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From: Pramod Abrawal < >

 

वियेटनाम देश महाराणा प्रताप से बहुत प्रवाभित है॥

 

वियतनाम विश्व का एक छोटा सा देश है जिसने….. अमेरिका जैसे बड़े बलशाली देश को झुका दिया।

लगभग बीस वर्षों तक चले युद्ध में अमेरिका पराजित हुआ।थ अमेरिका पर विजय के बाद वियतनाम के राष्ट्राध्यक्ष से एक पत्रकार ने एक सवाल पूछा….. जाहिर सी बात है कि सवाल यही होगा कि आप युद्ध कैसे जीते या अमेरिका को कैसे झुका दिया ??

पर उस प्रश्न का दिए गए उत्तर को सुनकर आप हैरान रह जायेंगे और आपका सीना भी गर्व से भर जायेगा।

दिया गया उत्तर पढ़िये।

सभी देशों में सबसे शक्ति शाली देश अमेरिका को हराने के लिए मैंने एक महान व् श्रेष्ठ भारतीय राजा का चरित्र पढ़ा।

और उस जीवनी से मिली प्रेरणा व युद्धनीति का प्रयोग कर हमने सरलता से विजय प्राप्त की।

आगे पत्रकार ने पूछा… “कौन थे वो महान राजा ?”

मित्रों जब मैंने पढ़ा तब से जैसे मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो गया आपका भी सीना गर्व से भर जायेगा।

वियतनाम के राष्ट्राध्यक्ष ने खड़े होकर जवाब दिया…

“वो थे भारत के राजस्थान में मेवाड़ के महाराजा महाराणा प्रताप सिंह !!”

महाराणा प्रताप का नाम लेते समय उनकी आँखों में एक वीरता भरी चमक थी। आगे उन्होंने कहा…

“अगर ऐसे राजा ने हमारे देश में जन्म लिया होता तो हमने सारे विश्व पर राज किया होता।”

कुछ वर्षों के बाद उस राष्ट्राध्यक्ष की मृत्यु हुई तो जानिए उसने अपनी समाधि पर क्या लिखवाया…

“यह महाराणा प्रताप के एक शिष्य की समाधि है !!”

कालांतर में वियतनाम के विदेशमंत्री भारत के दौरे पर आए थे। पूर्व नियोजित कार्य क्रमानुसार उन्हें पहले लाल किला व बाद में गांधीजी की समाधि दिखलाई गई। ये सब दिखलाते हुए उन्होंने पूछा ” मेवाड़ के महाराजा महाराणा प्रताप की समाधि कहाँ है ?”  तब भारत सरकार के अधिकारी चकित रह गए, और उनहोंने वहाँ उदयपुर का उल्लेख किया। वियतनाम के विदेशमंत्री उदयपुर गये, वहाँ उनहोंने महाराणा प्रताप की समाधि के दर्शन किये।

समाधी के दर्शन करने के बाद उन्होंने समाधि के पास की मिट्टी उठाई और उसे अपने बैग में भर लिया इस पर पत्रकार ने मिट्टी रखने का कारण पूछा !! उन विदेशमंत्री महोदय ने कहा

“ये मिट्टी शूरवीरों की है। इस मिट्टी में एक महान् राजा ने जन्म लिया ये मिट्टी मैं अपने देश की मिट्टी में मिला दूंगा …”

“ताकि मेरे देश में भी ऐसे ही वीर पैदा हो। मेरा यह राजा केवल भारत का गर्व न होकर सम्पूर्ण विश्व का गर्व होना चाहिए।”

(अपेक्षा की जाती है कि यह पोस्ट आप अभिमान के साथ सभी मित्रों के साथ शेयर करेंगे।)

 

From: Pramod Agrawal < >

 

काली कमाई के रास्ते खत्म कर दिए जाएँ .

 

मैं एक डॉक्टर हूं, और इस लिए ” सभी ईमानदार डॉक्टर्स से क्षमा सहित प्रार्थना …! ”

 

  • आपके पिता जी को ” हार्ट अटैक ” हो गया …डॉक्टर कहता है – Streptokinase इंजेक्शन ले के आओ … 9,000/= रु का … इंजेक्शन की असली कीमत 700 – 900/- रु के बीच है .., पर उसपे MRP 9,000/= का है ! आप क्या करेंगे ?

 

  • आपके बेटे को टाइफाइड हो गया … डॉक्टर ने लिख दिया – कुल 14 Monocef लगेंगे ! होल – सेल दाम 25/= रु है … अस्पताल का केमिस्ट आपको 53/= रु में देता है … आप क्या करेंगे ??

 

  • आपकी माँ की किडनी फेल हो गयी है .., हर तीसरे दिन Dialysis होता है .., Dialysis के बाद एक इंजेक्शन लगता है – MRP शायद 1800 रु है ! आप सोचते हैं की बाज़ार से होलसेल मार्किट से ले लेता हूँ ! पूरा हिन्दुस्तान आप खोज मारते हैं , कही नहीं मिलता … क्यों ? कम्पनी सिर्फ और सिर्फ डॉक्टर को सप्लाई देती है !! इंजेक्शन की असली कीमत 500/= है , पर डॉक्टर अपने अस्पताल में MRP पे यानि 1,800/= में देता है … आप क्या करेंगे ??

 

  • आपके बेटे को इन्फेक्शन हो गया है .., डॉक्टर ने जो Antibiotic लिखी , वो 540/= रु का एक पत्ता है .., वही Salt किसी दूसरी कम्पनी का 150/= का है और जेनेरिक 45/= रु का … पर केमिस्ट आपको मना कर देता है .., नहीं जेनेरिक हम रखते ही नहीं , दूसरी कम्पनी की देंगे नहीं .., वही देंगे , जो डॉक्टर साहब ने लिखी है … यानी 540/= वाली ? आप क्या करेंगे ??

 

  • बाज़ार में Ultrasound Test 750/= रु में होता है .., चैरिटेबल डिस्पेंसरी 240/= रु में करती है ! 750/= में डॉक्टर का कमीशन 300/= रु है ! MRI में डॉक्टर का कमीशन Rs. 2,000/= से 3,000/= के बीच है !

डॉक्टर और अस्पतालों की ये लूट , ये नंगा नाच , बेधड़क , बेखौफ्फ़ देश में चल रहा है ! Pharmaceutical कम्पनियों की Lobby इतनी मज़बूत है , की उसने देश को सीधे – सीधे बंधक बना रखा है ! डॉक्टर्स और दवा कम्पनियां मिली हुई हैं ! दोनों मिल के सरकार को ब्लैकमेल करते हैं …!!

सबसे बडा यक्ष प्रश्न … मीडिया दिन रात क्या दिखाता है ?

 

गड्ढे में गिरा प्रिंस .., बिना ड्राईवर की कार , राखी सावंत , Bigboss , सास बहू और साज़िश , सावधान , क्राइम रिपोर्ट , Cricketer की Girl Friend , ये सब दिखाता है , किंतु … Doctor’s, Hospital’s और Pharmaceutical company कम्पनियों की , ये खुली लूट क्यों नहीं दिखाता ?

 

मीडिया नहीं दिखाएगा , तो कौन दिखाएगा ?

मेडिकल Lobby की दादागिरी कैसे रुकेगी ?

इस Lobby ने सरकार को लाचार कर रखा है ?

Media क्यों चुप है ?

 

20/-  रु मांगने पर रिक्सा वाले को , तो आप कालर पकड़ के मारेंगे , ..! डॉक्टर साहब का क्या करेंगे ???

यदि आपको ये सत्य लगता है , तो कर दो फ़ॉरवर्ड , सब को ! जागरूकता लाइए और दूसरों को भी जागरूक बनाने में अपना सहयोग दीजिये !!!

 

The Makers of Ideal Society

एक सोच बदलाव की . .

 

From: Pramod Agrawal < >

कुरान नफरत सिखाती है .

 

दिल्ली की मेट्रोपोलियन मजिस्ट्रेट-2 जैड़ एस लाहोट ने कुरान पर अपना निर्णय देते हुए कहा कि ” कुरान का गहन अध्ययन करने के पश्चात यह स्पष्ट हो जाता है कि कुरान नफरत सिखाती है, यह मानव को दो भागो मे विभक्त करती है 1.मोमिन तो 2. गैर मोमिन अर्थात काफिर ।” कुरान के आधार पर “काफिर जहन्नुम की आग मे जलाने का ईंधन, जाजिया वसुली का जरिया, काफिरो के धर्म स्थल तोड़ कर अपनी मस्जिदे खड़ी करने की जगहे, काफिरो की “स्त्रिया और सम्पतिया गनीमत का माल” कुरान के इन पंथीय आदेशो को मुसलमान कितना मानते है ये अलग विषय हो सकता है चर्चा और प्रमाणित करने का परन्तु समस्त भारतीय राजनीतिक दल ( अखिल भारत हिन्दू महासभा, राम राज्य परिषद एव प्रजाशक्ति पार्टी के अतिरिक्त ) अवश्य कुरान के इन पंथीय आदेशो को शिरोधार्य कर कार्य कर रही है वही देश का “तथाकथित संविधान जो आज तक भारत की चुनी हुई संसद मे आज तक पारित नही हुआ, भी ” देश की कुरान ही प्रमाणित होती है ।” जिस प्रकार कुरान मानव जाति को मोमिन और काफिर के रूप मे विभक्त करती है उसी प्रकार देश का तथाकथित संविधान देश की मानव जाति को बहुसंख्यक और अल्प संख्या के नाम से विभक्त करता है । जिस प्रकार कुरान के अनुसार “जो ईमान पर इस्लाम और नमाज कुबूल नही करता वह काफिर है और काफिर जहन्नुम की आग मे जलाने का ईंधन है, टीक उसी प्रकार जो देश का इस तथाकथित संविधान की किसी अतार्किक और पक्षपातपूर्ण अधिनियम या उपनियम के विरूद्ध अपना मुँह खोले उसे कानून की “जहनुनुमी आग मे झोंक दो ” । जिस प्रकार कुरान मे ” समस्त अधिकार मोमिनो को हो प्राप्त है ठीक उसी प्रकार देश के इस तथाकथित संविधान मे भी ” अल्पसंख्यको को “विशिष्ट मानते हुए सभी क्षेत्रो मे विशाष्ट अधिकार प्राप्त है ” । जिस प्रकार कुरान के अनुसार ” गनीमत के माल मे से जकेत दो ठीक उसी प्रकार बहुसंख्यको को लूटो और लूटने गये उस “गनीमत के माल माल मे से अल्पसंख्यको को जकात दो”…..देश का बहुसंख्यक (काफिर) जहन्नुम (घोर प्रताड़ना और उपेक्षा ) की आग मे जलाने का ईंधन है और इस ईंधन पर अपनी “राजनीतिक रोटिया सेकती रही है हर सरकार , हर राजनीतिक दल । यदि बहुसंख्यक अपने हितो या अपने अधिकारो को प्राप्त करने, अथवा संविधानिक पक्षपात के विरूद्ध आवाज उठाए तो ” देश के ग्रंथ इस तथाकथित इस संविधान मे निहित विभिन्न आपराधिक धाराओ की जंजीरो मे फाँस कर जेल मे ड़ाल दो और उसका वो हश्र कर दो जिसे देख कर ” बहुसंख्यक इतना आतंकित कर दो कि फिर कोई भी बहुसंख्यक विरोध की शक्ति जुटाने से पूर्व अनेक बार सोचे …। शेष अगली पोस्ट मे जारी है ।

 

  • मुकुल मिश्रा ।

From: Chitranjan Sawant < >

Maharana Pratap Is Eternal Source Of Inspiration To Gen X

 

AUM

MAHARANA PRATAP THE GREAT

By Brigadier Chitranjan Sawant,VSM

 

Military men and women who have faced the wily enemy across the borders and have been in the line of fire are indeed great admirers of Maharana Pratap Singh of Mewar. The sixteenth century scion of the House of Sisodias had faced the enemy, Moghul king Akbar, minor Sultans of Malwa, Gujarat and Vibhishans among the Rajput royal houses in the then Rajputana. Indeed, he had the solid support of chieftains around Mewar and, of course, enjoyed the unflinching loyalty of the jungle tribes of Bhils who always protected flanks of the great Maharana in distress. The greatness of the giant among men, Pratap Singh, Maharana of Mewar lies in his leadership and capacity to motivate men in adversity and manage money and material in both war and peace. He worked with single minded devotion to duty as a Defender of the Faith, as a king of men and women who looked up to him to defeat the overwhelmingly large enemy forces and save their Mewar Desh and Hindu Dharm from annihilation. Maharana Pratap did not fail in his duty to protect and defend the Honor of his country and its people.

Maharana Pratap had inherited the qualities of grit and determination, the uncommon mental makeup that inspired him to put Service to his subjects before physical and mental comforts of the Self and sustaining the moral courage that in turn built boldness in his personality  to face severe odds and Never Say Die. Above all, it was his spirit of Patriotism that inspired him to put at stake all he had for his beloved motherland, Mewar.

Patriotism made Maharana of Mewar, Pratap Singh Ji, a Great King who rose high to meet the challenge of the mighty Moghuls and not surrender his country, its honour and not submit daughters of Mewar to foreign barbarians to be ravished. Almighty Ishwar stood by Maharana Pratap and help came to him from unexpected quarters at the least expected time. Maharana Pratap was never cowed down by cowardice shown by his brother kings of the Houses of Jaipur, Jodhpur and other minor vassals who bent backwards to lick the feet of invading Moghul kings of Delhi.

Honour, Duty, Country – loyalty to people and rising above narrow minded sectarian interests were flowing in the blue-blooded veins of Maharana Pratap as he had inherited them from his ancestors – Bappa Rawal downwards through, Rana Kumbha who built Vijay Stambh in the Chittor fort after vanquishing the Sultan of Gujarat decisively.

The Moghul rulers of Delhi were no angels. The House of Sisodiyas of Mewar had been waging war with them for three generations without giving up for good. Babur had misinformed classes and masses that he invaded Hindustan at the invitation of Maharana Sangram Singh of Mewar, commonly known as Rana Sangha. Had it been so, Rana Sangha would not have fought a bitter battle against Babur where the latter broke his wine glasses of gold to convince his army that he would be a true adherent of Islam thereafter. Did he keep his word? Moghuls are mum on it.

Humanyu, Babur’s son, was constantly on the run after being defeated by Sher Shah Suri. He found shelter in the Hindu Royal House of Amarkot in Sindh where Akbar was born, protected by the Rajah of Amarkot when Humanyu was out of Bharat. Did Akbar or Bairam Khan repay this loyalty? Moghuls are mum.

Now, Maharana Pratap Singh Ji was doing his onerous duty to keep Mewar safe from the marauding Moghuls led by Akbar whom some ill-informed writers call the Great overlooking his massacre of the Hindus after capturing the Chittorgarh fort from Maharana Uday Singh II.

HALDIGHATI BATTLE

In the annals of bitterly fought battles, the Battle of Haldighati occupies a place of honour. I have had an opportunity to go there in mid-1980s while on an inspection visit to the Sainik School, Chittorgarh. I was indeed overwhelmed by the accounts of the Battle of Haldighati narrated by some knowledgeable lecturers of History. Hair raising accounts of the chivalry of Maharana Pratap mounted on his loyal war horse, Chetak, were heard by me and other tourists who chanced to be there.

Haldighati is a narrow pass in the Aravali hills, a couple of hours drive from the Chittorgarh fort. The earth there is yellowish in colour and thus acquired the name, Haldighati. When the Moghul army commanded in name by Prince Salim but in actual fact by Raja Man Singh of Amer, present House of Jaipur. Not too long ago, Raja Man Singh had visited Maharana Pratap with a proposal of King Akbar asking Maharana Pratap to accept the suzerainty of the Mughal ruler and undergo ignominy of sending daughters of House of Mewar to Akbar’s harem. Man Singh’s family had succumbed to greed of loaves and fishes and had surrendered Jodha Bai to Akbar. A self-respecting man and ruler like Maharana Pratap viewed the proposal with disdain and chose not to host a lunch for Man Singh pretending to be suffering from a severe headache. Man Singh’s coming to battle of Haldighati was indeed an act of revenge.

18th June 1576 when the battle was joined, Maharana Pratap fielded 22,000 soldiers comprising Rajputs, Bhils, and a handful of Pathans. The Mughals fielded 200,000 men in arms, mostly Rajputs and Muslims. When Muslim troops were bewildered by presence of Rajputs on both sides of the dividing line, they were advised to kill both as they were Hindus. In the defile of the narrow valley, the Moghuls could not deploy their full might of artillery and cavalry. When Maharana’s mounted men came charging drunk on Patriotism, the Mughal infantries ran halter shelter. Even the big horses and horsemen of Salim and Mansingh took to their heels. The first round of the battle went in favor of the Maharana’s troopers.

As per the original tactical plan of battle, the Maharana’s army was instructed to fight in the hilly defile and not chase the fleeing Moghuls. However, in the first flush of victory, Maharana himself and his cavalry could not restrain themselves and chased the withdrawing enemy. In the heat of the battle, they followed fleeing Moghul cavalry beyond defile and descended to the plains where a huge Moghul army was waiting to surround them and give battle afresh. Some strategists are of the opinion that it was a ruse of the wily Moghuls to draw the Maharana’s forces out in the open and beat them from a position of advantage.

Maharana Pratap astride his loyal mount, Chetak, was looking for Raja Man Singh to keep his promise of meeting him in the battlefield. He strode at the gallop, at trot and at canter looking for his arch enemy who was hiding in the distant rear to save his skin. Pundit Shyam Narayan Pandey has aptly described the Maharana’s hunt for Man Singh in these words:

“Rana doondhta Man Kahan, Chetak kahta Man Kahan;

Bhala kahta Man kahan……..”

But Man Singh was not to be found.

The war horse Chetak knew what its master was looking for. An elephant was sighted and the Maharana zeroed on it. Chetak closed in, stood on the rear legs giving required height to Maharana for thrusting his deadly lance towards to howdah which had Salim seated in it. The attack of Maharana was so fierce that the Mahaut of the elephant was killed on the spot and the elephant ran away from the battle field screaming. Man Singh was not to be found as he was hiding in the distant rear.

In the heat and dust of battle, Maharana Pratap Singh got separated from the bulk of his army. The Mughal soldiers surrounded him and mounted attack after attack on his body and the steed. Soon came forward a loyal chieftain of Maharana, Sardar Jhala. He appreciated the battle situation and removed the Shirastrn and dhwaj-symbols of royalty, from Maharana’s persona and assumed them on his head so that attackers took him to be the Maharana of Mewar. It was an act of loyalty and patriotism of Sardar Jhala that saved Maharana’s life but the chieftain made the supreme sacrifice for the king and the country.

Maharana of Mewar made a tactical retreat so that he could fight a battle another day. He was followed by his brother, Shakti Singh who had joined the Moghals to vanquish his own brother. But now his brotherly love and patriotism came to the forefront. He killed two Moghul horsemen who were chasing the Maharana and caught up with his brother to shed tears and apologize for his treachery. Chetak fell exhausted and soon breathed his last because of numerous wound sustained in battle. The Maharana of Mewar shed tears and cried for his Chetak like a child. He, however, moved forward to plan for another engagement with the Moghuls on another day.

Maharana showed his prowess as a master strategist of the guerilla warfare when he moved into the Aravali hills. Moving from peak to peak, dale to dale, Maharans Pratap gave no respite to the Moghul troopers and kept them on their toes. Of course, he suffered from privations and penury but did not lose heart. Some accounts speak of his plans to move to the Sind province to garner military support from the Rajput princes there. Lieut Colonel James Todd, a great researcher and historian of Rajputana subscribes to this theory. In his monumental work entitled, “Annals and Antiquities of Rajasthan”, Col Todd is very appreciative of the grit and determination of Maharana Pratap to carry on his Patriotic Mission despite adverse circumstances.

BHAMA SHAH OPENED HIS PURSE

Bhama Shah had been a minister of the Sisodia kings for a long time. He, with the dint of merit and hard work had amassed a fortune. Now was the time for Bhama Shah to open his purse and let Maharana Pratap use it to carry on with campaign to keep Mewar free from clutches of the Moghuls of Delhi. Despite reluctance of Maharana Pratap to accept his generous offer of monetary help, Bhama Shah persisted and made sure that the King of Mewar utilized his generous offer to raise an army afresh and reconquer the fortresses from the Mughal forces and make Mewar an independent land of the Brave. Utilising the donation of that great philanthropist, Bhama Shah, Maharana raised an army of 25,000 soldiers and trained them in the art of warfare before equipping them with war horses and weaponry to match the Moghul army. The patriot Bhama Shah had donated enough money to sustain that Mewar Army for 12 years without drawing from the State Exchequer.

Maharana Pratap did exactly that and fulfilled the wishes of Bhama Shah. It was a dream come true.

PERSONALITY OF PRATAP JI

Maharana Pratap Singh also patronized fine arts and music whenever he was not engaged in fighting battles against the treacherous Moghuls of Delhi. The Maharana was quite humane and believed in the principles of war followed by the Rajputs, especially not sexually abusing women of the enemy forces. Once his son, Prince Amar Singh captured some royal women from the family of Rahim, Khan-e-Kanan who was a son of Bairum Khan, the mentor of King Akbar. Maharana had the women returned to Ramim’s palace unharmed. Rahim, also a poet, was so overwhelmed with the generosity of Maharana Pratap that he declined to join any Moghul military campaign against Maharana Pratap.

Maharana Pratap was loyal to his father, King Uday Singh II of Udaipur. His father had nominated his younger brother, Jagmall, a son of the youngest wife of Rana Uday Singh, to be king of Mewar. However, Pratap Ji accepted his father’s decision as a loyal son, despite being the first in the line of succession to the throne. However, the Rajput chieftains did not brook this injustice and physically removed Jagmall from the throne. They beseeched Pratap Ji to become the Maharans and that he accepted.

Born on Shukla Paksh Tritiya, commensurating with 9th May 1540, Pratap Singh Ji had ascended the throne of Mewar on 1st May 1572 at the age of 32 years. Although under political expediency Pratap Ji had solemnized eleven marriages but his first lawfully wedded wife, Maharani Ajabdeh took precedence and was with her darling husband through thick and thin. Their first-born son, Kunwar Amar Singh had succeeded his illustrious father on his untimely demise on 29thJanuary 1597, age 57 years, as the Maharana of Mewar but suffered from the ignominy of contracting a Peace Treaty with King Jehangir of Delhi. Of course, Maharana Amar Singh was exempted from making a personal presence in the Delhi durbar nor go through the insult of sending Rajput princesses of Mewar to the Moghul harem. After signing the Peace Treaty, Maharana Amar Singh was so overtaken by grief that he never made a public appearance thereafter.

Maharana Pratap Singh Ji was always true to his word. He never let down a friend and never stabbed a foe in the back. His personality is an ideal one to be emulated by the new generation of boys, irrespective of the Faith they subscribe to. He was a fierce warrior, a mellowed patriarch and a doting father to his 17 sons and five daughters. He treated all alike.

Once a battle was joined, he asked for no quarters and gave none. Maharana Pratap Singh Ji fought a battle against his enemies like a Dharm Yudh. Indeed, Maharana Pratap was the BRAVEST OF THE BRAVE.

 

From: Pramod Agrawal < >

प्रमाण दें कि इंडिया कब आजाद हुआ था?


क्या सच में देश 15 अगस्त को अजाद हुआ था?

14 अगस्त 1947 की रात को जो कुछ हुआ है वो आजादी नहीं, बल्कि ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर का एग्रीमेंट हुआ था पंडित नेहरु और लोर्ड माउन्ट बेटन के बीच में | Transfer of Power और Independence ये दो अलग चीजे है | स्वतंत्रता और सत्ता का हस्तांतरण ये दो अलग चीजे है | और सत्ता का हस्तांतरण कैसे होता है ? आप देखते होंगे क़ि, एक पार्टी की सरकार है, वो चुनाव में हार जाये, दूसरी पार्टी की सरकार आती है तो दूसरी पार्टी का प्रधानमन्त्री जब शपथ ग्रहण करता है, तो वो शपथ ग्रहण करने के तुरंत बाद एक रजिस्टर पर हस्ताक्षर करता है, आप लोगों में से बहुतों ने देखा होगा, तो जिस रजिस्टर पर आने वाला प्रधानमन्त्री हस्ताक्षर करता है, उसी रजिस्टर को ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर की बुक कहते है और उस पर हस्ताक्षर के बाद पुराना प्रधानमन्त्री नए प्रधानमन्त्री को सत्ता सौंप देता है | और पुराना प्रधानमंत्री निकल कर बाहर चला जाता है | यही नाटक हुआ था 14 अगस्त 1947 की रात को 12 बजे | लार्ड माउन्ट बेटन ने अपनी सत्ता पंडित नेहरु के हाथ में सौंपी थी, और हमने कह दिया कि स्वराज्य आ गया | कैसा स्वराज्य और काहे का स्वराज्य ? अंग्रेजो के लिए स्वराज्य का मतलब क्या था ? और हमारे लिए स्वराज्य का मतलब क्या था ? ये भी समझ लीजिये | अंग्रेज कहते थे क़ि हमने स्वराज्य दिया, माने अंग्रेजों ने अपना राज तुमको सौंपा है ताकि तुम लोग कुछ दिन इसे चला लो जब जरुरत पड़ेगी तो हम दुबारा आ जायेंगे | ये अंग्रेजो का interpretation (व्याख्या) था | और हिन्दुस्तानी लोगों की व्याख्या क्या थी कि हमने स्वराज्य ले लिया | और इस संधि के अनुसार ही भारत के दो टुकड़े किये गए और भारत और पाकिस्तान नामक दो Dominion States बनाये गए हैं | ये Dominion State का अर्थ हिंदी में होता है एक बड़े राज्य के अधीन एक छोटा राज्य, ये शाब्दिक अर्थ है और भारत के सन्दर्भ में इसका असल अर्थ भी यही है | अंग्रेजी में इसका एक अर्थ है “One of the self-governing nations in the British Commonwealth” और दूसरा “Dominance or power through legal authority “| Dominion State और Independent Nation में जमीन आसमान का अंतर होता है | मतलब सीधा है क़ि हम (भारत और पाकिस्तान) आज भी अंग्रेजों के अधीन/मातहत ही हैं | दुःख तो ये होता है की उस समय के सत्ता के लालची लोगों ने बिना सोचे समझे या आप कह सकते हैं क़ि पुरे होशो हवास में इस संधि को मान लिया या कहें जानबूझ कर ये सब स्वीकार कर लिया | और ये जो तथाकथित आज़ादी आयी, इसका कानून अंग्रेजों के संसद में बनाया गया और इसका नाम रखा गया Indian Independence Act यानि भारत के स्वतंत्रता का कानून | और ऐसे धोखाधड़ी से अगर इस देश की आजादी आई हो तो वो आजादी, आजादी है कहाँ ? और इसीलिए गाँधी जी (महात्मा गाँधी) 14 अगस्त 1947 की रात को दिल्ली में नहीं आये थे | वो नोआखाली में थे | और कोंग्रेस के बड़े नेता गाँधी जी को बुलाने के लिए गए थे कि बापू चलिए आप | गाँधी जी ने मना कर दिया था | क्यों ? गाँधी जी कहते थे कि मै मानता नहीं कि कोई आजादी आ रही है | और गाँधी जी ने स्पस्ट कह दिया था कि ये आजादी नहीं आ रही है सत्ता के हस्तांतरण का समझौता हो रहा है | और गाँधी जी ने नोआखाली से प्रेस विज्ञप्ति जारी की थी | उस प्रेस स्टेटमेंट के पहले ही वाक्य में गाँधी जी ने ये कहा कि मै हिन्दुस्तान के उन करोडो लोगों को ये सन्देश देना चाहता हु कि ये जो तथाकथित आजादी (So Called Freedom) आ रही है ये मै नहीं लाया | ये सत्ता के लालची लोग सत्ता के हस्तांतरण के चक्कर में फंस कर लाये है | मै मानता नहीं कि इस देश में कोई आजादी आई है | और 14 अगस्त 1947 की रात को गाँधी जी दिल्ली में नहीं थे नोआखाली में थे | माने भारत की राजनीति का सबसे बड़ा पुरोधा जिसने हिन्दुस्तान की आज़ादी की लड़ाई की नीव रखी हो वो आदमी 14 अगस्त 1947 की रात को दिल्ली में मौजूद नहीं था | क्यों ? इसका अर्थ है कि गाँधी जी इससे सहमत नहीं थे | (नोआखाली के दंगे तो एक बहाना था असल बात तो ये सत्ता का हस्तांतरण ही था) और 14 अगस्त 1947 की रात को जो कुछ हुआ है वो आजादी नहीं आई …. ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर का एग्रीमेंट लागू हुआ था पंडित नेहरु और अंग्रेजी सरकार के बीच में | अब शर्तों की बात करता हूँ , सब का जिक्र करना तो संभव नहीं है लेकिन कुछ महत्वपूर्ण शर्तों की जिक्र जरूर करूंगा जिसे एक आम भारतीय जानता है और उनसे परिचित है .

इस संधि की शर्तों के मुताबिक हम आज भी अंग्रेजों के अधीन/मातहत ही हैं | वो एक शब्द आप सब सुनते हैं न Commonwealth Nations | अभी कुछ दिन पहले दिल्ली में Commonwealth Game हुए थे आप सब को याद होगा ही और उसी में बहुत बड़ा घोटाला भी हुआ है | ये Commonwealth का मतलब होता है समान सम्पति | किसकी समान सम्पति ? ब्रिटेन की रानी की समान सम्पति | आप जानते हैं ब्रिटेन की महारानी हमारे भारत की भी महारानी है और वो आज भी भारत की नागरिक है और हमारे जैसे 71 देशों की महारानी है वो | Commonwealth में 71 देश है और इन सभी 71 देशों में जाने के लिए ब्रिटेन की महारानी को वीजा की जरूरत नहीं होती है क्योंकि वो अपने ही देश में जा रही है लेकिन भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को ब्रिटेन में जाने के लिए वीजा की जरूरत होती है क्योंकि वो दुसरे देश में जा रहे हैं | मतलब इसका निकाले तो ये हुआ कि या तो ब्रिटेन की महारानी भारत की नागरिक है या फिर भारत आज भी ब्रिटेन का उपनिवेश है इसलिए ब्रिटेन की रानी को पासपोर्ट और वीजा की जरूरत नहीं होती है अगर दोनों बाते सही है तो 15 अगस्त 1947 को हमारी आज़ादी की बात कही जाती है वो झूठ है और Commonwealth Nations में हमारी एंट्री जो है वो एक Dominion State के रूप में है न क़ि Independent Nation के रूप में| इस देश में प्रोटोकोल है क़ि जब भी नए राष्ट्रपति बनेंगे तो 21 तोपों की सलामी दी जाएगी उसके अलावा किसी को भी नहीं | लेकिन ब्रिटेन की महारानी आती है तो उनको भी 21 तोपों की सलामी दी जाती है, इसका क्या मतलब है? और पिछली बार ब्रिटेन की महारानी यहाँ आयी थी तो एक निमंत्रण पत्र छपा था और उस निमंत्रण पत्र में ऊपर जो नाम था वो ब्रिटेन की महारानी का था और उसके नीचे भारत के राष्ट्रपति का नाम था मतलब हमारे देश का राष्ट्रपति देश का प्रथम नागरिक नहीं है | ये है राजनितिक गुलामी, हम कैसे माने क़ि हम एक स्वतंत्र देश में रह रहे हैं | एक शब्द आप सुनते होंगे High Commission ये अंग्रेजों का एक गुलाम देश दुसरे गुलाम देश के यहाँ खोलता है लेकिन इसे Embassy नहीं कहा जाता | एक मानसिक गुलामी का उदहारण भी देखिये ……. हमारे यहाँ के अख़बारों में आप देखते होंगे क़ि कैसे शब्द प्रयोग होते हैं – (ब्रिटेन की महारानी नहीं) महारानी एलिज़ाबेथ, (ब्रिटेन के प्रिन्स चार्ल्स नहीं) प्रिन्स चार्ल्स , (ब्रिटेन की प्रिंसेस नहीं) प्रिंसेस डैना (अब तो वो हैं नहीं), अब तो एक और प्रिन्स विलियम भी आ गए है |
भारत का नाम INDIA रहेगा और सारी दुनिया में भारत का नाम इंडिया प्रचारित किया जायेगा और सारे सरकारी दस्तावेजों में इसे इंडिया के ही नाम से संबोधित किया जायेगा | हमारे और आपके लिए ये भारत है लेकिन दस्तावेजों में ये इंडिया है | संविधान के प्रस्तावना में ये लिखा गया है “India that is Bharat ” जब क़ि होना ये चाहिए था “Bharat that was India ” लेकिन दुर्भाग्य इस देश का क़ि ये भारत के जगह इंडिया हो गया | ये इसी संधि के शर्तों में से एक है | अब हम भारत के लोग जो इंडिया कहते हैं वो कहीं से भी भारत नहीं है | कुछ दिन पहले मैं एक लेख पढ़ रहा था अब किसका था याद नहीं आ रहा है उसमे उस व्यक्ति ने बताया था कि इंडिया का नाम बदल के भारत कर दिया जाये तो इस देश में आश्चर्यजनक बदलाव आ जायेगा और ये विश्व की बड़ी शक्ति बन जायेगा अब उस शख्स के बात में कितनी सच्चाई है मैं नहीं जानता, लेकिन भारत जब तक भारत था तब तक तो दुनिया में सबसे आगे था और ये जब से इंडिया हुआ है तब से पीछे, पीछे और पीछे ही होता जा रहा है | भारत के संसद में वन्दे मातरम नहीं गया जायेगा अगले 50 वर्षों तक यानि 1997 तक | 1997 में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने इस मुद्दे को संसद में उठाया तब जाकर पहली बार इस तथाकथित आजाद देश की संसद में वन्देमातरम गाया गया | 50 वर्षों तक नहीं गाया गया क्योंकि ये भी इसी संधि की शर्तों में से एक है | और वन्देमातरम को ले के मुसलमानों में जो भ्रम फैलाया गया वो अंग्रेजों के दिशानिर्देश पर ही हुआ था | इस गीत में कुछ भी ऐसा आपत्तिजनक नहीं है जो मुसलमानों के दिल को ठेस पहुचाये | आपत्तिजनक तो जन,गन,मन में है जिसमे एक शख्स को भारत भाग्यविधाता यानि भारत के हर व्यक्ति का भगवान बताया गया है या कहें भगवान से भी बढ़कर |
इस संधि की शर्तों के अनुसार सुभाष चन्द्र बोस को जिन्दा या मुर्दा अंग्रेजों के हवाले करना था | यही वजह रही क़ि सुभाष चन्द्र बोस अपने देश के लिए लापता रहे और कहाँ मर खप गए ये आज तक किसी को मालूम नहीं है | समय समय पर कई अफवाहें फैली लेकिन सुभाष चन्द्र बोस का पता नहीं लगा और न ही किसी ने उनको ढूँढने में रूचि दिखाई | मतलब भारत का एक महान स्वतंत्रता सेनानी अपने ही देश के लिए बेगाना हो गया | सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिंद फौज बनाई थी ये तो आप सब लोगों को मालूम होगा ही लेकिन महत्वपूर्ण बात ये है क़ि ये 1942 में बनाया गया था और उसी समय दूसरा विश्वयुद्ध चल रहा था और सुभाष चन्द्र बोस ने इस काम में जर्मन और जापानी लोगों से मदद ली थी जो कि अंग्रेजो के दुश्मन थे और इस आजाद हिंद फौज ने अंग्रेजों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाया था | और जर्मनी के हिटलर और इंग्लैंड के एटली और चर्चिल के व्यक्तिगत विवादों की वजह से ये द्वितीय विश्वयुद्ध हुआ था और दोनों देश एक दुसरे के कट्टर दुश्मन थे | एक दुश्मन देश की मदद से सुभाष चन्द्र बोस ने अंग्रेजों के नाकों चने चबवा दिए थे | एक तो अंग्रेज उधर विश्वयुद्ध में लगे थे दूसरी तरफ उन्हें भारत में भी सुभाष चन्द्र बोस की वजह से परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था | इसलिए वे सुभाष चन्द्र बोस के दुश्मन थे |
इस संधि की शर्तों के अनुसार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकुल्लाह, रामप्रसाद विस्मिल जैसे लोग आतंकवादी थे और यही हमारे syllabus में पढाया जाता था बहुत दिनों तक | और अभी एक महीने पहले तक ICSE बोर्ड के किताबों में भगत सिंह को आतंकवादी ही बताया जा रहा था, वो तो भला हो कुछ लोगों का जिन्होंने अदालत में एक केस किया और अदालत ने इसे हटाने का आदेश दिया है (ये समाचार मैंने इन्टरनेट पर ही अभी कुछ दिन पहले देखा था) | आप भारत के सभी बड़े रेलवे स्टेशन पर एक किताब की दुकान देखते होंगे “व्हीलर बुक स्टोर” वो इसी संधि की शर्तों के अनुसार है | ये व्हीलर कौन था ? ये व्हीलर सबसे बड़ा अत्याचारी था | इसने इस देश क़ि हजारों माँ, बहन और बेटियों के साथ बलात्कार किया था | इसने किसानों पर सबसे ज्यादा गोलियां चलवाई थी | 1857 की क्रांति के बाद कानपुर के नजदीक बिठुर में व्हीलर और नील नामक दो अंग्रजों ने यहाँ के सभी 24 हजार लोगों को जान से मरवा दिया था चाहे वो गोदी का बच्चा हो या मरणासन्न हालत में पड़ा कोई बुड्ढा | इस व्हीलर के नाम से इंग्लैंड में एक एजेंसी शुरू हुई थी और वही भारत में आ गयी | भारत आजाद हुआ तो ये ख़त्म होना चाहिए था, नहीं तो कम से कम नाम भी बदल देते | लेकिन वो नहीं बदला गया क्योंकि ये इस संधि में है |
इस संधि की शर्तों के अनुसार अंग्रेज देश छोड़ के चले जायेगे लेकिन इस देश में कोई भी कानून चाहे वो किसी क्षेत्र में हो नहीं बदला जायेगा | इसलिए आज भी इस देश में 34735 कानून वैसे के वैसे चल रहे हैं जैसे अंग्रेजों के समय चलता था | Indian Police Act, Indian Civil Services Act (अब इसका नाम है Indian Civil Administrative Act), Indian Penal Code (Ireland में भी IPC चलता है और Ireland में जहाँ “I” का मतलब Irish है वही भारत के IPC में “I” का मतलब Indian है बाकि सब के सब कंटेंट एक ही है, कौमा और फुल स्टॉप का भी अंतर नहीं है) Indian Citizenship Act, Indian Advocates Act, Indian Education Act, Land Acquisition Act, Criminal Procedure Act, Indian Evidence Act, Indian Income Tax Act, Indian Forest Act, Indian Agricultural Price Commission Act सब के सब आज भी वैसे ही चल रहे हैं बिना फुल स्टॉप और कौमा बदले हुए |इस संधि के अनुसार अंग्रेजों द्वारा बनाये गए भवन जैसे के तैसे रखे जायेंगे | शहर का नाम, सड़क का नाम सब के सब वैसे ही रखे जायेंगे | आज देश का संसद भवन, सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, राष्ट्रपति भवन कितने नाम गिनाऊँ सब के सब वैसे ही खड़े हैं और हमें मुंह चिढ़ा रहे हैं | लार्ड डलहौजी के नाम पर डलहौजी शहर है , वास्को डी गामा नामक शहर है (हाला क़ि वो पुर्तगाली था ) रिपन रोड, कर्जन रोड, मेयो रोड, बेंटिक रोड, (पटना में) फ्रेजर रोड, बेली रोड, ऐसे हजारों भवन और रोड हैं, सब के सब वैसे के वैसे ही हैं | आप भी अपने शहर में देखिएगा वहां भी कोई न कोई भवन, सड़क उन लोगों के नाम से होंगे | गुजरात में एक शहर है सूरत, इस सूरत शहर में एक बिल्डिंग है उसका नाम है कूपर विला | अंग्रेजों को जब जहाँगीर ने व्यापार का लाइसेंस दिया था तो सबसे पहले वो सूरत में आये थे और सूरत में उन्होंने इस बिल्डिंग का निर्माण किया था | ये गुलामी का पहला अध्याय आज तक सूरत शहर में खड़ा है |
हमारे यहाँ शिक्षा व्यवस्था अंग्रेजों की है क्योंकि ये इस संधि में लिखा है और मजे क़ि बात ये है क़ि अंग्रेजों ने हमारे यहाँ एक शिक्षा व्यवस्था दी और अपने यहाँ अलग किस्म क़ि शिक्षा व्यवस्था रखी है | हमारे यहाँ शिक्षा में डिग्री का महत्व है और उनके यहाँ ठीक उल्टा है | मेरे पास ज्ञान है और मैं कोई अविष्कार करता हूँ तो भारत में पूछा जायेगा क़ि तुम्हारे पास कौन सी डिग्री है ? अगर नहीं है तो मेरे अविष्कार और ज्ञान का कोई मतलब नहीं है | जबकि उनके यहाँ ऐसा बिलकुल नहीं है आप अगर कोई अविष्कार करते हैं और आपके पास ज्ञान है लेकिन कोई डिग्री नहीं हैं तो कोई बात नहीं आपको प्रोत्साहित किया जायेगा | नोबेल पुरस्कार पाने के लिए आपको डिग्री की जरूरत नहीं होती है | हमारे शिक्षा तंत्र को अंग्रेजों ने डिग्री में बांध दिया था जो आज भी वैसे के वैसा ही चल रहा है | ये जो 33 नंबर का पास मार्क्स आप देखते हैं वो उसी शिक्षा व्यवस्था क़ि देन है, मतलब ये है क़ि आप भले ही 67 नंबर में फेल है लेकिन 33 नंबर लाये है तो पास हैं, ऐसा शिक्षा तंत्र से सिर्फ गदहे ही पैदा हो सकते हैं और यही अंग्रेज चाहते थे | आप देखते होंगे क़ि हमारे देश में एक विषय चलता है जिसका नाम है Anthropology | जानते है इसमें क्या पढाया जाता है ? इसमें गुलाम लोगों क़ि मानसिक अवस्था के बारे में पढाया जाता है | और ये अंग्रेजों ने ही इस देश में शुरू किया था और आज आज़ादी के 64 साल बाद भी ये इस देश के विश्वविध्यालयो में पढाया जाता है और यहाँ तक क़ि सिविल सर्विस की परीक्षा में भी ये चलता है |
इस संधि की शर्तों के हिसाब से हमारे देश में आयुर्वेद को कोई सहयोग नहीं दिया जायेगा मतलब हमारे देश की विद्या हमारे ही देश में ख़त्म हो जाये ये साजिस की गयी | आयुर्वेद को अंग्रेजों ने नष्ट करने का भरसक प्रयास किया था लेकिन ऐसा कर नहीं पाए | दुनिया में जितने भी पैथी हैं उनमे ये होता है क़ि पहले आप बीमार हों तो आपका इलाज होगा लेकिन आयुर्वेद एक ऐसी विद्या है जिसमे कहा जाता है क़ि आप बीमार ही मत पड़िए | आपको मैं एक सच्ची घटना बताता हूँ -जोर्ज वाशिंगटन जो क़ि अमेरिका का पहला राष्ट्रपति था वो दिसम्बर 1799 में बीमार पड़ा और जब उसका बुखार ठीक नहीं हो रहा था तो उसके डाक्टरों ने कहा क़ि इनके शरीर का खून गन्दा हो गया है जब इसको निकाला जायेगा तो ये बुखार ठीक होगा और उसके दोनों हाथों क़ि नसें डाक्टरों ने काट दी और खून निकल जाने की वजह से जोर्ज वाशिंगटन मर गया | ये घटना 1799 की है और 1780 में एक अंग्रेज भारत आया था और यहाँ से प्लास्टिक सर्जरी सीख के गया था | मतलब कहने का ये है क़ि हमारे देश का चिकित्सा विज्ञान कितना विकसित था उस समय | और ये सब आयुर्वेद की वजह से था और उसी आयुर्वेद को आज हमारे सरकार ने हाशिये पर पंहुचा दिया है।|
इस संधि के हिसाब से हमारे देश में गुरुकुल संस्कृति को कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जायेगा | हमारे देश के समृद्धि और यहाँ मौजूद उच्च तकनीक की वजह ये गुरुकुल ही थे | और अंग्रेजों ने सबसे पहले इस देश की गुरुकुल परंपरा को ही तोडा था, मैं यहाँ लार्ड मेकॉले की एक उक्ति को यहाँ बताना चाहूँगा जो उसने 2 फ़रवरी 1835 को ब्रिटिश संसद में दिया था, उसने कहा था “I have traveled across the length and breadth of India and have not seen one person who is a beggar, who is a thief, such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such caliber, that I do not think we would ever conquer this country, unless we break the very backbone of this nation, which is her spiritual and cultural heritage, and, therefore, I propose that we replace her old and ancient education system, her culture, for if the Indians think that all that is foreign and English is good and greater than their own, they will lose their self esteem, their native culture and they will become what we want them, a truly dominated nation” | गुरुकुल का मतलब हम लोग केवल वेद, पुराण,उपनिषद ही समझते हैं जो की हमारी मुर्खता है अगर आज की भाषा में कहूं तो ये गुरुकुल जो होते थे वो सब के सब Higher Learning Institute हुआ करते थे |
इस संधि में एक और खास बात है | इसमें कहा गया है क़ि अगर हमारे देश के (भारत के) अदालत में कोई ऐसा मुक़दमा आ जाये जिसके फैसले के लिए कोई कानून न हो इस देश में या उसके फैसले को लेकर सविंधान में भी कोई जानकारी न हो तो साफ़ साफ़ संधि में लिखा गया है क़ि ,वो सारे मुकदमों का फैसला अंग्रेजों के न्याय पद्धति के आदर्शों के आधार पर ही होगा, भारतीय न्याय पद्धति का आदर्श उसमे लागू नहीं होगा | कितनी शर्मनाक स्थिति है ये क़ि हमें अभी भी अंग्रेजों का ही अनुसरण करना होगा | भारत में आज़ादी की लड़ाई हुई तो वो ईस्ट इंडिया कम्पनी के खिलाफ था और संधि के हिसाब से ईस्ट इंडिया कम्पनी को भारत छोड़ के जाना था और वो चली भी गयी लेकिन इस संधि में ये भी है क़ि ईस्ट इंडिया कम्पनी तो जाएगी भारत से लेकिन बाकि 126 विदेशी कंपनियां भारत में रहेंगी और भारत सरकार उनको पूरा संरक्षण देगी | और उसी का नतीजा है क़ि ब्रुक बोंड, लिप्टन, बाटा, हिंदुस्तान लीवर (अब हिंदुस्तान यूनिलीवर) जैसी 126 कंपनियां आज़ादी के बाद इस देश में बची रह गयी और लुटती रही और आज भी वो सिलसिला जारी है |अंग्रेजी का स्थान अंग्रेजों के जाने के बाद वैसे ही रहेगा भारत में जैसा क़ि अभी (1946 में) है और ये भी इसी संधि का हिस्सा है | आप देखिये क़ि हमारे देश में, संसद में, न्यायपालिका में, कार्यालयों में हर कहीं अंग्रेजी, अंग्रेजी और अंग्रेजी है जब क़ि इस देश में 99% लोगों को अंग्रेजी नहीं आती है | और उन 1% लोगों क़ि हालत देखिये क़ि उन्हें मालूम ही नहीं रहता है क़ि, उनको पढना क्या है और UNO में जा के भारत के जगह पुर्तगाल का भाषण पढ़ जाते हैं |
आप में से बहुत लोगों को याद होगा क़ि हमारे देश में आजादी के 50 साल बाद तक संसद में वार्षिक बजट शाम को 5:00 बजे पेश किया जाता था | जानते है क्यों ? क्योंकि जब हमारे देश में शाम के 5:00 बजते हैं तो लन्दन में सुबह के 11:30 बजते हैं और अंग्रेज अपनी सुविधा से उनको सुन सके और उस बजट की समीक्षा कर सके | इतनी गुलामी में रहा है ये देश | ये भी इसी संधि का हिस्सा है | 1939 में दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हुआ तो अंग्रेजों ने भारत में राशन कार्ड का सिस्टम शुरू किया क्योंकि दूसरा  विश्वयुद्ध में अंग्रेजों को अनाज क़ि जरूरत थी और वे ये अनाज भारत से चाहते थे | इसीलिए उन्होंने यहाँ जनवितरण प्रणाली और राशन कार्ड क़ि शुरुआत क़ि | वो प्रणाली आज भी लागू है इस देश में क्योंकि वो इस संधि में है | और इस राशन कार्ड को पहचान पत्र के रूप में इस्तेमाल उसी समय शुरू किया गया और वो आज भी जारी है | जिनके पास राशन कार्ड होता था उन्हें ही वोट देने का आखिरकार होता था | आज भी देखिये राशन कार्ड ही मुख्य पहचान पत्र है इस देश में |
अंग्रेजों के आने के पहले इस देश में गायों को काटने का कोई कत्लखाना नहीं था | मुगलों के समय तो ये कानून था क़ि कोई अगर गाय को काट दे तो उसका हाथ काट दिया जाता था | अंग्रेज यहाँ आये तो उन्होंने पहली बार कलकत्ता में गाय काटने का कत्लखाना शुरू किया, पहला शराबखाना शुरू किया, पहला वेश्यालय शुरू किया और इस देश में जहाँ जहाँ अंग्रेजों की छावनी हुआ करती थी वहां वहां वेश्याघर बनाये गए, वहां वहां शराबखाना खुला, वहां वहां गाय के काटने के लिए कत्लखाना खुला | ऐसे पुरे देश में 355 छावनियां थी उन अंग्रेजों के | अब ये सब क्यों बनाये गए थे ये आप सब आसानी से समझ सकते हैं | अंग्रेजों के जाने के बाद ये सब ख़त्म हो जाना चाहिए था लेकिन नहीं हुआ क्योंक़ि ये भी इसी संधि में है | हमारे देश में जो संसदीय लोकतंत्र है वो दरअसल अंग्रेजों का वेस्टमिन्स्टर सिस्टम है | ये अंग्रेजो के इंग्लैंड क़ि संसदीय प्रणाली है | ये कहीं से भी न संसदीय है और न ही लोकतान्त्रिक है| लेकिन इस देश में वही सिस्टम है क्योंकि वो इस संधि में कहा गया है | और इसी वेस्टमिन्स्टर सिस्टम को महात्मा गाँधी बाँझ और वेश्या कहते थे (मतलब आप समझ गए होंगे) |
ऐसी हजारों शर्तें हैं | मैंने अभी जितना जरूरी समझा उतना लिखा है | मतलब यही है क़ि इस देश में जो कुछ भी अभी चल रहा है वो सब अंग्रेजों का है हमारा कुछ नहीं है | अब आप के मन में ये सवाल हो रहा होगा क़ि पहले के राजाओं को तो अंग्रेजी नहीं आती थी तो वो खतरनाक संधियों (साजिस) के जाल में फँस कर अपना राज्य गवां बैठे लेकिन आज़ादी के समय वाले नेताओं को तो अच्छी अंग्रेजी आती थी फिर वो कैसे इन संधियों के जाल में फँस गए | इसका कारण थोडा भिन्न है क्योंकि आज़ादी के समय वाले नेता अंग्रेजों को अपना आदर्श मानते थे इसलिए उन्होंने जानबूझ कर ये संधि क़ि थी | वो मानते थे क़ि अंग्रेजों से बढियां कोई नहीं है इस दुनिया में | भारत की आज़ादी के समय के नेताओं के भाषण आप पढेंगे तो आप पाएंगे क़ि वो केवल देखने में ही भारतीय थे लेकिन मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे | वे कहते थे क़ि सारा आदर्श है तो अंग्रेजों में, आदर्श शिक्षा व्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श अर्थव्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श चिकित्सा व्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श कृषि व्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श न्याय व्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श कानून व्यवस्था है तो अंग्रेजों की | हमारे आज़ादी के समय के नेताओं को अंग्रेजों से बड़ा आदर्श कोई दिखता नहीं था और वे ताल ठोक ठोक कर कहते थे क़ि हमें भारत अंग्रेजों जैसा बनाना है | अंग्रेज हमें जिस रस्ते पर चलाएंगे उसी रास्ते पर हम चलेंगे | इसीलिए वे ऐसी मूर्खतापूर्ण संधियों में फंसे | अगर आप अभी तक उन्हें देशभक्त मान रहे थे तो ये भ्रम दिल से निकाल दीजिये | और आप अगर समझ रहे हैं क़ि वो ABC पार्टी के नेता ख़राब थे या हैं तो XYZ पार्टी के नेता भी दूध के धुले नहीं हैं | आप किसी को भी अच्छा मत समझिएगा क्योंक़ि आज़ादी के बाद के इन 64 सालों में सब ने चाहे वो राष्ट्रीय पार्टी हो या प्रादेशिक पार्टी, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता का स्वाद तो सबो ने चखा ही है | भारत क़ि गुलामी जो अंग्रेजों के ज़माने में थी, अंग्रेजों के जाने के 64 साल बाद आज 2011 में जस क़ि तस है क्योंकि हमने संधि कर रखी है और देश को इन खतरनाक संधियों के मकडजाल में फंसा रखा है |
बहुत दुःख होता है अपने देश के बारे जानकार और सोच कर | मैं ये सब कोई ख़ुशी से नहीं लिखता हूँ ये मेरे दिल का दर्द होता है जो मैं आप लोगों से शेयर करता हूँ |ये सब बदलना जरूरी है लेकिन हमें सरकार नहीं व्यवस्था बदलनी होगी और आप अगर सोच रहे हैं क़ि कोई मसीहा आएगा और सब बदल देगा तो आप ग़लतफ़हमी में जी रहे हैं | कोई हनुमान जी, कोई राम जी, या कोई कृष्ण जी नहीं आने वाले | आपको और हमको ही ये सारे अवतार में आना होगा, हमें ही सड़कों पर उतरना होगा और और इस व्यवस्था को जड मूल से समाप्त करना होगा | भगवान भी उसी की मदद करते हैं जो अपनी मदद स्वयं करता है |

From: Pramod Agrawal < >

जहीरूद्दीन बाबर जीवन भर नही भूल पाया था खानवा के रणक्षेत्र को

बाबर कोस रहा था अपने भाग्य को


बाबर के सैनिकों में भगदड़  मच गयी और अंत में मिली पराजय। यह दृश्य देखकर बाबर को असीम दुख हुआ। उसने भारत में ‘लूट के माल’ को अपने सभी सैनिकों, परिचितों, मित्रों, बंधु बांधवों में बांट दिया था, केवल इसलिए कि ये लोग उसके हर सुख-दुख में उसका साथ देंगे, परंतु परिणाम आशानुरूप नही आया।जहीरूद्दीन बाबर Jahiruddin Babar बाबर कभी अपने भाग्य को कोसता था, तो कभी भारत के हिंदुओं की अनुपम देशभक्ति की भावना को कोसता था, जिसने उसकी यह दुर्गति करा दी थी, तो कभी वह अपने कृतघ्न सैनिकों, अधिकारियों और स्वदेश से आये लोगों कोसता था। बाबर जानता था कि अभी चाहे दिल्ली, आगरा दूर रह गयी है पर इतनी दूर भी नही है कि हाथ ही न आ सके… तो उसकी आत्मा कांप उठती।

आक्रमण को ‘जेहाद’ का रूप दिया


बाबर इस विषमता से निरंतर उभरने का प्रयास कर रहा था। वह कुल मिलाकर राणा का इस बात के लिए धन्यवाद ज्ञापित करता कि उसने ‘सदगुण विकृति’ के कारण ही सही मेरी भागती सेना का पीछा नही किया। और यही ‘सदगुण विकृति’ का दुर्बल  द्वार उसे भारत के सुदृढ़ दुर्ग में भीतर प्रविष्ट होने का सरल मार्ग जान पड़ता था। बाबर ने अपने सैनिकों को एकत्र करना आरंभ किया और उसने निर्णय लिया कि पराजित सैनिकों के मनोबल को ऊंचा करने का प्रयास किया जाए। फलस्वरूप बाबर ने अपने आक्रमण को ‘जेहाद’ का रूप दिया और  मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को उभारकर अपनी सेना में साम्प्रदायिक उन्माद उत्पन्न करने का प्रयास किया।


बाबर का संबोधन

बाबर ने अपने सैनिकों को संबोधित करते हुए कहा-‘‘ऐ मुसलमान बहादुरो! हिंदुस्तान की यह लड़ाई इस्लामी जेहाद की है। इस लड़ाई में होने वाली हार तुम्हारी नही इस्लाम की हार है। हमारा मजहब हमें बताता है कि इस दुनिया में जो पैदा हुआ है, वह मरता जरूर है। हमको और तुमको सबको मरना है। लेकिन जो अपने मजहब के लिए मरता है, खुदा उसे बहिश्त में भेजकर इज्जत देता है। लेकिन जो मजहब के खिलाफ मौत पाता है उसे खुदा दोजख में भेजता है। अब हमको इस बात का फैसला कर लेना है और समझ लेना है कि हम लोगों में बहिश्त कौन जाना चाहता है? उन्हें हर सूरत में इस लड़ाई में शरीक होना है। कुरान को अपने हाथों में लेकर तुम इस बात का आज अहद करो कि तुम इस्लाम के नाम पर होने वाली इस लड़ाई में काफिरों को शिकस्त दोगे, और ऐसा न कर सकने पर इस्लाम के नाम पर तुम अपनी कुर्बानी देने में किसी हालत में इनकार न करोगे।’’

हुआ सैनिकों में उत्साह का संचार

बाबर के इस उत्साहबर्धक भाषण को सुनकर उसके सैनिकों में उत्साह का संचार हुआ और उनके टूटे हुए मनोबल को ऊंचा उठाने में भी बाबर को सफलता प्राप्त हुई। हिंदू की देशभक्ति और धर्म के प्रति ‘अटूट आस्था’ का सामना करने के लिए मुसलमानों में बाबर के द्वारा उस समय अपने मजहब के प्रति ऐसी ही अंध भक्ति को पैदा करना अपेक्षित था, जिससे मुसलमान अपने को केवल मरने के लिए युद्घ में झोंक दें।

युद्घ का नियम है…..

विधि/न्याय का सिद्घांत है कि अपने से उत्तम स्वत्व कोई भी व्यक्ति किसी को प्रदान नही कर सकता। पर युद्घ का नियम है कि किसी को हराने के लिए आपको उससे भी उत्तम अस्त्र शस्त्र बांधने पडेंगे। इसलिए युद्घ के नियम का पालन करते हुए बाबर ने अपनी सेना को हिंदुओं की सेना से उत्तम मनोबल वाला बनाना उचित समझा।

बाबर का यह भाषण इतिहास में बहुत प्रसिद्घ है। इसकी प्रसिद्घि का कारण हिंदुओं की वीरता से उत्पन्न हुआ वह भय था जो बाबर की सेना को युद्घ के नाम तक से भागने के लिए प्रेरित करता था। बाबर की यह सफलता ही कही जाएगी कि उसने युद्घ से मुंह फेर चुकी अपनी सेना को पुन: युद्घ के लिए उद्यत किया और उसकी सेना ने उसका भाषण सुनकर उसका साथ देना स्वीकार कर लिया।

बाबर चला ‘जेहाद’ की ओर

ओमप्रकाश विर्लेय अपनी पुस्तक ‘‘भारतीय इतिहास के गौरव क्षण’’ के पृष्ठ 57 पर लिखते हैं-‘‘बाबर ने महाराणा सांगा के साथ जो युद्घ किया, उसका नाम उसने ‘जेहाद’ दिया था। मुसलमानों ने अन्य धर्मावलंबियों के विरूद्घ जो युद्घ जब भी कहीं और किसी भी समय किये, उनमें से अधिकांश को जेहाद के नाम पर ही लड़ा गया। भारत में सन 712 ई. से पूर्व सिंध से जेहाद का सिलसिला जारी हुआ तो अब भी किसी न किसी रूप में छद्म रूप में काम में लिया जा रहा है।’’

राणा भी हो गया सतर्क

बाबर के उद्देश्यों का ज्ञान राणा संग्राम सिंह को भी हो रहा था, इसलिए महाराणा चुप बैठने वाले नही थे। वह भी अपनी ओर से सैन्य संगठन करने में लग गये। बाबर और राणा संग्राम सिंह यहां तक तो समान थे कि वे दोनों एक दूसरे के विरूद्घ युद्घ की तैयारियां कर रहे थे, परंतु एक बात पर बाबर महाराणा से आगे था। वह संग्राम  सिंह के विरूद्घ छल-बल का प्रयोग करके भी युद्घ जीतने की योजना बना रहा था, जिससे महाराणा सर्वथा अनभिज्ञ थे, और भारतीय युद्घ नीति में सर्वथा त्याज्य नियमों को वह अपनाना भी नही चाहते थे।

जहीरूद्दीन बाबर नई चाल


बाबर ने अपनी सेना को आदेशित किया। ‘भारत की प्रसिद्घ लड़ाईयां’ का लेखक हमें बताता है-‘‘बाबर की सेना में युद्घ की तैयारियां हो रही थीं और चित्तौड़ की ओर से आने वाली सेनाएं युद्घ का रास्ता देख रही थीं। बाबर ने इस बीच में राजनीति की दूसरी चालों से काम लिया। दूत के पहुंचने पर सांगा के साथ संधि का प्रस्ताव किया। दूत के पहुंचने पर सांगा सोच विचार में पड़ गया। शत्रु के हथियार गिरा देने पर अथवा उसके संधि प्रस्ताव पर राजपूत कभी विश्वासघात नही करते थे। सांगा के साथ बाबर की संधि वार्ता आरंभ हो गयी। शिलादित्य नामक अपने एक सेनापति पर सांगा बहुत अधिक विश्वास करता था। संधि के संबंध में बातचीत करने के लिए सांगा ने शिलादित्य को नियुक्त किया।

संधि की बातचीत में एक महीना बीत गया। युद्घ के लिए उत्तेजित राजपूत सेनाओं में ढीलापन उत्पन्न हो गया। बाबर को परास्त करने के लिए सांगा ने एक विशाल सेना चित्तौड़ में तैयार की थी और शूरवीर सैनिकों तथा सरदारों को अपने साथ एकत्रित किया था। इतनी बड़ी और शक्तिशाली सेना का आयोजन चित्तौड़ के इतिहास में ही नही भारत के इतिहास में भी पहली बार हुआ था।’’

राणा कूटिनीतिक मोर्चे पर दुर्बल था

यह वर्णन हमें बताता है कि राणा संग्राम सिंह ने बाबर के साथ युद्घ के लिए कितने बड़े स्तर पर तैयारी की  थी? राणा अपने क्षत्रियपन में दुर्बल नही था पर कूटनीतिक मोर्चे पर दुर्बल था। एक परंपरागत शत्रु का विश्वास कर रहा था और संधि प्रस्ताव के झांसे में फंसकर अनावश्यक ही अपनी सेना के मनोबल से खिलवाड़ कर रहा था।

शत्रु के विरूद्घ बना राष्ट्रीय मोर्चा

भारतीय राजनीति में इस काल में विदेशी आततायी को भगाने के लिए बहुत ही सुखदायक स्थितियां परिस्थितियां निर्मित हो रही थीं। राजस्थान के अनेकों शक्तिशाली शासकों, सामंतों और सरदारों ने राणा सांगा का नेतृत्व स्वीकार कर अपना सैन्य सहयोग राणा को दिया था।

ये सभी शासक सामंत सरदार या प्रभावशाली व्यक्तित्व चित्तौड़ की ओर अपनी-अपनी सेनाएं लेकर आगे बढ़े और विदेशी आततायी शत्रु को मार भगाने के लिए राणा के नेतृत्व में पंक्तिबद्घ खड़े हो गये। बड़े सौभाग्य से ऐसे क्षण आये थे-जब हम पर लगने वाले ‘पारंपरिक फूट’ के आरोपों को सिरे से ही नकारा जा सकता था। परंतु बाबर की छल-बल की नीतियों के सामने यह सौभाग्य दुर्भाग्य में परिवर्तित हो गया था। कहा जाता है कि ‘‘राणा की सेना में इस बार एक लाख बीस हजार सामंतों सरदारों सेनापतियों तथा वीर लड़ाकुओं की संख्या थी। इसके अतिरिक्त राणा की सेना में अस्सी हजार सैनिक थे। तीस हजार पैदल सैनिकों की संख्या थी, युद्घ में लडऩे वाले पांच सौ खूंखार हाथी थे। इस प्रकार दो लाख तीस हजार सैनिक, सवारों, सरदारों, सामंतों और उन शक्तिशाली राजपूतों को लेकर राणा सांगा युद्घ के लिए रवाना हुआ था, जिनका संग्राम में लडऩा ही जीवन था। डूंगरपुर, सालुम्ब, सोनगड़ा, मेवाड़ मारवाड़ अंबेर, ग्वालियर, अजमेर चंदेरी तथा दूसरे राज्यों के अनेक बहादुर राजा इस विशाल सेना का नेतृत्व कर रहे थे’’।

(संदर्भ : ‘भारत की प्रसिद्घ लड़ाईयां’ पृष्ठ 214)

कितना देशभक्ति पूर्ण परिवेश था यह। स्वतंत्रता की दुन्दुभि चारों ओर बज रही थी। राणा सांगा सबके नेता बन गये थे। सर्वसम्मति से राणा को अनेकों राजाओं ने अपना नायक चुन लिया और उसके नेतृत्व में भारत की स्वतंत्रता का बिगुल फूंक दिया। इतनी बड़ी सेना अपनी स्वतंत्रता के लिए विश्व के अन्य देशों में भला कब और कहां बनी है?

वास्तव में ही भारत के इतिहास के गौरव क्षण थे यह जब दर्जनों शासकों, सामंतों और सरदारों ने राणा सांगा को अपना नेता चुना था। भारत की देशभक्ति को बाबर ने संधि के छलपूर्ण प्रयास से धूमिल कर दिया। बाबर ने इतने विशाल सैन्य दल को झांसा देकर संधि के झूठे झूले में झुलाते झुलाते उन्हें सुला दिया और इस देरी का स्वयं अपने सैन्य दल को सुदृढ़ करने में लाभ उठाता रहा।

अपनों ने किया विश्वासघात

हमारे सैनिकों की झपकी लगी, बाबर ने युद्घ की घोषणा कर दी।  पर ‘भारतीय इतिहास के गौरव क्षण’ के लेखक का मानना है कि-‘‘इतने सुरक्षित, इतने सज्जित तोपखाने और जेहाद का जादू चलाने वाले बाबर का फिर भी साहस नही हुआ कि वह युद्घ के लिए पहल करता। महाराणा सांगा ने ही आगे बढक़र आक्रमण किया। उधर से तोपें आग उगल रही थीं। इतिहासकार लिखते हैं कि आग के गोले बरसाती तोपों की परवाह न करते हुए धराशायी होते हुए भी मेवाड़ी वीर तोपचियों तक जा पहुंचे। वे तोपों को छीनने ही वाले थे कि विश्वासघात हो गया। महाराणा सांगा का एक विश्वस्त प्रमुख सेनापति धोखा कर गया। वह शत्रु से जा मिला। कुछ लोगों ने उसको सांगा का संबंधी भी कहा है। उस विश्वासघाती का नाम सलहदी था। वह पूर्विया तंवर था। अपनी सैनिक टुकड़ी के साथ वह युद्घ के निर्णायक क्षणों में बाबर से जा मिला था। दिन ढलते ढलते युद्घ का पास पलटने लगा। इस बीच किसी के तीर के प्रहार से सांगा भी मूच्र्छित हो गया।’’

कितने रोमांचकारी क्षण थे, जब मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए  संघर्ष कर रहे वीर अपने प्राणों की परवाह किये बिना आग बरसाती तोपों को छीनने के लिए तोपचियों पर झपटे थे। उनकी वीरता अद्भुत थी।

खानवा में जीता था विश्वासघात

खानवा के युद्घ क्षेत्र में ना तो बाबर जीता था और ना उसकी तोपें जीती थीं, जैसा कि प्रचारित किया जाता है खानवा में जीता था विश्वासघात और जीती थीं बाबर की छलपूर्ण नीतियां। भारत के शेरों ने अपने शौर्य का परिचय दे दिया था यदि उसे इतिहासकारों ने उचित सम्मान और उचित स्थान इतिहास में नही दिया है तो इसमें उनका कोई दोष नही है। उन्होंने जिस प्रकार अनेकों राजाओं का संघ बनाकर एक बड़ी सेना तैयार की और उस सेना से शत्रु को जिस प्रकार विचलित कर उसके तोपखाने पर अपने असंख्य बलिदान देकर नियंत्रण स्थापित करना चाहा था, वह भी तो एक इतिहास है, यदि लोग बाबर की कथित जीत को पढ़ते हैं तो तोपों पर अपना नियंत्रण स्थापित करने वाले इन सैनिकों के अदम्य साहस को भी पढऩा चाहिए।

मातृभूमि के लिए तड़पता महाराणा संग्रामसिंह

मूच्र्छित महाराणा संग्रामसिंह रणभूमि से किसी प्रकार बाहर ले जाया गया। पर वह शूरवीर मातृभूमि के लिए तड़प रहा था, उसके हर सांस से भारत माता की जय का स्वर उच्चरित हो रहा था। मूच्र्छावस्था में भी उसकी देशभक्ति और स्वतंत्रता के प्रति समर्पण का भाव देखने योग्य था। जब राणा को मूच्र्छावस्था में उठाकर दूर जंगल में ले जाया गया तो आंखें खुलते ही और चेतना लौटते ही वे रणभूमि में चलने की हठ करने लगे। उनके सिर पर देशभक्ति चढक़र बोल रही थी। वह नही चाहते थे कि उन्हें रणभूमि में पड़े अनेकों हिंदू देशभक्त वीरों के शवों के मध्य से उठाकर इस प्रकार लाया जाता। राणा की इच्छा थी कि मुझे रणभूमि में ही वीरगति प्राप्त करने दी जाती। मातृभूमि के लिए इतनी तड़प और इतनी पीड़ा भारत के अतिरिक्त भला किस देश में मिल सकती है?

राणा को घेर लिया विषाद ने

महाराणा अपनी दशा पर और विश्वासघाती लोगों पर अत्यंत दु:खी थे। उन्हें विषाद ने आकर घेर लिया था। तब शौर्य और साहस की उस साक्षात मूत्र्ति ने कठोर प्रतिज्ञा ली कि जब तक शत्रु को परास्त नही कर लेंगे तब तक चित्तौड़ नही लौटेंगे। उनका संकल्प था कि चित्तौड़ की प्राप्ति तक वह नगर या ग्राम में नही जाएंगे, भूमि पर शयन करेंगे और सिर पर राज्य चिन्ह धारण नही करेंगे, साथ ही सिर पर मेवाड़ी गौरव की प्रतीक पगड़ी भी धारण नही करेंगे।

यह है भारत की पहचान भारत का अभिप्राय है-भीषण प्रतिज्ञा लेने वाला भीष्म। भारत का अभिप्राय है-भीषण प्रतिज्ञा लेने वाला चाणक्य, और भारत की पहचान है अपने ज्ञान-विज्ञान और क्षत्रियत्व की सुरक्षार्थ नित्य प्रात:काल अपनी शिखा बंधन करना कि मैं शिखा (चोटी) वाला हूं और शिखा (चोटी) वाला ही रहूंगा। जिस देश का बच्चा अपने ‘चोटी धर्म’ के लिए इस प्रकार संकल्पबद्घ हो उस देश के शासक वर्ग से भी किसी प्रकार के स्खलन की अपेक्षा नही की जा सकती। यह ‘चोटी धर्म’ हमारी राष्ट्रीय चेतना का प्राणभूत तत्व है जो अत्यंत विषम परिस्थितियों में भी महाराणा संग्राम सिंह को प्राण ऊर्जा प्रदान कर रहा था।

महाराणा संग्राम सिंह अंतिम समय

देशधर्म के लिए अपना सर्वस्व होम करने वाले इस महावीर को अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार जीवन जीते हुए तीन वर्ष व्यतीत हो गये। उन्होंने अपने देश की स्वतंत्रता के लिए कठोर साधना की। अपना हर श्वांस उन्होंने मातृभूमि के लिए समर्पित कर दिया। अंत में भारतीय स्वातंत्रय समर के इस महानायक ने बसवा के निकट एक दिन अंतिम श्वांस ली। बसवा उस समय मेवाड़ राज्य का ही भाग था, वहीं पर महाराणा का दाह-संस्कार संपन्न कर दिया गया था।

बसवा है हमारी राष्ट्रचेतना का केन्द्र

बसवा हमारी राष्ट्रचेतना का एक केन्द्र है, यहां की माटी में उस परमवीर की सुगंध है जिसके नाम और काम से समकालीन विदेशी सत्ता और मां भारती के शत्रुओं का हृदय कांपता था। मेवाड़ के महाराणा ने स्वतंत्रता के पश्चात बसवा में महाराणा सांगा का एक भव्य स्मारक बनवाना चाहा था, जिसे किसी अन्य प्रभावशाली राजवंश ने बनने नही दिया था। इस प्रकार रणभूमि में जयचंद के हाथों पराजित हुआ एक शूरवीर अपनी समाधि में लीन होकर भी ‘जयचंदों  के छलछंदों’ का शिकार बन गया। ‘जयचंदी परंपरा’ भारतीय वीर परंपरा को कलंकित करने वाली परंपरा है।

युद्घ का वर्णन

महाराणा संग्राम सिंह और बाबर के युद्घ का वर्णन करते हुए इतिहासकार लिखता है-‘‘राणा सांगा ने अपने हाथी पर बैठे हुए युद्घ की परिस्थिति का निरीक्षण किया। उसने देखा बाबर के गोलों से राजपूत बड़ी तेजी के साथ मारे जा रहे हैं और शत्रु की सेना तोपों के पीछे है। उसने एक साथ अपनी विशाल सेना को शत्रु पर टूट पडऩे की आज्ञा दी। राणा की ललकार सुनते ही समस्त राजपूत बड़ी तेजी के साथ मारे जा रहे हैं और शत्रु की सेना तोपों के पीछे हैं। उसने एक साथ अपनी विशाल सेना को शत्रु पर टूट पडऩे की आज्ञा दी। राणा की ललकार सुनते ही समस्त राजपूत सेना अपने प्राणों का मोह छोडक़र एक साथ आंधी की तरह शत्रु के गोलंदाजों पर टूट पड़ी। उस भयानक विपद के समय उस्ताद अली तथा मुस्तफा ने राजपूतों पर गोलों की भीषण वर्षा की। उस मार में बहुत से राजपूत एक साथ मारे गये। लेकिन उन्होंने शत्रु की तोपों को छिन्न-भिन्न कर दिया और बाबर की सेना का संहार करने  के लिए वे जैसे ही आगे बढ़े, सबके सब एक साथ खाई के भीतर जा पहुंचे। उसी समय बाबर की सेना ने खाई के ऊपर से घेरकर जो मार आरंभ की, उसमें राजपूतों का भयानक रूप से वध हुआ। खाई से निकलकर बाहर आने के लिए राजपूतों ने बार-बार कोशिश की, लेकिन उनमें उनका भीषण संहार किया गया। राजपूत सेना के सामने एक प्रलय का दृश्य था। मरने और बलिदान देने के अतिरिक्त उनके सामने दूसरा कोई विकल्प नही था।’’

(संदर्भ : ‘भारत की प्रसिद्घ लड़ाईयां’ : केशव कुमार ठाकुर) इस प्रकार खानवा के युद्घ की वह अनाम खाई भी हमारे उन हिंदू वीरों का एक पावन स्मारक है, जिन्होंने निज देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वोत्कृष्ट बलिदान देकर मां भारती की सेवा का पुण्य प्रसाद ग्रहण किया था।

हसन खां मेवाती और महमूद खां लोदी की वीरता

इन्हीं योद्घाओं के साथ हसन खां मेवाती और महमूद खां लोदी ने भी अपना बलिदान देकर भारत के अमर शहीदों में अपना नाम अंकित कराया उनका बलिदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है, क्योंकि उन पर या उनकी बीस हजार की सेना पर बाबर के जेहाद या उत्साहजनक भाषण का कोई प्रभाव नही पड़ा और वे अंतिम क्षणों तक भारत के लिए लड़ते रहे। ऐसे वीर सपूतों को और अपने दिये वचन का सम्मान करने वाले सच्चे देशभक्तों को कोटि-कोटि प्रणाम।खानवा का मैदान हमारी पराजय की कटु स्मृतियों का स्थल ही नही है, अपितु यह मैदान हमारे रणबांकुरों की देशभक्ति, बलिदान और स्मरणीय त्याग का तीर्थ स्थल भी है। बाबर तो अपने जीवन में खानवा को भूल नही पाया था, पर हम भूल गये।

इसे क्या कहा जाए?

From: “Ashali Varma” < >
Date: 8 May 2017 7:48 pm
Subject: New proof on we are the Aryans and there was no invasion

Dear Friends,

This is a bit long but gives irrefutable proof that there was no Aryan invasion and India is the oldest civilization in the world and it spread its Vedic thoughts outwards to the North and West! Do circulate.

–Best Regards,

ashali