्ठावान मालियों के तुल्य इसमें पानी देने का कार्य किया है। उत्तरी भारत में इसका विकास इतना सघन है कि हिन्दू और बौद्ध अवशेष झाड़ियों के समान होकर रह गए हैं; यहाँ तक कि सिखों की कुल्हाड़ी भी इस ओक (बांज) वृक्ष को काट कर नहीं गिरा सकी।” (पृ. ४९)
५. मुसलमानों की राजनीतिक दाँव-पेंच में गुंडागर्दी-”तीसरी बात, मुसलमानों द्वारा राजनीति में अपराधियों के तौर-तरीके अपनाया जाना है। दंगे इस बात के पर्याप्त संकेत हैं कि गुंडागिर्दी उनकी राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है।” (पृ. २६७)
दलित मुस्लिम एकता असंभव हैं। हमारे देश का इतिहास, इस्लाम की मान्यताएं, दलित संतों और सबसे बढ़कर डॉ अम्बेडकर के चिंतन, वर्तमान में पाकिस्तान जैसे देश में दलितों की स्थिति देखकर यह स्पष्ट हो जाता हैं। अब भी दलित हिन्दू नहीं सुधरे तो उनका भविष्य घोर अंधकार का शिकार हो जायेगा।

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