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Archive for the ‘Hindus’ History’ Category

From: Pramod Agrawal < >

वीर शिवाजी जी मुस्लिम नीति एवं औरंगज़ेब की धर्मान्धता- एक तुलनात्मक अध्ययन 

महाराष्ट्र के पुणे से सोशल मीडिया में शिवाजी को अपमानित करने की मंशा से उनका चित्र डालना और उसकी प्रतिक्रिया में एक इंजीनियर की हत्या इस समय की सबसे प्रचलित खबर हैं। दोषी कौन हैं और उन्हें क्या दंड मिलना चाहिए यह तो न्यायालय तय करेगा जिसमें हमारी पूर्ण आस्था हैं। परन्तु सत्य यह हैं की जो लोग गलती कर रहे हैं वे शिवाजी की मुस्लिम नीति, उनकी न्यायप्रियता, उनकी निष्पक्षता, उनकी निरपराधी के प्रति संवेदना से परिचित नहीं हैं। सबसे अधिक विडंबना का कारण इतिहास ज्ञान से शुन्य होना हैं।  मुस्लिम समाज के कुछ सदस्य शिवाजी की इसलिए विरोध करते हैं क्यूंकि उन्हें यह बताया गया हैं की शिवाजी ने औरंगज़ेब जिसे आलमगीर अर्थात इस्लाम का रखवाला भी कहा जाता था का विरोध किया था। शिवाजी ने औरंगज़ेब की मध्य भारत से पकड़ ढीली कर दी जिसके कारण उनके कई किले और इलाकें उनके हाथ से निकल गए। यह सब घंटनाएँ ३०० वर्ष से भी पहले हुई और इनके कारण लोग अभी भी संघर्ष कर रहे हैं। यह संघर्ष इस्लामिक साम्राज्यवाद की उस मानसिकता का वह पहलु हैं जिसके कारण भारत देश में पैदा होने वाला मुसलमान जिसके पूर्वज हिन्दू थे जिन्हे कभी बलात इस्लाम में दीक्षित किया गया था, आज भारतीय होने से अधिक इस्लामिक सोच, इस्लामिक पहनावे, इस्लामिक खान-पान, अरब की भूमि से न केवल अधिक प्रभावित हैं अपितु उसे आदर्श भी मानता हैं। सत्य इतिहास के गर्भ में हैं की औरंगज़ेब कितना इस्लाम की शिक्षाओं के निकट था और शिवाजी का मुसलमानों के प्रति व्यवहार कैसा था। दोनों की तुलना करने से उत्तर स्पष्ट सिद्ध हो जायेगा।
औरंगजेब द्वारा हिन्दू मंदिरों को तोड़ने के लिए जारी किये गए फरमानों का कच्चाचिट्ठा

 १. १३ अक्तूबर,१६६६- औरंगजेब ने मथुरा के केशव राय मंदिर से नक्काशीदार जालियों को जोकि उसके बड़े भाई दारा शिको द्वारा भेंट की गयी थी को तोड़ने का हुक्म यह कहते हुए दिया की किसी भी मुसलमान के लिए एक मंदिर की तरफ देखने तक की मनाही हैंऔर दारा शिको ने जो किया वह एक मुसलमान के लिए नाजायज हैं। 
 २. ३,१२ सितम्बर १६६७- औरंगजेब के आदेश पर दिल्ली के प्रसिद्द कालकाजी मंदिर को तोड़ दिया गया।  
३. ९ अप्रैल १६६९ को मिर्जा राजा जय सिंह अम्बेर की मौत के बाद औरंगजेब के हुक्म से उसके पूरे राज्य में जितने भी हिन्दू मंदिर थे उनको तोड़ने का हुक्म दे दिया गया और किसी भी प्रकार की हिन्दू पूजा पर पाबन्दी लगा दी गयी जिसके बाद केशव देव राय के मंदिर को तोड़ दिया गया और उसके स्थान पर मस्जिद बना दी गयी।  मंदिर की मूर्तियों को तोड़ कर आगरा लेकर जाया गया और उन्हें मस्जिद की सीढियों में दफ़न करदिया गया और मथुरा का नाम बदल कर इस्लामाबाद कर दिया गया।  इसके बाद औरंगजेब ने गुजरात में सोमनाथ मंदिर का भी विध्वंश कर दिया। 
 ४. ५ दिसम्बर १६७१ औरंगजेब के शरीया को लागु करने के फरमान से गोवर्धन स्थित श्री नाथ जी की मूर्ति को पंडित लोग मेवाड़ राजस्थान के सिहाद गाँव ले गए जहाँ के राणा जी ने उन्हें आश्वासन दिया की औरंगजेब की इस मूर्ति तक पहुँचने से पहले एक लाख वीर राजपूत योद्धाओं को मरना पड़ेगा। 
५. २५ मई १६७९ को जोधपुर से लूटकर लाई गयी मूर्तियों के बारे में औरंगजेब ने हुकुम दिया की सोने-चाँदी-हीरे से सज्जित मूर्तियों को जिलालखाना में सुसज्जित कर दिया जाये और बाकि मूर्तियों को जमा मस्जिद की सीढियों में गाड़ दिया जाये। 
 ६ . २३ दिसम्बर १६७९ औरंगजेब के हुक्म से उदयपुर के महाराणा झील के किनारे बनाये गए मंदिरों को तोड़ा गया।  महाराणा के महल के सामने बने जगन्नाथ के मंदिर को मुट्ठी भर वीर राजपूत सिपाहियों ने अपनी बहादुरी से बचा लिया। 
 ७ . २२ फरवरी १६८० को औरंगजेब ने चित्तोड़ पर आक्रमण कर महाराणा कुम्भा द्वाराबनाएँ गए ६३ मंदिरों को तोड़ डाला। 
८. १ जून १६८१ औरंगजेब ने प्रसिद्द पूरी का जगन्नाथ मंदिर को तोड़ने का हुकुम दिया। 
९. १३ अक्टूबर १६८१ को बुरहानपुर में स्थित मंदिर को मस्जिद बनाने का हुकुमऔरंगजेब द्वारा दिया गया। 
१०. १३ सितम्बर १६८२ को मथुरा के नन्द माधव मंदिर को तोड़ने का हुकुम औरंगजेब द्वारा दिया गया। इस प्रकार अनेक फरमान औरंगजेब द्वारा हिन्दू मंदिरों को तोड़ने के लिए जारी किये गए।


हिन्दुओं पर औरंगजेब द्वारा अत्याचार करना 


२ अप्रैल १६७९ को औरंगजेब द्वारा हिन्दुओं पर जजिया कर लगाया गया जिसका हिन्दुओं ने दिल्ली में बड़े पैमाने पर शांतिपूर्वक विरोध किया परन्तु उसे बेरहमी से कुचल दिया गया।  इसके साथ-साथ मुसलमानों को करों में छूट दे दी गयी जिससे हिन्दू अपनी निर्धनता और कर न चूका पाने की दशा में इस्लाम ग्रहण कर ले। १६ अप्रैल १६६७ को औरंगजेब ने दिवाली के अवसर पर आतिशबाजी चलाने से और त्यौहार बनाने से मना कर दिया गया। इसके बाद सभी सरकारी नौकरियों से हिन्दू क्रमचारियों को निकाल कर उनके स्थान पर मुस्लिम क्रमचारियों की भरती का फरमान भी जारी कर दिया गया।  हिन्दुओं को शीतला माता, पीर प्रभु आदि के मेलों में इकठ्ठा न होने का हुकुम दिया गया। हिन्दुओं को पालकी, हाथी, घोड़े की सवारी की मनाई कर दी गयी। कोई हिन्दू अगर इस्लाम ग्रहण करता तो उसे कानूनगो बनाया जाता और हिन्दू पुरुष को इस्लाम ग्रहण करनेपर ४ रुपये और हिन्दू स्त्री को २ रुपये मुसलमान बनने के लिए दिए जाते थे। ऐसे न जाने कितने अत्याचार औरंगजेब ने हिन्दू जनता पर किये और आज उसी द्वारा जबरन मुस्लिम बनाये गए लोगों के वंशज उसका गुण गान करते नहीं थकते हैं।

वीर शिवाजी द्वारा औरंगज़ेब को पत्र लिखकर उसके अत्याचारों के प्रति आगाह करना


वीर शिवाजी ने हिन्दुओं की ऐसी दशा को देखकर व्यथित मन से औरंगजेब को उसके अत्याचारों से अवगत करने के लिए एक पत्र लिखा था। इस पत्र को सर जदुनाथ सरकार अपने शब्दों में तार्किक, शांत प्रबोधन एवं राजनितिक सूझ बुझ से बुना गया बताया हैं।
वीर शिवाजी लिखते हैं की सभी जगत के प्राणी ईश्वर की संतान  हैं। कोई भी राज्य तब उन्नति करता हैं जब उसके सभी सदस्य सुख शांति एवं सुरक्षा की भावना से वहाँ पर निवास करते हैं। इस्लाम अथवा हिन्दू एक ही सिक्के के दो पहलु हैं। कोई मस्जिद में पूजा करता हैं , कोई मंदिर में पूजा करता हैं पर सभी उस एक ईश्वर की पूजा करते हैं। यहाँ तक की कुरान में भी उसी एक खुदा या ईश्वर के विषय में कहा गया हैं जो केवल मुसलमानों का खुदा नहीं हैं बल्कि सभी का खुदा हैं। मुग़ल राज्य में जजिया एक नाजायज़, अविवेकपूर्ण, अनुपयुक्त अत्याचार हैं जो तभी उचित होता जब राज्य की प्रजा सुरक्षित एवं सुखी होती पर सत्य यह हैं की हिन्दुओं पर जबरदस्ती जजिया के नाम पर भारी कर लगाकर उन्हें गरीब से गरीब बनाया जा रहा हैं। धरती के सबसे अमीर सम्राट के लिए गरीब भिखारियों, साधुओं ,ब्राह्मणों, अकाल पीड़ितो पर कर लगाना अशोभनीय हैं।मच्छर और मक्खियों को मारना कोई बहादुरी का काम नहीं हैं।
अगर औरंगजेब में कोई वीरता हैं तो उदयपुर के राणा और इस पत्र के लेखक से जजिया वसूल कर दिखाए।  
अपने अहंकार और धर्मान्धता में चूर औरंगजेब ने शिवाजी के पत्र का कोई उत्तर न दिया पर शिवाजी ने एक ऐसी जन चेतना और अग्नि प्रजलवित कर दी थी जिसको बुझाना आसान नहीं था।
वीर शिवाजी हिन्दू धर्म के लिए उतने ही समर्पित थे जितना औरंगजेब इस्लाम के लिए समर्पित था परन्तु दोनों में एक भारी भेद था।
शिवाजी अपने राज्य में किसी भी धर्म अथवा मत को मानने वालों पर किसी भी का अत्याचार करते थे एवं उन्हें अपने धर्म को मानने में किसी भी प्रकार की कोई मनाही नहीं थी।

इस्लाम के विषय में शिवाजी की निति


१. अफजल खान को मरने के बाद उसके पूना, इन्दापुर, सुपा, बारामती आदि इलाकों पर शिवाजी का राज स्थापित हो गया। एक ओर तो अफजल खान ने धर्मान्धता में तुलजापुर और पंडरपुर के मंदिरों का संहार किया था दूसरी और शिवाजी ने अपने अधिकारीयों को सभी मंदिर के साथ साथ मस्जिदों को भी पहले की ही तरह दान देने की आज्ञा जारी की थी।

२. बहुत कम लोगों को यह ज्ञात हैं की औरंगजेब ने स्वयं शिवाजी को चार बार अपने पत्रों में इस्लाम का संरक्षक बताया था। ये पत्र १४ जुलाई १६५९, २६ अगस्त एवं २८ अगस्त १६६६ एवं ५ मार्च १६६८ को लिखे गए थे। (सन्दर्भ Raj Vlll, 14,15,16 Documents )

३. डॉ फ्रायर ने कल्याण जाकर शिवाजी की धर्म निरपेक्ष नीति की अपने लेखों में प्रशंसा की हैं। Fryer, Vol I, p. 41n

४. ग्रांट डफ़ लिखते हैं की शिवाजी ने अपने जीवन में कभी भी मुस्लिम सुल्तान द्वारा दरगाहों ,मस्जिदों , पीर मज़ारों आदि को दिए जाने वाले दान को नहीं लूटा। सन्दर्भ History of the Mahrattas, p 104

५. डॉ दिल्लों लिखते हैं की वीर शिवाजी को उस काल के सभी राज नीतिज्ञों में सबसे उदार समझा जाता था।सन्दर्भ Eng.Records II,348

६. शिवाजी के सबसे बड़े आलोचकों में से एक खाफी खाँ जिसने शिवाजी की मृत्यु पर यह लिखा था की अच्छा हुआ एक काफ़िर का भार धरती से कम हुआ भी शिवाजी की तारीफ़ करते हुए अपनी पुस्तक के दुसरे भाग के पृष्ठ 110 पर लिखता हैं की शिवाजी का आम नियम था की कोई मनुष्य मस्जिद को हानि न पहुँचायेगा , लड़की को न छेड़े , मुसलमानों के धर्म की हँसी न करे तथा उसको जब कभी कही कुरान हाथ आता तो वह उसको किसी न किसी मुस्लमान को दे देता था। औरतों का अत्यंत आदर करता था और उनको उनके रिश्तेदारों के पास पहुँचा देता था। अगर कोई लड़की हाथ आती तो उसके बाप के पास पहुँचा देता। लूट खसोट में गरीबों और काश्तकारों की रक्षा करता था। ब्राह्मणों और गौ के लिए तो वह एक देवता था। यद्यपि बहुत से मनुष्य उसको लालची बताते हैं परन्तु उसके जीवन के कामों को देखने से विदित हो जाता हैं की वह जुल्म और अन्याय से धन इकठ्ठा करना अत्यंत नीच समझता था।
सन्दर्भ लाला लाजपत राय कृत छत्रपती शिवाजी पृष्ठ 132 ,संस्करण चतुर्थ, संवत 1983

७. शिवाजी जंजिरा पर विजय प्राप्त करने के लिए केलशी के मुस्लिम बाबा याकूत से आशीर्वाद तक मांगने गए थे।
सन्दर्भ – Vakaskar,91 Q , bakshi p.130
८. शिवाजी ने अपनी सेना में अनेक मुस्लिमों को रोजगार दिया था।

१६५० के पश्चात बीजापुर, गोलकोंडा, मुग़लों की रियासत से भागे अनेक मुस्लिम , पठान व फारसी सैनिकों को विभिन्न ओहदों पर शिवाजी द्वारा रखा गया था जिनकी धर्म सम्बन्धी आस्थायों में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया जाता था और कई तो अपनी मृत्यु तक शिवाजी की सेना में ही कार्यरत रहे। कभी शिवाजी के विरोधी रहे सिद्दी संबल ने शिवाजी की अधीनता स्वीकार कर की थी और उसके पुत्र सिद्दी मिसरी ने शिवाजी के पुत्र शम्भा जी की सेना में काम किया था। शिवाजी की दो टुकड़ियों के सरदारों का नाम इब्राहीम खान और दौलत खान था जो मुग़लों के साथ शिवाजी के युद्ध में भाग लेते थे। क़ाज़ी हैदर के नाम से शिवाजी के पास एक मुस्लिम था जो की ऊँचे ओहदे पर था। फोंडा के किले पर अधिकार करने के बाद शिवाजी ने उसकी रक्षा की जिम्मेदारी एक मुस्लिम फौजदार को दी थी। बखर्स के अनुसार जब आगरा में शिवाजी को कैद कर लिया गया था तब उनकी सेवा में एक मुस्लिम लड़का भी था जिसे शिवाजी के बच निकलने का पूरा वृतांत मालूम था। शिवाजी के बच निकलने के पश्चात उसे अत्यंत मार मारने के बाद भी स्वामी भक्ति का परिचय देते हुए अपना मुँह कभी नहीं खोला था। शिवाजी के सेना में कार्यरत हर मुस्लिम सिपाही चाहे किसी भी पद पर हो , शिवाजी की न्याय प्रिय एवं सेक्युलर नीति के कारण उनके जीवन भर सहयोगी बने रहे।
सन्दर्भ Shivaji the great -Dr Bal Kishan vol 1 page 177

शिवाजी सर्वदा इस्लामिक विद्वानों और पीरों की इज्ज़त करते थे। उन्हें धन,उपहार आदि देकर सम्मानित करते थे। उनके राज्य में हिन्दू-मुस्लिम के मध्य किसी भी प्रकार का कोई भेद नहीं था। जहाँ हिन्दुओं को मंदिरों में पूजा करने में कोई रोक टोक नहीं थी वहीँ मुसलमानों को मस्जिद में नमाज़ अदा करने से कोई भी नहीं रोकता था। किसी दरगाह, मस्जिद आदि को अगर मरम्मत की आवश्यकता होती तो उसके लिए राज कोष से धन आदि का सहयोग भी शिवाजी द्वारा दिया जाता था। इसीलिए शिवाजी के काल में न केवल हिन्दू अपितु अनेक मुस्लिम राज्यों से मुस्लिम भी शिवाजी के राज्य में आकर बसे थे।

शिवाजी की मुस्लिम नीति और न्याप्रियता  की जीती जागती मिसाल हैं। पाठक मुस्लिम परस्त औरंगज़ेब की धर्मांध नीति एवं न्यायप्रिय शिवाजी की धर्म नीति में भेद को भली प्रकार से समझ सकते हैं। फिर भी मुस्लिम समाज के कुछ सदस्य औरंगज़ेब के पैरोकार बने  फिरते हैं और शिवाजी की आलोचना करते घूमते हैं। सत्य के दर्शन होने पर सत्य को स्वीकार करने वाला जीवन में प्रगति करता हैं।

डॉ विवेक आर्य

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From: Pramod Agraval < >

 

कुतुबुद्दीन की मौत ..और सत्य ..!!!


इतिहास की किताबो में लिखा है कि उसकी मौत पोलो खेलते समय घोड़े से गिरने पर से हुई ..!!!
ये अफगान / तुर्क लोग “पोलो” नहीं खेलते थे, पोलो खेल अंग्रेजों ने शुरू किया ..!!!
अफगान / तुर्क लोग बुजकशी खेलते हैं जिसमे एक बकरे को मारकर उसे लेकर घोड़े पर भागते है, जो उसे लेकर मंजिल तक पहुंचता है, वो जीतता है।


कुतबुद्दीन ने अजमेर के विद्रोह को कुचलने के बाद राजस्थान के अनेकों इलाकों में कहर बरपाया था। उसका सबसे कडा विरोध उदयपुर के राजा ने किया, परन्तु कुतुबद्दीन उसको हराने में कामयाब रहा।
उसने धोखे से राजकुंवर कर्णसिंह को बंदी बनाकर और उनको जान से मारने की धमकी देकर, राजकुंवर और उनके घोड़े शुभ्रक को पकड कर लाहौर ले आया।


एक दिन राजकुंवर ने कैद से भागने की कोशिश की, लेकिन पकड़ा गया। इस पर क्रोधित होकर कुतुबुद्दीन ने उसका सर काटने का हुकुम दिया ..!!


दरिंदगी दिखाने के लिए उसने कहा कि, –
बुजकशी खेला जाएगा लेकिन, इसमें बकरे की जगह राजकुंवर का कटा हुआ सर इस्तेमाल होगा।
कुतुबुद्दीन ने इस काम के लिए, अपने लिए घोड़ा भी राजकुंवर का “शुभ्रक” को चुना ..!!!
कुतुबुद्दीन “शुभ्रक” पर सवार होकर अपनी टोली के साथ जन्नत बाग में पहुंचा।
राजकुंवर को भी जंजीरों में बांधकर वहां लाया गया। जब राजकुंवर का सर काटने के लिए जैसे ही उनकी जंजीरों को खोला गया, शुभ्रक ने उछलकर कुतुबुद्दीन को अपनी पीठ से नीचे गिरा दिया और अपने पैरों से उसकी छाती पर पैरो से कई वार कर कूचला, जिससे कुतुबुद्दीन बही पर मर गया ..!!!!!


इससे पहले कि, सिपाही कुछ समझ पाते राजकुवर शुभ्रक पर सवार होकर वहां से निकल गए।
कुतुबुदीन के सैनिको ने उनका पीछा किया मगर वो उनको पकड न सके ..!!! शुभ्रक कई दिन और कई रात दौड़ता रहा और अपने स्वामी को लेकर उदयपुर के महल के सामने आ कर रुका ..!!
वहां पहुंचकर जब राजकुंवर ने उतर कर पुचकारा तो वो मूर्ति की तरह शांत खडा रहा ..!!!!!
वो मर चुका था, सर पर हाथ फेरते ही उसका निष्प्राण शरीर लुढ़क गया ..!!! कु

तुबुद्दीन की मौत और शुभ्रक की स्वामिभक्ति की इस घटना के बारे में हमारे स्कूलों में नहीं पढ़ाया जाता है लेकिन, इस घटना के बारे में फारसी के प्राचीन लेखकों ने काफी लिखा है।


धन्य है भारत की भूमि जहाँ इंसान तो क्या जानवर भी अपनी स्वामी भक्ति के लिए प्राण दांव पर लगा देते हैं।

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quotes-notesfrom_the-great-partition-by-yasminkhan

The above handwritten quotes are from Yasmin Khan’s book.

It is worth for the Hindus to reading the book.

 

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Hand written quotes and the readers notes.

quotes-notesfrom_the-great-partition-by-yasminkhan

 

 

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From: Avnish Kashyap < >

 

Real origin of the Kashmir problem 

Jammu and Kashmir

 

For years before independence Kashmir head of state was Hindu. If Kashmir is a Muslim state, how did they appoint a Hindu king? Probably, all (the Hindustani) Muslims are Hindu converts due to Islamic invasions. This is my personal opinion. – Sarpeshkar

If World War III were to begin, most defense and political experts the most likely place will be Kashmir and between Nuclear powers India and Pakistan. Everyone seems to sense this, yet the two countries remain locked in a dangerous confrontation. The main flashpoint is Kashmir.

What are the origins of the problem and what keeps the fire of conflict raging?  Having no legal right to claim Kashmir but desiring it all costs, a belligerent and aggressive Pakistan has waged four very costly and unsuccessful wars on India seeking to wrest control of Kashmir from India by force. Pakistan’s greatest military and political supporter always has been America. Why?

Conflict is an expensive affair. Yet Pakistan with an economy that survives on handouts, grants and subsidies primarily from America and American allies.

Why would the world’s most powerful nation, which portrays itself as ‘The Champion of Freedom and Democracy’ support an incompetent, corrupt, theocratic, fundamentalist, terrorist, military regime with state of the art weapons and training etc. to continuously wage war on India, a peace loving secular democratic nation? Why?

Why in the name of fighting terrorism give Pakistan weapons that can only be used only against India such as aircraft with nuclear weapons delivery capabilities? Why?

This requires us to travel back in history before Indian independence.

Britain became an empire by being effective, in protecting and furthering her own interests at all costs, while being extremely polite and diplomatic. Britain’s interest was to retain indirect control of India even after independence. This is still done in many ways, but here we will only discuss the military one.

A weakened Britain backed by a powerful America did not want to leave a power vacuum in which communist Soviet Union and a possibly China could take control. So they proposed British bases and armed forces to be retained in India after independence. Indian leaders refused to allow the stationing of foreign troops

Jinnah on the other hand made a deal with the British, that if they partitioned India, and provided provide military and economic aid to Pakistan, then he would give free rein to the British to do as they chose. This was a major incentive for the British to partition India. Bengal and Kashmir were two strategic areas from which British and American forces could keep in check, both Russia and China.

In pursuit of their grand objectives, the Americans in 1954 chose Turkey, Iran and Pakistan as their defense partners to contain Russia and communism. In 1955 SEATO and CENTO was formed and had expanded to include UK and Iraq also.  In 1959. Massive American aid began gushing into Pakistan, turning a relatively small insignificant nation into a monster.

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Mountbatten, Nehru and Edwina

Inexplicably both India and Pakistan agreed to retain Britishers as Commander-in-Chief and Chiefs of Air and Naval Staff, of their respective armies, even after independence. Lord Mountbatten was appointed the Governor General of India.

Mountbatten, not Nehru presided over the proceedings of the Defense Committee of the Cabinet. Incredulously Nehru willingly handed over control of the security and defense of the country to the British. More shocking is the silence of all Indian leaders, the intellectuals and the general public on this matter.

The heads of the armed forces both of India and Pakistan which were commanded by British generals, were in a unique position to influence the course of the military action. The Attlee Government in the UK, Mountbatten and the British generals in India and General Gracey, British C-in-C of Pakistani army, conspired to stop India from making full use of its military strength to throw out Pakistani forces from Jammu and Kashmir or to attack Pakistan in 1947-48.

Recently unclassified British records reveal that, Mountbatten and his officers collectively projected to Indian leaders a deliberately exaggerated picture of India’s military limitations, vis-a-vis Pakistan. General Busher, C-in-C Indian Army, issued a directive on July 6, 1948, to General Cariappa in Jammu and Kashmir, that no major operation should be undertaken without approval of Army HQ. He forbade the use of the Indian Air force. Mountbatten further advised India to take the case to the United Nations.
Evidence by way of interviews and records of this conspiracy have been recorded by C. Das Gupta in his book War and Diplomacy in Kashmir 1947-48 by Sage Publications, New Delhi.

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From Shriharsha Sharma < >

*गांधी वध क्यों* एक ऐसी पुस्तक

To call Mohandas Karamchand Gandhi ” Mahatma’ or great person, holy person is a not a mistake but a blunder, which is destroying Hindus and Hinduism and everything attached to glorious word Hindu for nearly a century since his arrival in British India from South Africa in 1915.

Mahatma is he who thinks, treats and acts with balance to treat and behaves equally with all as far as possible but Gandhi treated Muslims better and considered them superior and close to his heart for this you see his writings, actions and acts of appeasement throughout so it is correct to call him ‘ Duratma’ or evil person.

 

Gandhi polluted are devotional songs by adding the line ‘ ishwar allah tera naam’ in the bhajan, (so it is not worth singing any more). Then he advised and introduced reading of Qu ‘ran in Temples. He also asked Muslims to read and recite Gita and Ramayan in Masjids, Muslims not only ignored but laughed and mocked on this. Hindus read Qu’ ran in many temples (skanda987 thinks this is not correct.)

 

Non-Muslims must know the meaning of Allah. Allah is not synonymous to God. ‘Allah’ means God of Muslims only according to their Book.

 

Rajghat must be demolished and it must be replaced with the monuments of true sons and daughters of Bharatmata, not with those who destroyed Akhand Bharat and who gave us broken, partitioned, mutilated, divided, disfigured, depressed corrupt and chaotic Bharat.

 

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From: Mohan Natarajan < >

The Goa Inquisition

Dr. T. R. de Souza

“At least from 1540 onwards, and in the island of Goa before that year, all the Hindu idols had been annihilated or had disappeared, all the temples had been destroyed and their sites and building material was in most cases utilized to erect new Christian Churches and chapels. Various viceregal and Church council decrees banished the Hindu priests from the Portuguese territories; the public practices of Hindu rites including marriage rites, were banned; the state took upon itself the task of bringing up Hindu orphan children; the Hindus were denied certain employments, while the Christians were preferred; it was ensured that the Hindus would not harass those who became Christians, and on the contrary, the Hindus were obliged to assemble periodically in Churches to listen to prea! ching or to the refutation of their religion.”
“A particularly grave abuse was practiced in Goa in the form of ‘mass baptism’ and what went before it. The practice was begun by the Jesuits and was alter initiated by the Franciscans also. The Jesuits staged an annual mass baptism on the Feast of the Conversion of St. Paul (January 25), and in order to secure as many neophytes as possible, a few days before the ceremony the Jesuits would go through the streets of the Hindu quarter in pairs, accompanied by their Negro slaves, whom they would urge to seize the Hindus. When the blacks caught up a fugitive, they would smear his lips with a piece of beef, making him an ‘untouchable’ among his people. Conversion to Christianity was then his only option.”
The Goan inquisition is regarded by all contemporary portrayals as the most violent inquisition ever executed by the Portuguese Catholic Church. It lasted from 1560 to 1812. The inquisition was set as a tribunal, headed by a judge, sent to Goa from Portugal and was assisted by two judicial henchmen. The judge was answerable to no one except to Lisbon and handed down punishments as he saw fit. The Inquisition Laws filled 230 pages and the palace where the Inquisition was conducted was known as the Big House and the Inquisition proceedings were always conducted behind closed shutters and closed doors. The screams of agony of the victims (men, women, and children) could be heard in the streets, in the stillness of the night, as they were brutally interrogated, flogged, and slowly dismembered in front of their relatives. Eyelids were sliced off and extremities were amputated carefully, a person could remain conscious even though the only thing that remained was his torso and head.
Diago de Boarda, a priest and his advisor Vicar General, Miguel Vazz had made a 41 point plan for torturing Hindus. Under this plan Viceroy Antano de Noronha issued in 1566, an order applicable to the entire area und! er Portuguese rule :
“I hereby order that in any area owned by my master, the king, nobody should construct a Hindu temple and such temples already constructed should not be repaired without my permission. If this order is transgressed, such temples shall be, destroyed and the goods in them shall be used to meet expenses of holy deeds, as punishment of such transgression.”
In 1567 the campaign of destroying temples in Bardez met with success. At the end of it 300 Hindu temples were destroyed. Enacting laws, prohibition was laid from December 4, 1567 on rituals of Hindu marriages, sacred thread wearing and cremation. All the persons above 15 years of age were compelled to listen to Christian preaching, failing which they were punished.
A religious fatva was issued on the basis of the findings of Goa Inquiry Commission. It stated, “…Hereby we declare the decision that the conventions mentioned in the preamble of the fatva as stated below are permanently d! eclared as useless, and therefore prohibited.”

Prohibitions Regarding Marriages

  • The instruments for Hindu songs shall not be played.
  • While giving dowry the relatives of the bride and groom must not be invited.
  • At the time of marriage, betel leaf packages (pan) must not be distributed either publicly or in private to the persons present.
  • Flowers, or fried puris, betel nuts and leaves must not be sent to the heads of the houses of the bride or groom.
  • Gotraj ceremony of family God must not be performed.
  • On the day prior to a wedding, rice must not be husked, spices must not be pounded, grains must not be ground and other recipes for marriage feast must not be cooked.
  • Pandals and festoons must not be used.
  • Pithi should not be applied.
  • The bride must not be accorded ceremonial welcome. The bride and groom must not be made to sit under pandal to convey blessings and best wishes to them.
  • The poor must not be fed or ceremonial meals must not be served for the peace of the souls of the dead.
  • There should be no fasting on ekadashi day.
  • Fasting can be done according to the Christian principles.
  • No rituals should be performed on the twelfth day after death, on moonless and full moon dates.
  • Hindu men should not wear dhoti either in public or in their houses. Women should not wear cholis .
  • They should not plant Tulsi in their houses, compounds, gardens or any other place.
Following the law of 1567, orphans were kidnapped for converting them to Christianity.
On September 22, 1570 an order was issued that : l

  • The Hindus embracing Christianity will be exempted from land taxes for a period of 15 years.
  • Nobody shall bear Hindu names or surnames.
In 1583 Hindu temples at Esolna and Kankolim were destroyed through army action.
“The fathers of the Church forbade the Hindus under terrible penalties the use of their own sacred books, and prevented them from all exercise of their religion. They destroyed their temples, and so harassed and interfered with the people that they abandoned the city in large numbers, refusing to remain any longer in a place where they had no liberty, and were liable to imprisonment, torture and death if they worshipped after their own fashion the gods of their fathers.” wrote Sasetti, who was in India from 1578 to 1588.
An order was issued in June 1684 eliminating Konkani language and makin! g it compulsory to speak Portuguese language. The law provided for dealing toughly with anyone using the local language. Following that law all the symbols of non-Christian sects were destroyed and the books written in local languages were burnt.
The Archbishop living on the banks of the Ethora had said during one of his lecture series, “The post of Inquiry Commission in Goa is regarded as holy.” The women who opposed the assistants of the commission were put behind the bars and were used by them to satisfy their animal instincts. Then they were burnt alive as opponents of the established tenets of the Catholic church.
The victims of such inhuman laws of the Inquiry Commission included a French traveller named Delone. He was an eye witness to the atrocities, cruelty and reign of terror unleashed by priests. He published a book in 1687 describing the lot of helpless victims. While he was in jail he had heard the cries of tortured people beaten with instruments havi! ng sharp teeth. All these details are noted in Delone’s book.
So harsh and notorious was the inquisition in Goa, that word of its brutality and horrors reached Lisbon but nothing was done to stop this notoriety and escalating barbarity and it continued for two hundred more years. No body knows the exact number of Goans subjected to these diabolical tortures, but perhaps it runs into hundreds of thousands, may be even more. The abominations of inquisitions continued until a brief respite was given in 1774 but four years later, the inquisition was introduced again and it continued un-interruptedly until 1812. At that point in time, in the year of 1812, the British put pressure on the Portuguese to put an end to the terror of Inquisition and the presence of British troops in Goa enforced the British desire. Also the Portuguese power at this time was declining and they could not fight the British. The palace of the Grand Inquisitor, the Big House, was demolished and no trace of ! it remains today, which might remind someone of inquisitions and the horrors inside this Big House that their great saint Francis Xavier had commenced.
Dr. Trasta Breganka Kunha, a Catholic citizen of Goa writes, “Inspite of all the mutilations and concealment of history, it remains an undoubted fact that religious conversion of Goans is due to methods of force adopted by the Portuguese to establish their rule. As a result of this violence the character of our people was destroyed. The propagation of Christian sect in Goa came about not by religious preaching but through the methods of violence and pressure. If any evidence is needed for this fact, we can obtain it through law books, orders and reports of the local rulers of that time and also from the most dependable documents of the Christian sect.â€

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