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Archive for the ‘Poems’ Category

A Poem हवा लगी पश्चिम की

By Vinod Gupta < >

 

हवा लगी पश्चिम की , सारे कुप्पा बनकर गए फूल।

ईस्वी सन तो याद रहा , पर अपना संवत्सर गए भूल ।।

 

चारों तरफ नए साल का , ऐसा मचा है हो-हल्ला ।

बेगानी शादी में नाचे , जैसे कोई दीवाना अब्दुल्ला ।।

 

धरती ठिठुर रही सर्दी से , घना कुहासा छाया है ।

कैसा ये नववर्ष है , जिससे सूरज भी शरमाया है ।।

 

सूनी है पेड़ों की डालें , फूल नहीं हैं उपवन में ।

पर्वत ढके बर्फ से सारे , रंग कहां है जीवन में ।।

 

बाट जोह रही सारी प्रकृति , आतुरता से फागुन का ।

जैसे रस्ता देख रही हो , सजनी अपने साजन का ।।

 

अभी ना उल्लासित हो इतने , आई अभी बहार नहीं ।

हम अपना नववर्ष मनाएंगे , न्यू ईयर हमें स्वीकार नहीं ।।

 

लिए बहारें आँचल में , जब चैत्र प्रतिपदा आएगी ।

फूलों का श्रृंगार करके , धरती दुल्हन बन जाएगी ।।

 

मौसम बड़ा सुहाना होगा , दिल सबके खिल जाएँगे ।

झूमेंगी फसलें खेतों में , हम गीत खुशी के गाएँगे ।।

 

उठो खुद को पहचानो , यूँ कबतक सोते रहोगे तुम ।

चिन्ह गुलामी के कंधों पर , कबतक ढोते रहोगे तुम ।।

 

अपनी समृद्ध परंपराओं का , आओ मिलकर मान बढ़ाएंगे ।

आर्यवृत के वासी हैं हम , अब अपना नववर्ष मनाएंगे ।।

 

💐वंदे मातरम💐

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From: Pramod Agrawal < >

मोहम्मद शहज़ाद खान की कलम से.

 

नही चाहिये मुझे ऐसा इस्लाम,

जो जानवरों का गोश्त खाये,

और पाँच वक्त नमाज़ को जाए. नही चाहिये मुझे ऐसा इस्लाम.

 

औरत बच्चों का गला कटवाये,

और खुद बाबर कहलाये. नही चाहिये मुझे ऐसा इस्लाम.

 

जो मजहब के नाम पर,

मूक जानवर कुर्बान कराये. नही चाहिये मुझे ऐसा इस्लाम.

 

जो इंसान किसी इंसान को मारे,

नही चाहिये मुझे ऐसा इंसान. नही चाहिये मुझे ऐसा इस्लाम.

 

जो ईमान बेचकर कर खाये,

और खुद को मुसलमान बताये. नही चाहिये मुझे ऐसा इस्लाम.

 

कभी गजनबी कभी बाबर, कभी ओरंगजेब बनकर,

इंसानियत का खून बहाया है, कभी हिंदुओं का तो कभी,

अपने ही भाइयों को मारा, जिहाद के नाम पर इंसानियत का,

क़त्ल कर रहे ये हैवान, अगर यही कहता है इस्लाम,

नही चाहिये मुझे ऐसा इस्लाम. (अच्छी बात है। तो इस्लाम छोड दो। – स्कन्द९८७)

 

ए खुदा मुझे अपनी पनाह में ले ले,

इस जिन्दा रूह को शैतान से इंसान बना दे,

नही चाहिये मुझे किसी पीर फकीर की रहमत,

मुझे अकबर बादशाह (नहिं पर) also was very cruel ———

अब्दुल कलाम सा बना दे.

 

इस बहाने इस जमीन का कुछ कर्ज तो चुका पाउँगा,

नही तो मरकर अल्ला को क्या मुँह दिखलाऊंगा.

 

ऐ मेरे परवरदिगार मौत के बाद, मुझे 2 गज जमीं नशीं करना,

जिनने खून बहा ये जमीं हासिल की, उन सब गुनहगारों को माफ़ (ना) करना.

 

अल्ला के नेक बन्दों, मेरी बात एक दिल से लगा लेना,

जिस दौलत पे तुम इतराते हो, उसे असली हकदार को लौटा देना,

खुदा के पास जाने से पहले, अपने सारे गुनाह चुका देना.

 

खुदा के घर किसी का गुनाह माफ़ नही होते.

क्योकिं वहाँ पर झूटे इन्साफ नही होते.

 

यदि मेरे किसी मुसलमान भाई के दिल तक मेरी बात पहुंच जाए,

तो इस ईद पर किसी जानवर की कुर्बानी मत देना, उसकी जगह मिठाई खाना और ख़िलाना.

 

सभी देशवासियों से गुजारिश है इस पोस्ट सहीसलामत आगे भेजें.

 

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छोडो छोडो          छोडो छोडो।

जन गण मन को छोडो छोडो ॥

 

अंगरेजी राज चला गया है ।

पंचम ज्योर्ज भी नहिं रहा है ॥

 

हमारा विधाता हम हैं अब ।

भारतके चिधाता हम हैं अब ॥

 

तो जन मन गण गायें क्युं हम ?

वंदे मातरम् ही गायेंगे हम ॥

 

वंदे .. .. .. मातरम् ।

वंदे .. .. .. मातरम् ।

==x==

जन मन गण छोडने के कारण निचे की लिंक पर बताये गये हैं।

https://skanda987.wordpress.com/2016/09/03/%e0%a5%a5-%e0%a4%9c%e0%a4%a8-%e0%a4%97%e0%a4%a3-%e0%a4%ae%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a5%a5/

Suresh Vyas

www.skanda987.wordpress.com

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From: Capt. S B Tyagi < >

Poem: । कोलाहल है गद्दारों का ।

 

घाटी मे कोलाहल है, कोलाहल है गद्दारों का ।
मौसम बना हुआ है देखो आतंकी त्यौहारों का ।
मौत हुई  है आतंकी  की  लाखों चेहरे रोए हैं ।
हम तो केवल दाल टमाटर के भावों मे खोए हैं ।
आतंकी का एक जनाजा मानो कोई जलसा है ।
लाखों लोग उमड़ आए हैं जैसे कोई फरिश्ता है ।
सेना पे पथराव किया है अफ़जल के दामादों ने ।
फिर से थाने फूँक दिए हैं धरती के जल्लादों ने ।
सीधा मतलब साथ निभाने वाले भी आतंकी है ।
इन  सबकी  वजह से पूरी घाटी ही आतंकित है ।
दूध पिलाना बंद करो अब आस्तीन के साँपों को ।
चौराहों  पे गोली  मारो साठ साल के पापों को ।
सौ सौ बार नमन् सेना को डटी रही है घाटी मे ।
आतंकी को मिला रही है काट काट के माटी मे ।
सेना को अब आतंको की छाती पे चढ़ जाने दो ।
साथ निभाने वालों पे भी अब गोली बरसाने दो ।
एक बार अब श्वेत बर्फ पे लाल रंग चढ़ जाने दो ।
लाश बिछा दो गद्दारों की सेना को बढ़ जाने दो ।
एक परीक्षण नये बमों का गद्दारों पे कर डालो ।
दहशतगर्दों के सीने मे तुम भी दहशत भर डालो ।
भूलो गिनती गद्दारों की लाश बिछाना शुरू करो ।
वंदे मातरम् भारत माँ की जय तराने शुरू करो ।
देशप्रेमियों की सैनिकों पूरी मन्नत कर डालो ।
नर्क भेज के गद्दारों को भूमि जन्नत कर डालो ।

 

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From: Pramod Agrawal < >

भारत का नया राष्ट्रगीत
New National Song of India

आओ बच्चों तुम्हे दिखायें,
शैतानी शैतान की।

नेताओं से बहुत दुखी है,
जनता हिन्दुस्तान की।।

बड़े-बड़े नेता शामिल हैं,
घोटालों की थाली में।

सूटकेश भर के चलते हैं,
अपने यहाँ दलाली में।।

देश-धर्म की नहीं है चिंता,
चिन्ता निज सन्तान की।

नेताओं से बहुत दुखी है,
जनता हिन्दुस्तान की।।

चोर-लुटेरे भी अब देखो,
सांसद और विधायक हैं।

सुरा-सुन्दरी के प्रेमी ये,
सचमुच के खलनायक हैं।।

भिखमंगों में गिनती कर दी,
भारत देश महान की।

नेताओं से बहुत दुखी है,
जनता हिन्दुस्तान की।।

जनता के आवंटित धन को,
आधा मन्त्री खाते हैं।

बाकी में अफसर-ठेकेदार,
मिलकर मौज उड़ाते हैं।।

लूट-खसोट मचा रखी है,
सरकारी अनुदान की।

नेताओं से बहुत दुखी है,
जनता हिन्दुस्तान की।।

थर्ड क्लास अफसर बन जाता,
फर्स्ट क्लास चपरासी है।

होशियार बच्चों के मन में,
छायी आज उदासी है।।

गंवार सारे मंत्री बन गये,
मेधावी आज खलासी है।

आओ बच्चों तुम्हें दिखायें,
शैतानी शैतान की।।

नेताओं से बहुत दुखी है,.
जनता हिन्दुस्तान की।

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From Bharat < >

मेरी गांधीजी से शिकायत-

तुम चाहते तो लालकिले पर भगवा फहरा सकते थे,

तुम चाहते तो तिब्बत पर भी झंडा लहरा सकते थे,

तुम चाहते तो जिन्ना को चरणों में झुकवा सकते थे,

तुम चाहते तो भारत का बंटवारा रुकवा सकते थे।

तुम चाहते तो अंगेजो का मस्तक झुकवा सकते थे,

तुम चाहते तो भगतसिंह की फाँसी रुकवा सकते थे।

 

इंतजार ना होता इतना तभी कमल खिलना तय था,

सैंतालिस में ही भारत माँ को पटेल मिलना तय था।

लेकिन तुम तो अहंकार के घोर नशे में झूल गए,

गांधीनीति याद रही भारत माता को भूल गए।

सावरकर से वीरो पर भी अपना नियम जाता डाला।

गुरु गोविन्द सिंह और प्रताप को भटका हुआ बता डाला,

भारत के बेटो पर अपने नियम थोप कर चले गए,

बोस पटेलों की पीठो में छुरा घोप कर चले गए।

 

तुमने पाक बनाया था वो अब तक कफ़न तौलता है,

बापू तुमको बापू तक कहने में खून खौलता है।

साबरमती के वासी सोमनाथ में गजनी आया था,

जितना पानी नहीं बहा उतना तो खून बहाया था।

सारी धरती लाल पड़ी थी इतना हुआ अँधेरा था,

चीख चीख कर बोलूंगा मैं गजनी एक लुटेरा था।

 

सबक यही से ले लेते तो घोर घटाए ना छाती,

भगतसिंह फाँसी पर लटके ऐसी नौबत ना आती।

अंग्रेजो से लोहा लेकर लड़ना हमें सीखा देते,

कसम राम की बिस्मिल उनकी ईंट से ईंट बजा देते।

 

अगर भेड़िया झपटे तो तलवार उठानी पड़ती है,

उसका गला काटकर अपनी जान बचानी पड़ती है।

छोड़ अहिंसा कभी कभी हिंसा को लाना पड़ता है,

त्याग के बंसी श्री कृष्ण को चक्र उठाना पड़ता है।–

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We found the above lines PAR EXCELLENCE. Inspired by these we wish to addressModiji, too, to come up to our expectations and “dump” Gandhi if you understand the lines,

अगर भेड़िया झपटे तो तलवार उठानी पड़ती है,

उसका गला काटकर अपनी जान बचानी पड़ती है।

छोड़ अहिंसा कभी कभी हिंसा को लाना पड़ता है,

त्याग के बंसी श्री कृष्ण को चक्र उठाना पड़ता है।–

 

-rajput

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From: Vishvapriya Vedanuragi  < >

हैदराबाद सत्याग्रह में अपने प्राणों की आहुति देने वाले धर्मवीरों के प्रति श्रद्धांजलि
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श्रद्धांजलि अर्पण करते हम, करके उन वीरों का मान,
धार्मिक स्वतन्त्रता पाने को, किया जिन्होंने निज बलिदान |
परिवारों के सुख को त्यागा, युवक अनेकों वीरों ने,
कष्ट अनेकों सहन किये पर, धर्म न छोड़ा वीरों ने |
ऐसे सभी धर्मवीरों के, आगे शीष झुकाते हैं,
उनके गुण-कर्मों को हम, निज जीवन में अपनाते हैं |
अमर रहेगा नाम जगत् में, इन वीरों का निश्चय से,
उनका स्मरण बनायेगा फिर, वीर जाति के निश्चय से,
करें कृपा प्रभु आर्य जाति में, कोटि-कोटि हों ऐसे वीर,
देश धर्म हित खुशी -खुशी, जो प्राणों को अपने दें वीर |
जगत् पिता को साक्षी रखकर, यही प्रतिज्ञा करते हैं,
इन वीरों के चरण चिह्न पर, चलने का व्रत धरते हैं |
सर्वशक्तिमाय दे बल ऐसा, धीर-वीर सब आर्य बनें,
पर उपकार परायण निशदिन, शुभ गुणकारी आर्य बनें |
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निजाम-हैदराबाद आर्य सत्याग्रह विजय दिवस की बधाई हो |

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